Saturday, August 4, 2012

असंवेदनशील आस्था

आज एक न्यूज़ चेनल पर शनि को प्रसन्न करने का एक उपाय बताया जा रहा था.१०८ मदार या आंकड़े के पत्तों कि माला बना कर हनुमानजी को चढ़ाई जाये जिससे शनि कि शांति होती है साथ ही हनुमानजी प्रसन्न होते हैं. हमारे देश में भगवान को प्रसन्न करके अपना काम निकलवाने कि मानसिकता बहुत आम है ओर इसके लिए भगवान को चढ़ावे के रूप में रूप में फल फूल,मिठाई मेवे पूजा कि अन्य सामग्री चढाने का आम रिवाज़ है.पता नहीं इस चढ़ावे से भगवान कितने खुश होते है लेकिन इस तरह के कर्मकांडों से प्रकृति को जो नुकसान होता है उसकी पूर्ति सालों में भी संभव नहीं हो पाती. 
समय समय पर इस तरह के नए नए कर्म काण्ड कि हवा चलती है ओर लोग बिना सोचे विचारे उन पर अमल करने लगते हैं फिर चाहे वह गणेशजी को दूध पिलाने कि बात हो या मदार के पत्तों कि माला बनाना ,श्री कृष्ण जी पर १००८ तुलसी पत्र चढ़ाना.
तुलसी के १०८ या १००८ पत्ते रोज़ श्रीकृष्ण जी को चढाने से मनोकामना पूरी होती हो या ना होती हो लेकिन ये तय है कि अगर एक मोहल्ले के ५-७ लोग इस तरह का संकल्प ले लें तो उस मोहल्ले या कालोनी के सभी तुलसी के पौधे उजड़ जाते हैं.क्योंकि पूजा के नाम पर या संबंधों के नाम पर कोई तुलसी तोड़ने को मना नहीं कर पाता .
आजकल जबसे लोग अपनी सेहत के लिए जागरूक हुए हैं और सुबह कि सैर पर जाने लगे हैं तब से फूलों कि तो जैसे शामत आ गयी है. लोग सैर कम करते हैं फूलों कि चोरी ज्यादा करते हैं ओर ये चोरी भी कोई ऐसी वैसी नहीं पूरा डाका डाला जाता है. जहाँ तक हाथ पहुंचे वहां तक से सारे फूल तोड़ लिए जाते हैं बेचारे पेड़ मालिक के भगवान के लिए एक दो भी नहीं छोड़े जाते.सैर के बाद सेहत पता नहीं कितनी बढ़ती है लेकिन थैली में फूलों का वजन लगातार बढ़ता जाता है.सैर के लिए उस रास्ते नहीं जाया जाता जहाँ शुद्ध हवा मिले बल्कि उस रास्ते जाया जाता है जहाँ ज्यादा फूल मिलें. फूलों पर जितना हक आपके भगवान का है उतना ही पक्षियों, तितलियों का भी है.जरा सोच कर देखिये कब से आपने अपने आसपास तितलियों को उड़ते नहीं देखा?ये तितलियाँ फूलों के पराग पर जीवित रहती हैं मधुमक्खियाँ इन्ही से पराग ले कर शहद बनाती हैं फूलों के उजड़ जाने से इनकी संख्या में चिंतनीय कमी आयी है.तितलियाँ तो आजकल देखने को भी नहीं मिलती मधुमक्खियाँ भी लगातार कम होती जा रही हैं.

मालवी में एक कहावत है एक शेत पाडो ना एक गाम उजाडो अर्थात अगर एक मधुमक्खी का छत्ता तोडा जाता है उससे फसलों के परागण में जो कमी आती है वह गाँव कि जरूरत जितने अनाज कि उपज कम कर देती है.   
अभी सावन के महिने में आक या मदार के फूल धतूरे जिस बेरहमी से तोड़े जाते हैं कि इनके फूलों से नए बीज बनने कि प्रक्रिया ही रुक जाती है.पेड़ पौधों पर फूल रहेंगे तब तो उनसे फल और बीज बनेंगे ओर इन बीजों के विकिरण से नए पौधे बनेंगे जिस तेज़ी से स्थानीय वनस्पति कम हो रही है इससे इनपर निर्भर छोटे छोटे जीव जंतु विलुप्त होते जा रहे हैं वो चिंता का विषय है. 
यहाँ तक कि पहले कहीं भी जड़ जमा लेने वाली बेशरम कि झाड़ियाँ (उनका नाम ही बेशर्म शायद इसलिए था कि वो हर जगह उग जाती थीं) भटकटैया,धतूरे,बेलपत्र,लटजीरा, प्याड के पीले फूल यहाँ तक कि बारीक वाली दूब आज दिखाई ही नहीं देते.बेशरम कि झाड़ियों से जो जलावन मिलता था वह अब मिलना बंद हो गया है नतीजा लोग पेड़ ज्यादा काट रहे हैं.
सावन के महिने में लाखों लीटर जल दूध अभिषेक के नाम पर पानी में बहा दिया जाता है ,बेल पत्र के पेड़ उजाड़ दिए जाते हैं. 
हमारे यहाँ धर्म के नाम पर जो ना हो सो कम है . धार्मिक रीती रिवाजों को प्रकृति से जोड़ने का आशय ही प्रकृति के प्रति लोगो को संवेदनशील बनाना था.लेकिन अब ज्यादा धर्म कर्म करने ज्यादा पुण्य पाने कि होड़ में ये संवेदनशीलता कहीं गुम हो गयी है .व्यावसायिकता आस्था पर भारी पड़ती जा रही है लोग ज्यादा पुण्य पाने के लिए ज्यादा चढ़ावे ज्यादा दिखावे कि मानसिकता ले कर पूजा अर्चना करते हैं जबकि भगवान तो भावना के भूखे हैं पूरी श्रद्धा से चढ़ाया गया एक फूल टोकनी भर फूल से कहीं ज्यादा है .तो जरा सोचिये कहीं आप भी तो धर्म के नाम पर प्रकृति के साथ जीव जंतुओं के साथ अन्याय तो नहीं कर रहे हैं??   


Tuesday, July 17, 2012

प्राकृतिक संसाधनों का नियंत्रित दोहन जरूरी है.

आज समाचार पत्र में दो ख़बरें पढ़ीं .दोनों ही ख़बरें अगर सोचा जाये तो बहुत गंभीर चेतावनी देती हैं नहीं तो सिर्फ ख़बरें हैं. 
पहली खबर है नॅशनल जियोग्राफिक सोसायटी के एक सर्वे के बारे में है जो बताती है कि हमारी सनातनी परंपरा के चलते हम भारतीय पर्यावरण को होने वाले नुकसान के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं ओर अपराधबोध से ग्रस्त होते हैं.१७ देशों में करवाए गए सर्वेक्षण में भारतीय सबसे ऊपर थे.लेकिन इसका दुखद पहलू ये है कि इसके बावजूद भी हम लोगों को इस बात का सबसे कम यकीन है कि व्यक्तिगत प्रयासों से पर्यावरण को सुधारने में मदद मिल सकती है. 

दूसरी खबर ये है कि मध्यप्रदेश कि जीवन दायनी रेखा नर्मदा नदी में रेत कि मात्रा लगातार खनन के चलते कम हो रही है. इसका कारण नर्मदा नदी कि सहायक नदियों पर बनने वाले बाँध कि वजह से नर्मदा के प्रवाह में लगातार कमी आयी है जिससे बलुआ पत्थरों से बनने वाली रेत में कमी आयी है ओर रही सही कसर रेत के अति दोहन से नर्मदा का रेत का भंडार ज्यादा से ज्यादा दो साल ओर चलेगा. ये कहना है खनिज अधिकारी श्री खेतडिया  का.
हमारे देश में प्राकृतिक संसाधनों का अथाह भंडार है.ये संसाधन हैं जल जमीन वन,वनस्पति,खनिज,पेट्रोलियम,सूर्य उर्जा,पवन उर्जा आदि आदि.इनमे से कुछ संसाधन पुन प्राप्त किये जा सकते है जैसे पवन उर्जा ओर सोर उर्जा. लेकिन कुछ संसाधन जैसे खनिज पेट्रोलियम पुन प्राप्त नहीं किये जा सकते. 
आज हम  विकास की  राह पर अग्रसर है .लेकिन इस विकास कि राह पर हम संसाधनों के उपयोग के साथ किस कदर उनका दुरूपयोग कर रहे हैं इस बारे में सोचने कि किसी को फुर्सत ही नहीं है.विकास के नाम पर बेतरतीब कार्ययोजना के चलते संसाधनों का बेतहाशा दोहन किया जा रहा है. आइये नज़र डालें कुछ कार्यों पर ..

सबसे पहले बात करें सीमेंट की .इन्फ्रा स्ट्रक्चर में तेज़ी के चलते पूरे देश में सडकों, पुलों, बहुमंजिला इमारतों का निर्माण कार्य प्रगति पर है जिसमे सीमेंट का उपयोग निरंतर हो रहा है. सीमेंट कंपनियों ने इसके चलते सीमेंट के दामों में वृध्धि भी की है.लेकिन इसके बावजूद भी सीमेंट के संयमित उपयोग की बात कोई नहीं सोचता. इंदौर के बाय को ही लीजिये इसका निर्माण आगामी २५ सालों के लिए हुआ था लेकिन महज ११ सालों में ही इसे उखाड़ कर इसे सिक्स लेन किया जा रहा है.इसमें उपयोग की गयी कांक्रीट उखाड़ने के बाद सिर्फ बर्बाद ही हुई है. इसके साथ ही इसमें इस्तेमाल हुई लाखों टन रेत गिट्टी ओर पानी की बर्बादी की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया. क्या हमारे नीति नियंता आगामी २५ सालों के लिए भी कोई योजना नहीं बना सकते?? 
इसी प्रकार बी आर टी एस में बनने वाली सडकों को पहले पूरा बनाया गया ओर अब उन्हें उखाड़ कर उनमे रेलिंग लगाई जा रही है. रेलिंग लगाने के लिए फिर कंक्रीट का इस्तेमाल किया जा रहा है. 

इस तरह लाखों टन सीमेंट का उपयोग कर उसे मिटटी बना कर फेंक दिया जाता है. सीमेंट बनाने में उपयोग होने वाले कच्चेमाल में चूने का पत्थर जिप्सम ओर रेत का इस्तेमाल होता है जो प्रकृति से प्राप्त किये जाते हैं. इस तरह हम आवश्यकता से अधिक खनिज का दोहन कर रहे हैं. सीमेंट कम्पनियाँ जोरशोर से उत्पादन में लगी हैं जैसे सब ख़त्म होने से पहले जितना बन पड़े उपयोग कर लिया जाये. विडम्बना ये है की हमारे यहाँ एक बार खदान लीज पर दे देने के बाद उसके दोहन के लिए कोई रेगुलारिटी एक्ट नहीं है ओर अगर है भी तो मृतप्राय.
बहुमंजिला इमारतों यहाँ तक की व्यक्तिगत स्तर पर बनने वाले मकानों में भी सीमेंट रेत ओर पानी की बर्बादी पर कोई नियंत्रण नहीं है. हमारे यहाँ कोई भी सेल्फ ट्रेनिंग करके मिस्त्री ठेकेदार बन जाता है.इन लोगों को कभी ये सिखाया ही नहीं जाता की ये हमारे संसाधन हैं ओर इनका समझदारी से उपयोग किया जाना चाहिए. अब इनकी कौन कहे हमारे सिविल इंजिनियर तक इस बारे में नहीं सोचते ना ही जिम्मेदार पदों पर बैठे अफसर या नेता. 

इसी तरह निर्माण में काम आने वाली मुरम का बेतहाशा खनन किया जा रहा है जिसके चलते कई पहाड़ियों का तो अस्तित्व ही ख़त्म हो गया है.उनकी जगह या तो सपाट मैदान बचे हैं या गढ्ढे.  

जब भी बड़ी बड़ी मल्टी के लिए नींव की खुदाई होती है उसमे से निकलने वाली मिटटी यहाँ वहां डाल दी जाती है ये मिटटी सड़क पर बिखरती है कचरे के साथ मिला दी जाती है रौंदी जाती है जिससे अंततः मिटटी धूल बन जाती है इसकी जीवनी शक्ति नष्ट हो जाती है ओर फिर ये किसी काम की नहीं रह जाती. ऐसा लगता है की पूरी पृथ्वी की सतह ही उलट पलट कर दी गयी है.कल तक जहाँ पहाड़ थे आज वहां गढ्ढे है ओर जहाँ मैदान   थे आज वहां मिटटी या कचरे के ढेर. 
मकान के निर्माण में इंटों की बर्बादी में मिटटी की बर्बादी ,कांक्रीट  मिक्स़र  में पानी ओर बचे हुए मॉल की बर्बादी किसी के पास भी इनके न्यायोचित उपयोग के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है. हमारी सड़कों के किनारे उबड़ खाबड़ है अगर उनमे ये बचा हुआ कांक्रीट डाल दिया जाये तो इसका बेहतर उपयोग हो सकता है. लेकिन इतनी सामाजिक जिम्मेदारी उठाये कौन?
भवन निर्माण में बचे हुए फर्शी के टुकडे,पेंट लकड़ी के बुरादे, इंटों के टुकडे ,लोहा लंगड़, पाइप ऐसी ही कुछ चीज़ें है जिनका पुनरुपयोग सुनिश्चित होना चाहिए. 

एक ओर बात जो काफी चिंताजनक है की बड़े बड़े निर्माण कार्यों में बड़ी बड़ी कम्पनियाँ शामिल होती हैं जिनके लिए कार्यस्थल पर बचे छोटे मोटे थोड़े बहुत सामान के लिए कोई परवाह ही नहीं है. अब अगर ये कार्य स्थल किसी गाँव के पास हैं तो गाँव वाले इन्हें उठा कर अपने काम में ले लेते हैं लेकिन अगर किसी शहरी इलाके में हैं तो ये यूं ही सड़क के किनारे पड़े रहते बेकार हो जाते हैं. अगर निर्माण के बाद बचे हुए मटेरियल की ही खैर खबर ली जाये तो उनसे कुछ मकान तो निश्चित ही बन जायेंगे. 

ऐसे ही एक मकान के निर्माण के बाद कुछ रेत बच गयी थी.किसी व्यक्ति ने घर मालिक से अपने मकान के लिए वह रेत ले जाने को पूछा .देख कर ऐसा लगा शायद ८-१० बोरी रेत होगी वहां.लेकिन वह व्यक्ति अपने पूरे परिवार के साथ रेत इकठ्ठी करने में लगातार ४ घंटे लगा रहा ओर उसने कम से कम ६०-७०  बोरी रेत इकठ्ठा की. अब अगर वह नहीं ले जाता तो उतनी रेत जो शायद २-३ कमरे के प्लास्टर के लिए काफी थी वह तो बेकार ही चली जाती. उसने अपने प्राकृतिक संसाधन को बचाने में कितना बड़ा योगदान दिया ये तो सोचेंगे तो समझेंगे. 

कहीं पढ़ा था की ऑस्ट्रेलिया में प्राकृतिक संसाधनों पर सरकार का नियंत्रण होता है. वहां जमीन का पानी ,जंगल हवा सभी सबके हैं इसलिए कोई भी उन्हें बेवजह इस्तेमाल भी नहीं कर सकता बर्बाद करना तो दूर की बात है. हमारे यहाँ पता नहीं कभी ऐसा कोई कानून बन भी पायेगा या नहीं?खैर कानून बन भी गया तो दूसरे सैकड़ों कानूनों की तरह उसका क्या हश्र होगा ये तो हम समझ ही सकते है. लेकिन क्या हम इतना नहीं समझ सकते की अगर हमने हमारे प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग नियंत्रित नहीं किया तो इसका खामियाजा हमारी भावी पीढी भुगतेगी ओर वो भयावह ही होगा. ये हमारी भी नैतिक जिम्मेदारी है की हम हमारी  भावी पीढी के लिए प्राकृतिक संसाधन छोड़ कर जाएँ ओर वे सिर्फ बिजली पानी जंगल या पेट्रोलियम ही ना हों खनिज, वनस्पति,रेत, मिटटी, गिट्टी भी हों. जरा सोचिये.                   

Wednesday, June 13, 2012

ये भी तो जरूरी है



वैसे तो अभी तक स्कूल कि छुट्टियाँ चल रहीं थीं लेकिन स्कूल दिमाग से निकलता थोड़े ही है.बल्कि छुट्टियों में और ज्यादा समय मिलता है स्कूल कि बातें सोचने उन पर नए सिरे से विचार करने का. रोज़ कि पढाई के साथ एक अतिरिक्त जिम्मेदारी टीचर्स पर होती है और वह है किसी टीचर के अनुपस्थित होने पर उसकी क्लास लेना.वैसे तो इस पीरियड में पढाई ही होनी होती है लेकिन बच्चे सच पढ़ना नहीं चाहते.बड़ी मुश्किल से तो उन्हें कोई फ्री पीरियड मिलता है. तो जैसे ही क्लास में पहुँचो पहली ख़ुशी उनके चेहरे पर दिखती है कि चलो आज पढना नहीं है.लेकिन जल्दी ही ये ख़ुशी काफूर हो जाती है जब उन्हें पता चलता है कि ये फ्री पीरियड फ्री नहीं है बल्कि इसमें भी पढना ही है.और सच बताऊ मुझे इसमें बहुत तकलीफ होती है.बच्चों को इस फ्री पीरियड में अपने मन का काम करने की ,अपने दोस्तों से बात करने कि आज़ादी होना ही चाहिए.आखिर ये भी तो सीखने का एक तरीका हो सकता है.अपने दोस्तों से बात करना या उनके साथ बैठ कर अपनी पढाई कि मुश्किलों को हल करना या अपना अधूरा काम पूरा करना या फील्ड में जाना खेलना वगैरह.लेकिन स्कूल में खेलने और लायब्रेरी के पीरियड होते हैं इसलिए और एक्स्ट्रा पीरियड देना संभव नहीं होता. 

वैसे इन पीरियड में में बच्चों से बात करना चाहती हूँ.ये टीचिंग लर्निंग का सबसे अच्छा तरीका है.लेकिन अफ़सोस बच्चे इसमें आसानी से शामिल नहीं होते. उन्हें लगता है कि टीचर उनसे कुछ उगलवा कर उनके खिलाफ ही उपयोग कर सकती है.वैसे भी अविश्वास एक राष्ट्रीय बीमारी हो गयी है.खैर कभी कभी बच्चों को ये भी कहना पड़ता है कि बातचीत में शामिल होना उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा है इस तह मजबूरी में ही सही लेकिन जब बच्चे बातचीत में शामिल होते है तब बहुत आश्चर्यजनक ओर अद्भुत तथ्य सामने आते हैं.कभी बच्चों का डर तो कहीं उनके मन के संदेह सामने आते हैं तो कभी कभी लगता है कि बच्चे सच में बहुत छोटी छोटी साधारण सी बातें भी नहीं समझ पा रहे हैं क्योंकि ये बातें कभी उनके सामने हुई ही नहीं. 
एक दिन ऐसे ही किसी क्लास में हुई चर्चा यहाँ दे रही हूँ..आप खुद ही पढ़िए सोचिये और समझिये कि सच में इस पीढ़ी कि जरूरत क्या है?
टीचर  :  आप लोग दिन भर में इतनी बातें करते हैं कभी सोचते हैं कि इनमे से कितनी बातें ऐसी होती हैं जिनका कोई अर्थ  होता है?
बच्चे:    चुप्पी 
टीचर:   अच्छा कितने लोग हैं जो रात में सोचते हैं कि हमने दिन भर में कितनी और क्या क्या बातें कीं?
बच्चे:    (सिर्फ एक मुस्कान) 
टीचर:  देखिये अगर आपलोग बात नहीं करना कहते तो ठीक है में मेथ्स के सवाल दे देती हूँ.क्योंकि समय बर्बाद नहीं किया जा सकता कुछ तो करना ही है. 
बच्चे:  नहीं मैडम 
टीचर:   अच्छा आपमें से कितने बच्चों को लगता है कि आप अपनी किसी बात से अपने दोस्तों को या साथियों को हर्ट करते हैं?
बच्चे:  (इधर उधर देखते हुए) एक फिर दो फिर तीन चार बच्चे हाथ उठाते हैं?
टीचर:   अच्छा कितनों को हर्ट करने के तुरंत बाद  लगता है कि आपने हर्ट किया है?
         फिर ८- १० हाथ उठाते हैं.
टीचर:   अच्छा कितनों को लगता है कि हमें अपने दोस्त या साथी से माफ़ी मांगनी चाहिए?
           (संकोच से इधर उधर देखते ६ -७  हाथ उठाते हैं)
टीचर :   कितने लोग सच में माफ़ी माँगते हैं?
बच्चे:    एक दूसरे से आँख चुराते हुए २-३ बच्चे हाथ उठाते हैं. 
टीचर:    ये बताइए जब आपको लगता है कि आपने किसी को हर्ट किया लेकिन उससे माफ़ी नहीं मांगी,तो ये बात आपको परेशान करती        है??
बच्चे:   जी मैडम ,परेशान करती है बार बार वो बात ध्यान आती है. 
टीचर:   क्या बात ध्यान आती है और क्या लगता है?
बच्चे:    वो बात याद आती है कि हमने किसी को हर्ट किया या बुरा किया.
टीचर:    तो कितने लोग है जो इस बात को महसूस करने के बाद दूसरे दिन या उसके बाद भी माफ़ी माँगते हैं?
बच्चे:     १-२ बच्चे हाथ उठाते हैं.
टीचर:    चलिए कोई बात नहीं लेकिन इस बात को लेकर उस दोस्त के सामने आने में शर्म आती है या आप उससे बात नहीं करते ऐसा कितनों को लगता है? 
            ( अब तक बच्चों को शायद ये विश्वास होने लगा था कि ये बातचीत हानिकारक नहीं है और मैडम इसका कोई रिकॉर्ड नहीं रख रही हैं. तो वे खुलने लगे)
बच्चे:    लगभग १२-१५ बच्चे हाथ उठाते हैं. 
टीचर:    अच्छा कितनो को लगता है कि अगर तुरंत माफ़ी मांग ली होती तो ज्यादा अच्छा  होता?दोस्ती भी बच जाती और यूं परेशान भी नहीं होना पड़ता?
बच्चे:    हाथ उठाते हैं साथ ही अब एक दूसरे को देखते भी हैं. अभी तक कुछ बच्चे एक दूसरे से आँखे चुरा रहे थे. 
टीचर:   क्या आपको लगता है कि माफ़ी मांगना इतना मुश्किल है?? 
बच्चे:     मैडम शर्म आती है. 
            लगता है मेरा दोस्त क्या सोचेगा? 
टीचर :   अच्छा कितनो  को लगता है कि अगर मेरा दोस्त एक बार सॉरी कह देता तो अच्छा होता.( कई बच्चे हाथ उठाते हैं )
टीचर:    अगर किसी बहुत पुरानी बात के लिए अगर कोई अभी सॉरी कहेगा तो क्या आप माफ़ कर देंगे और फिर से दोस्त हो जायेंगे?
बच्चे:     यस मैडम 
टीचर:    अच्छा ठीक है आप लोग जिसे भी सॉरी कहना चाहते हैं उसे सॉरी कह दीजिये .( ४-५ बच्चे एक दूसरे को आँखों आँखों में सॉरी कहते हैं कुछ अभी भी चुप चाप बैठे टीचर को देख रहे हैं .उनमे अभी भी झिझक है )
टीचर:    ठीक है में आँखे बंद करती हूँ आप अगर किसी से सॉरी कहना कहते हैं तो आपके पास ३ मिनिट का समय है. ( टीचर आँखें बंद करती है और पूरी क्लास में हलचल शुरू हो जाती है.आँखे खोलने के बाद बच्चों के प्रफुल्लित चहरे दिखते हैं.)
टीचर:   आप लोगो को कैसा  महसूस हो रहा है? 
बच्चे:     बहुत अच्छा ,हल्का महसूस हो रहा है.ख़ुशी हो रही है. 
टीचर:    अच्छा क्या सॉरी कहना वाकई इतना मुश्किल था??
बच्चे:     नहीं मुश्किल नहीं था, कुछ ने कहा थोडा मुश्किल था , तो कुछ ने कहा कि मुश्किल तो है लेकिन कह सकते हैं. 
टीचर:     क्या आपको लगता है कि अगर हम तुरंत सॉरी कह दें तो हमारा टेंशन कम हो जाता?
बच्चे:    जी मैडम सॉरी तुरंत कह देने से सच में कम टेंशन होता.
टीचर:   तो क्या अब से आप लोग तुरंत सॉरी कहना अपनी आदत बनायेंगे? लेकिन हाँ किसी को जानबूझ कर हर्ट नहीं करना है कि बाद में सॉरी कह देंगे. 
बच्चे:    यस मैडम अब से हम गलती करते ही तुरंत माफ़ी मांग लेंगे. 

पीरियड ख़त्म होने को है. अब बच्चे बचे समय में एक दूसरे से बात कर रहे हैं वो खुश हैं और मुझे ख़ुशी है कि में उन्हें वह ख़ुशी दे पाई .एक फ्री पीरियड एक सार्थक चर्चा के साथ ख़त्म हुआ.  बच्चों ने कुछ सीखा जो शायद पढाई से ज्यादा जरूरी भी था. 
kavita   वर्मा  


Monday, May 21, 2012

अलीबाग यात्रा २

baiking 
आज सोमवार है सुबह शांत थी जब हम बीच पर पहुंचे ज्यादा भीड़ भाड़ वहां नहीं थी.रविवार सुबह एक अलग नज़ारा वहां देखा था,जो समुद्र में जाने के उत्साह में ध्यान में कम रहा.सुबह सुबह करीब २०-२५ लोगों की टोली हाथ में बेलचे फावड़े लिए झाड़ियों में अटके कागज़ पुलिथीं निकल कर जला रहे थे. ये यहाँ के स्थानीय निवासी थे जो इस बीच से आने वाली पीढ़ी के लिए ना सिर्फ रोज़गार की सम्भावना देख रहे थे बल्कि अपनी प्राकृतिक विरासत को सहेज रहे थे. देख कर अच्छा लगा लेकिन एक विचार ये भी मन में आया की इस काम के लिए हमारे यहाँ सुविकसित तंत्र कब होगा? इतना टेक्स देने के बावजूद भी अगर हर काम हमें ही हाथ में लेना है .क्या सरकारी मशीनरी काम के हिसाब से स्टाफ की नियुक्ति नहीं कर सकती? या नियुक्त लोगो को काम के लिए जरूरी सुविधा मुहैया करवा कर काम की सुनिश्तित्ता नहीं करवा सकती? ये तो अच्छा है की स्थानीय लोग शुरू से जागरूक है अन्यथा यह बीच जल्दी ही मुंबई के जुहू जैसे गंदे बीच में बदल जायेगा. वैसे भी यहाँ का मुख्य बीच अलीबाग बीच की गन्दगी का आलम देख कर उसमे जाने का मन नहीं हुआ था. अलीबाग बीच से अलीबाग फोर्ट ओर जंजीरा किला जाया जा सकता है. 
खैर आज का मुख्य आकर्षण वाटर स्पोर्ट्स थे. लेकिन आज बिटिया का आग्रह था गीली रेत में दूर तक टहलने का. अब इसका आनंद शब्दों में तो नहीं बता पाउंगी ये तो गूंगे का गुड है खा कर ही महसूस किया जा सकता है. घूमते हुए दूर तक निकल गए जब पलट के देखा तब इसका एहसास हुआ. बच्चे लहरों का आना ओर उसके वापस लौटने पर रेत में बनने वाले पैटर्न देख रहे थे .वैसे शायद इस बात पर कुछ विवाद हो लेकिन मुझे तो १००% यही लगता है की लड़कियां ज्यादा सृजनात्मक होती हैं. बस रेत में से सीपियाँ इकठ्ठी करने में लग गयी की इससे कितनी सुन्दर ज्वेलरी बनाई जा सकती है .फिर क्या था वापसी में हमने ढेर सारी सीपियाँ इकठ्ठी कर लीं. 
आज समुन्द्र का मिजाज़ पिछले दिन से कुछ अलग था. लगा लहरें आज की शांति में ज्यादा शोर कर रहीं हैं. बच्चे तो आज की ऊँची लहरों का मज़ा लेने लगे में कहती रह गयी की पहले राइड्स कर लो .सारी राइड्स के लिए बात करके पहले बाइकिंग की गयी. तेज़ गति से पानी में बैक चलाना ओर उठती लहरों से बचते हुए उसे मोड़ना बहुत रोमांचक था. इसके बाद आयी वेलोसिटी जिसमे एक सोफा सा बना था आगे तीन लोगों के बैठने की व्यवस्था ओर पीछे एक के.इस राइड में सबसे ज्यादा मज़ा आया क्योंकि सब एक साथ थे. हाँ पानी में जाने से पहले सबने लाइफ जेकेट पहनी थीं .इसके बाद जब बनाना राइड पर गए तो बीच समुद्र में जाकर वह रुक गयी ओर नाविक ने कहा कूदो. 
क्ययायाया?????बस यही निकाला मेरे मुंह से. अथाह समुद्र, लहराता पानी उसमे कूद पड़ना. 
पानी कितना गहरा है? 
५-१० फीट .(अब ५ या १० इसमें कोई फर्क तो है नहीं.)
मैडम डरो नहीं साथ में लाइफ गार्ड हैं. मैंने पीछे देखा दो लाइफ गार्ड पानी में उतर रहे थे.तब तक धम्म की आवाज़ आयी ओर छोटी बिटिया पानी में. वह लहरों के साथ खेल रही थी.उसे पानी में देख कर पिताजी कैसे रुक सकते थे वह भी तुरंत पानी में कूद गए. ओर फिर बड़ी बिटिया भी. ओर हमारी नाव आगे बढ़ गयी .में तो मुड़ मुड़ कर सबको देखती ही रह गयी. एक चक्कर लगा कर हमने सबको वापस नाव पर चढ़ाया तब जान में जान आयी. जब वापस आये एक बहुत बहुत अद्भुत आनंद  से सब भरे हुए थे. इतने बड़े समुद्र में अथाह पानी के बीच खुद को पाना रोमांचित करने वाला तो था ही बहुत कुछ सोचने ओर समझने वाला अनुभव भी था. ऐसे में अगर कोई बड़ी लहर आ जाती  ?कोई भंवर  पानी में खींच लेती या कोई बहुत छोटा सा ही लेकिन जहरीला समुद्री जीव ही..खैर विचार तो विचार ही है इन्हें  कोई रोक तो नहीं सकता .लेकिन ये तय है की इन्सान अभी भी प्रकृति की विशालता के आगे बहुत तुच्छ है फिर चाहे  वह कितना ही बड़ा  होने  का दंभ भरे. 
हमारे कुछ ही दूर पर एक ओर परिवार था मेरी उस लेडी से कई  बार नज़रें  मिलीं  ओर लगा की वह भी मुझसे  बात करना  चाहती  है .
थोडा  पास  आने पर उन्होंने  पूछा  आप  कहाँ  से आये हैं? 
इंदौर से .
इंदौर  से??इतनी दूर से आप यहाँ समुद्र में नहाने आये हैं?
हाँ क्या करें हमारे इंदौर में समुद्र नहीं है ना.मैंने हँसते  हुए कहा. 
हाँ मेरी आंटी भी कहती है आप  लोगो के लिए कितना बढ़िया  है ना पास  में कभी भी आ  जाओ  
वे लोग पूना से आये थे .
उस दिन भी करीब ३ घंटे  हम वहां    रहे. सच  कहें  जाने का बिलकुल  भी मन नहीं था,लेकिन आज हमें वापस निकलना था .
पूना  हमारा  अगला पड़ाव  था जो यहाँ से करीब १९०  किलोमीटर  दूर है .
तय  हुआ नाश्ता  करके जल्दी निकला  जाये  ओर  खाना कहीं रास्ते में खाया जाये. 
poona expres high way 
अभी  तक गाड़ी पतिदेव ही चला रहे थे. अभी तक के सफर में समय कम था ओर मंजिल दूर इसलिए मैंने भी जिद नहीं की .लेकिन आज तो समय भरपूर था. हम पूना जाने के लिए एक्सप्रेस हाई वे पर पहुंचे ओर गाड़ी मैंने ले ली. इस हाई वे पर गाड़ी की एवरेज स्पीड ८० किलोमीटर /अवर है. थोड़े आगे गए ही थे की लोनावाला घाट प्रारंभ हो गया. घुमावदार रास्ते एकदम खडी चढ़ाई बीच में पड़ने वाली ३ टनल बहुत रोमांचक अनुभव था. करीब ५२ किलोमीटर का घाट चढ़ कर हमने खाना खाया ओर फिर...हाँ जी गाड़ी रोकते समय ही मुझे पता था अब गाड़ी मुझे नहीं मिलेगी लेकिन क्या करें बच्चों को भूख लग रही थी इसलिए गाड़ी तो रोकना ही थी. रास्ते में नया बन रहा सुब्रतो राय स्टेडियम दिखा .हम करीब ४ बजे पूना पहुंचे.दीदी के यहाँ का रास्ता ढूँढने में पसीना छूट गया. पूना इतनी बड़ी सिटी है जहाँ एक ही नाम की कई जगहें है.वो तो भला हो सेल फोन का की हम जीजाजी से लगातार संपर्क में रहे .यहाँ भी हमें कई लोगो से उनकी बात करवानी पड़ी रास्ता समझने के लिए.एक तो वहां सारे रोड वन वे हैं इसलिए एक मोड़ चुके तो आप यूं टर्न के लिए करीब २-३ किलोमीटर आगे पहुँच जाते हैं. 
मुंबई शौपिंग कैंसिल करवाने के बदले बच्चों को पूना में शोपिंग करवाना थी सो शाम को फिर निकल गए. पूना में वैसे तो गर्मी बहुत है लेकिन यहाँ शामे बहुत ठंडी होती हैं.हर सडक के किनारे हरियाली है.शहर की प्लानिंग बहुत अच्छी है ट्राफिक फास्ट है. 
दूसरे दिन सुबह हमें फिर नासिक जाना था त्रयम्बकेश्वर दर्शन करते हुए वापसी. दिन के समय नासिक शहर भी साफ सुथरा दिखा. त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग है यहाँ करीब २५ साल पहले आयी थी तब से अब तक काफी कुछ बदल गया है.हा लोगो की घूमने की इच्छा ,खर्च करने की शक्ति भक्ति सब कुछ .कुछ एक प्रबंधों के साथ मंदिर वही है लेकिन भगवान शासन  तंत्र के आगे बेबस. ये कहें की भगवान तंत्र के बंदी हैं तो भी गलत नहीं होगा.वैसे हमारे सरकारी तंत्र जिस अंग्रेज मानसिकता के साथ जी रहे हैं ओर भारतियों को जिस तरह दोयम दर्जे का समझते है वह कहीं अधिक शोचनीय है शाहरुख़ या आई पी एल के किसी खिलाडी के व्यवहार की चिंता करने से. मुझे तो लगता है हर धार्मिक या दर्शनीय स्थल पर तैनात सुरक्षा कर्मी या स्वयं सेवक को कम से कम एक सामान्य  नागरिक के अधिकार बता कर एक सामान्य  व्यवहार  करने की ट्रेनिंग तो दी ही जानी चाहिए. खैर दर्शन करने के बाद चिलचिलाती धूप में जलते पैरों के साथ गाड़ी में बैठे .बस अब खाना खा कर अगला पड़ाव था वापस अपना घर. 
 मंजिल दूर थी  रास्ते में खाना खाते हुए हम रात २ बजे घर वापस पहुंचे .एक छोटी सी लेकिन सुकून भरी आनंददायी यात्रा पूरी करके. अलीबाग यात्रा २ 

Sunday, May 20, 2012

अलीबाग यात्रा

इस साल छुट्टियों में घूमने जाने का कार्यक्रम बना अलीबाग का .वही समय की कमी इसलिए ज्यादा दूर जा नहीं सकते.अचानक के प्रोग्राम में रिजर्वेशन  नहीं मिलता इसलिए कार से ही जाना तय हुआ.(वैसे भी न रिजर्वेशन की कोशिश की न ट्रेन से जाने का सोचा).बस तय हुआ की शनिवार की शाम निकलेंगे रात नाशिक में रुकेंगे .फिर आगे का कार्यक्रम..
बच्चों ने ट्रेवल xp पर नासिक में सुला वाइनरी देखी थी और उन्हें वहां जाना था. रोमांच इस बात का की हम वो जगह देखेंगे जो ट्रेवल xp पर देखी है .वैसे तो वहा उनका रेसोर्ट भी है लेकिन वहां रुकना बहुत महंगा था. इसलिए नेट पर रुकने के लिए होटल्स ढूँढना शुरू हुआ.और जल्दी ही एक होटल मिल भी गया. फिर अलीबाग की व्यवस्था के लिए ट्रेवल एजेंट के पास गए उसने जो रेसोर्ट बताये वो बहुत ही महंगे थे .लौटते में पूना जाना था वहां कजिन सिस्टर रहती हैं और जिस दिन हमारा कार्यक्रम बना उसी दिन वो लोग भी अलीबाग में थे. जीजाजी ने कहा अरे आप लोगो की आराम से रुकने की व्यवस्था हो जाएगी में एक दो नंबर देता हूँ . बस फिर क्या था बात बन गयी.
तो शुक्रवार शाम हमने अपनी यात्रा शुरू की.नासिक ४३० किलोमीटर था सोचा था रात १२ बजे तक पहुँच जायेंगे. लेकिन AB रोड पर इतना ट्राफिक की गाड़ी की स्पीड  ही नहीं बन पा रही थी. एक तो वीक एंड का ट्राफिक भी था. बिना रुके चलते रहे तब भी रात के २ बज गए. अब होटल ढूंढना बड़ी टेढ़ी खीर थी इतनी रात कोई सड़क पर था भी नहीं .होटल में लगातार बात हो रही थी लेकिन न कोई साइन बोर्ड था न रास्ता सूझ रहा था.एक बार तो लगा की आज रात तो होटल मिलने से रहा. एक तो मराठी नाम इतने मुश्किल थे याद करना ,की बात करते समय हा हूँ कर देते और फिर सड़क गली के नाम भूल जाते.भगवन को याद किया ही था की लूना से एक आदमी आता दिखा. उसे  रोक कर होटल में बात करवाई और फिर उसके पीछे पीछे होटल पहुंचे.उस समय वह व्यक्ति सच में भगवन का भेजा दूत ही लगा.होटल में सब हमारा ही इंतजार कर रहे थे. रात १० बजे से बात हो रही थी और हम पहुंचे रात २:३० पर. लेकिन साफ सुथरा होटल देख कर तबियत खुश हो गयी. बस सामान रखा हाथ मुह धोया और लम्ब लेट हो गए. 
सुला  वाइनरी दिन के ११:३० बजे खुलती है शहर से दूर इस गर्मी में दूर दूर तक फैले अंगूर के बगीचों की हरियाली ने मन मोह लिया. साफ सुथरी क्यारियां तरतीब से फैली बेलें .सुला में पर पर्सन टूर का चार्ज था १५० रुपये जिसमे ४ किस्म की वाइन को टेस्ट करना शामिल था. यहाँ जनवरी  से मार्च के बीच हार्वेस्टिंग सीजन रहता है अभी तो खेत खाली थे.पूरे टूर में हमारे गाइड ने अंगूर तोड़ने उसके संग्रहण से लेकर विभिन्न तरह की वाइन  बनाने की पूरी प्रक्रिया हमें समझाई. उसके स्वाद और रंग के लिए किये जाने वाले ट्रीटमेंट से लेकर बोटलिंग तक सब हमने देखा. फिर हम पहुंचे टेस्टिंग रूम. वहां से बिना परमिट के २ लीटर और परमिट पर ९ लीटर वाइन खरीद सकते थे.जब सुला से बाहर निकले एक नयी जगह नयी चीज़ देखने की संतुष्टि थी. 
आगे का सफर था अलीबाग का जो यहाँ से करीब ३०० किलोमीटर था. खाना खा कर सफ़र शुरू हुआ. हालाँकि रास्ता अच्छा था लेकिन बिना डिवाइडर ओर वीक एंड के ट्राफिक में गाड़ी चलाना वाकई मुश्किल था.बहुत कोशिश करके भी एवरेज स्पीड ५५-६० से ज्यादा नहीं आ पा रही थी. रास्ते में होटल से फ़ोन आया की हम आ रहे है या नहीं?या हमारा रूम किसी को दे दिया जाये. हमने भरोसा दिलाया की नहीं हम आ रहे है और ९ बजे तक पहुंचेंगे. दरअसल अभी तक सिर्फ फोन पर बात हुई थी और हमने कोई डिपोसिट  नहीं दिया था.सारा काम विश्वास पर चल रहा था.वहां भी भाषा की समस्या सामने  आयी. रास्ते  में किसी और से फ़ोन पर बात करवाई तब ढूँढते हुए हम अपने रेसोर्ट पहुंचे. 
अलीबाग पुरानी बस्ती है और वहां के बीच अभी नए नए डेवेलप हो रहे है वहां के  रहवासी अपने पुराने घरों के ही एक हिस्से को तुडवा कर या रिनोवेट करवा कर उसे रेसोर्ट का रूप दे रहे है. ये लोग बहुत प्रोफेशनल नहीं हैं .उन्ही के किचन  में खाना बनता है, जब  हम पहुंचे तो वहां रेसोर्ट के मेनेजर के नानाजी आये हुए थे. वो कहने लगे आपने बहुत देर कर दी. आप लोगों ने कोई डिपोजिट भी नहीं किया था ऐसे कैसे भरोसे पर सामने आये कस्टमर को लौटा दें वगैरह वगैरह. हमारे दो रूम तो बुक थे लेकिन वो अगल बगल में न हो कर अलग अलग मंजिल पर लेकिन आमने सामने थे. खैर वहां का पूरा माहौल घरेलू था इसलिए चिंता नहीं हुई. बेटियों ने झट फर्स्ट फ्लोर  का रूम ले लिया . बस नहा के फ्रेश हुए तब तक खाना लग गया ओर खाना खा कर हम  अगले दिन की प्लानिंग के साथ सो गए . 
देर  रात तक गाड़ियों के शोर सुनाई देते रहे ओर सुबह चार बजे से फिर गाड़ियाँ. आखिर ६ बजे सब उठ ही गए बीच पर जाने को तैयार.समुद्र तो बच्चों ने पहले भी देखा था लेकिन इस बार तय्यारी  लहरों के साथ खेलने की थी. बच्चे तो तुरंत पानी में पहुँच गए और में किनारे पर खड़ी समुद्र की विशालता और उसके सामने इन्सान की...खैर विचार कहाँ पीछा छोड़ते है .
 नागांव बीच अलीबाग का नया विकसित हो रहा बीच है .साफ सुथरा रेतीला किनारा दूर दूर तक फैला है .यहाँ वाटर स्पोर्ट्स भी है तेज़ रफ़्तार से पानी में चलने वाली बाइक, बनाना राइड,वेलोसिटी राइड .अथाह पानी में इतनी तेज़ गति से जाना रोमांचक भी था और डराने वाला भी .थोड़ी देर तो में दूर खड़ी लहरों को देखती रही बच्चों के फोटो लेती रही लेकिन फिर सबने मिल कर मुझे भी पानी में खींच ही लिया. बड़ी छोटी लहरें उनमे डूबना उतराना.लहर आने पर जम्प लगाना .धूप तेज़ थी लेकिन पानी में महसूस नहीं हो रही थी. हम करीब दो घंटे पानी में रहे लेकिन ठण्ड भी नहीं लगी. इसकी बजाय अगर दो घंटे किसी नदी में रहते  तो सब ठिठुरने लगते. उस दिन बच्चों ने बाइकिंग  की जब तक वो पानी में रहे एक पल को नज़रें उन पर से नहीं हातीं.हालाँकि वो इतनी दूर थे की न तो उन तक आवाज़ पहुँच सकती थी न ही कोई मदद. 
nagao beech 
जब समय को पकड़ने की कोशिश न की जाये या उसे किसी सीमा में बांधा न जाये तो वह भी अपने पूरे विस्तार के साथ आपके साथ होता है. हमने जितना भी समय वहां गुजारा वह अपने पूरे विस्तार के साथ हमें मिला न कहीं जाने की हड़बड़ी न कोई काम ख़त्म करने की चिंता. इन २-३ घंटों में जैसे सिर्फ समुद्र का विस्तार लहरों की मौज हमारे साथ थी.जिसके सामने चिंता फिक्र काम सब लहरों के साथ रेत से बह गए थे. मन प्रफुल्लित था इसलिए कोई थकावट नहीं थी .
रेसोर्ट पहुँच कर नहाया नाश्ता किया उसके बाद क्या किया जाये? तभी याद आया आज तो सत्य मेव जयते आने वाला है .बहुत सालों बाद ऐसा लगा जैसे रामायण के युग में ( धारावाहिक ) पहुँच गए हैं. जब ९ बजते ही सब काम धाम छोड़ कर टीवी के सामने बैठ जाते थे. ब्रेक में दिन की प्लानिंग होने लगी. आते हुए हम कल्याण से निकले थे.वहां के मार्केट में खरीदी की बहुत इच्छा थी लेकिन अंजान जगह समय से पहुंचना ही ठीक है ये सोच कर नहीं रुके थे. इसलिए बच्चों का मन था मुंबई जा कर शौपिंग की जाये. लेकिन वहा से ४० कम दूर से फेरी मिलती और वहां तक जाना वो भी सन्डे के ट्राफिक में मन नहीं हुआ. जैसे तैसे उन्हें समझाया की पापा कब से ड्राइव कर रहे है आज उन्हें आराम करने दो  अभी पुणे जाना है वहां देखते हैं.

थकान कोई खास नहीं थी इसलिए ३ बजते बजते सब उठ गए.अब भूख लगी थी रेसोर्ट का मेस तो बंद हो गया था .अलीबाग के एक रेस्टारेंट में खाना खाया और वही से वर्सोली बीच चले गए सन सेट देखने .देर तक रेत में टहलते रहे ओर सन सेट के बाद भी देर तक वहीँ बैठे रहे. भूख कोई खास नहीं थी इसलिए मार्केट से कुछ हल्का फुल्का बेकरी आइटम ले लिया ताकि रात में जरूरत हो तो खाया जा सके. सन्डे  की रात रेसोर्ट पूरा खाली हो चूका था. सड़क बिलकुल शांत थी.थोड़ी देर गपशप करके टी वी देखा फिर अगले दिन किस किस राइड पर जाना है ये प्लानिंग करके सो गए. (क्रमश ) छुट्टी,अलीबाग,यात्रा ,समुद्र  

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...