Monday, November 3, 2025

पर्वतों की रानी सतपुड़ा

 पचमढ़ी मध्यप्रदेश का एकमात्र हिल  स्टेशन है जो सतपुड़ा पर्वत पर स्थित है। यहीं सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी है और भवानी प्रसाद मिश्र की प्रसिद्ध कविता 'सतपुड़ा के घने जंगल ऊँघते अनमने जंगल' को शब्दशः देखने महसूस करने का उत्तम स्थान। यहाँ जाने के लिए एकमात्र सड़क मार्ग है जहाँ बस टैक्सी या अगर बेहतरीन ड्राइवर हैं तो स्वयं की गाड़ी से जाया जा सकता है। 

हमने इंदौर से सुबह आठ बजे यात्रा शुरू की ताकि शाम होने तक पचमढ़ी पहुँच जाएं। रास्ता बढ़िया है मटकुली के बाद पहाड़ी रास्ता शुरू हो जाता है। शाम साढ़े चार बजे पहुँचे थोड़ी देर में अंधेरा हो जाता इसलिए बस आराम किया। 

पचमढ़ी में कुछ स्थानों पर अब सिर्फ़ सफारी जिप्सी से जाया जा सकता है जिसमें छह लोग जा सकते हैं। हमने शेयरिंग के लिए होटल में बोल दिया और एक कपल का साथ मिल गया। 

अगले दिन सुबह बादल उतर आये थे फिर हल्की बारिश होने लगी। खुली धूप में कैसे जाएंगे? लेकिन नाश्ता करने तक बारिश रुक गई हल्की धूप निकल आई। शेयरिंग जिप्सी में हम चार लोग निकले सबसे पहले पाण्डव गुफाएं देखने। एक पहाड़ी के अलग अलग स्तर पर बनी छोटी बड़ी पाँच गुफाएँ। वहाँ तक जाने के लिए पुरानी पत्थर की अनगढ़ सीढियाँ। धूप हो गई थी एक बार लगा इतनी सीढ़ियाँ नहीं चढ़ पाएंगे लेकिन ये क्या चढ़ गये। इन गुफाओं का पाण्डवों से कोई लेना देना नहीं है बस न जाने कैसे नाम पड़ गया। हाँ ये काफी पुरानी हैं और आश्चर्य चकित करती हैं। इसके सामने बेहद खूबसूरत गार्डन है जो ऊपर से देखने पर बहुत सुन्दर लगता है। 

पाण्डव गुफाओं के बाद अगला पड़ाव था बायसन लाॅज जो अब एक म्यूजियम में बदल चुका है। ब्रिटिश काल की यह इमारत अपने रंग रूप और परिसर के कारण बेहद आकर्षक है। यहाँ पचमढ़ी के दर्शनीय स्थल यहाँ के जनजातीय और वन्य जीवन आदि के कुछ चित्र कुछ मूर्ति आदि हैं। बढ़िया बात यह है कि यहाँ कोई टिकट नहीं है लेकिन यहाँ से बी फाल जाने के लिए परमिट बनवाना पड़ता है। हम तो चले गए म्यूजियम देखने और हमारे ड्राइवर लग गये लाइन में। हम घूमफिर कर वापस आ गये लेकिन वे लाइन में ही खड़े थे। हमने थोड़ा समय इधर-उधर काटा कुछ फोटो लीं।

पिछले आठ दस वर्षों में पर्यटन में बहुत बदलाव आया है अब वह उद्योग है। उद्योग है तो उसके कई नियम कायदे हैं । पचमढ़ी में अब हर दर्शनीय स्थल पर प्रायवेट गाड़ियाँ नहीं जा सकतीं। सिर्फ उन स्थलों पर जो आसान राह पर हैं वहीं आप अपनी गाड़ियों से जा सकते हैं। अन्य स्थानों पर फोर व्हील ड्राइव वाली जिप्सी ही चलती हैं चलाने वाले स्थानीय लोग ही होते हैं। इन गाड़ियों के मालिक वही लोग हैं लेकिन ये वन विभाग से अटैच्ड हैं और जरूरत के अनुसार वहाँ से बुकिंग के आधार पर भेजी जाती हैं। इनका किराया डिमांड सप्लाई के आधार पर हर दिन तय होता है जो तीन से पाँच हजार के बीच होता है। इन गाड़ियों में कौन जा रहा है उनकी जानकारी भी ली जाती है। अगर कोई अपनी गाड़ी से किसी ऐसे स्थान पर जाता है तो उसे एंट्री पाइंट पर गाड़ी रोककर पैदल जाना होता है जो लगभग तीन-चार किमी दूर होता है। जाते हुए तो लोग खुशी से चले जाते हैं लेकिन लौटते उनकी हालत खराब हो जाती है। लेकिन कोई भी तय सवारी के अलावा किसी को नहीं बैठा सकता वर्ना दो हजार का जुर्माना और एक हफ्ते के लिए गाड़ी बाहर कर दी जाती है। 

सुनने में ये परेशान करने वाला लग सकता है लेकिन इसका असर वहाँ देखने को मिलता है। ये जिप्सी तय स्थान पर ही रुकती हैं बीच में कोई नहीं रुकता जिससे जंगल साफ रहता है उसमें लोगों का शोर नहीं भरता। जंगल वन्य जीव और पक्षी सुरक्षित रहते हैं।

हाँ यहाँ भी जिप्सी के हार्न थोड़ा परेशान करते हैं लेकिन बिलकुल अंधे मोड़ और खड़ी चढ़ाई पर ये जरूरी भी होते हैं।

बायसन लाॅज देखने के बाद अगला पड़ाव था बी फाॅल। बी यानी मधुमक्खी जी हाँ यहाँ मधुमक्खी बहुत ज्यादा हैं इसीलिए जंगल में आग जलाना बीड़ी सिगरेट पीना निषेध है लेकिन पीने वाले पीते हैं उनमें फारेस्ट गार्ड भी होते हैं।

जिप्सी ने हमें फाल से लगभग दो सौ मीटर दूर उतारा। वापस आने का समय डेढ़ घंटे बाद का तय हुआ। पथरीले रास्ते सीढ़ियों से हम पहुँचे ऊपर वाली पहाड़ी नदी पर जो आगे जाकर लगभग चार सौ फीट नीचे गिरती है। इस नदी में इस समय तेज बहाव था क्योंकि इस बार बारिश अभी हो ही रही है। वहाँ बहुत लोग नहा रहे थे कुछ पानी में पैर डाले बैठे थे। किनारे के व्यू पाइंट से झरने की आवाज भर सुनाई दे रही थी। मैं चूँकि दस ग्यारह वर्ष पहले स्कूल के बच्चों की ट्रिप में आई थी इसलिए बहुत सारी यादें ताजा हो गईं।

"नीचे चलना है" पूछा था या कहा था या दोनों बात थीं। जवाब में पतिदेव थोड़ा हिचकिचाए। चार सौ मीटर नीचे।

"चलो न धीरे-धीरे पहुँच ही जाएंगे। जब इतनी दूर आये हैं तो थोड़ा और सही।" जवाब का इंतजार नहीं किया मैंने। हालाँकि थोड़ी आशंका थी मन में। बायपास के बाद ऐसी चढ़ाई मुश्किल तो नहीं होगी। लेकिन मैं भी तो चढ़ी थी और बहुत लोग आ जा रहे हैं। बच्चे बड़े बूढ़े हम भी आ जाएंगे।

धीरे-धीरे उतरना शुरू किया। ये क्या पहले जो प्राकृतिक सीढ़ियाँ थीं पत्थरों की जमावट उनके स्थान पर अब लाल पत्थरों की पक्की सीढ़ियाँ हैं। उन पर गिरे पत्ते पानी में गल गये थे इसलिए फिसलन हो सकती थी। चूँकि सतपुड़ा के ये पहाड़ ज्वालामुखी के लावे से ढँक कर कड़े मजबूत हो चुके हैं इसलिए इनमें ज्यादा तोड़ फोड़ कर छेड़छाड़ नहीं की गई है। इसलिये सीढ़ियाँ कम ज्यादा ऊँची थीं।

उतरते हुए बहुत थकान नहीं हुई लेकिन पसीने ने परेशान किया। बस पंद्रह मिनट लगे हमे नीचे पहुँचने में जबकि सीढ़ियों के कारण रास्ता कुछ ज्यादा लंबा हो गया है। हाँ उमस बहुत ज्यादा थी क्योंकि पहाड़ काफी नजदीक थे आसपास घने पेड़ नमी। जब नीचे पहुँचे विशाल खूबसूरत प्रपात पानी की बारीक बूँदों को उड़ाकर न नहाने वालों को भी सराबोर कर रहा था।

नीचे गीले पत्थरों की उबड़ खाबड़ जमावट खतरनाक थी। जरा पैर फिसला और चोट लगना तय था। पानी के पास जाने में कोई समझदारी नहीं थी क्योंकि हमें नहाना नहीं था। न हम कपड़े लाये थे न विचार था। हमने कुछ फोटो लिये और वापस ऊपर जाने लगे। तय किया कि ऊपर पानी में पैर डालकर बैठेंगे। हमने समय देखा और चढना शुरू किया। जानना था ऊपर पहुँचने में कितना समय लगा।

अब मन में उत्सुकता थी कि ऊपर कितनी देर में चढ़ पाएंगे। रास्ते में बहुत भीड़ थी इसलिए तेज तो चला नहीं जा सकता था। उमस पसीना भी परेशान कर रहा था। हमारे पास पानी की बोतल थी लेकिन हम बहुत संभलकर एक एक घूँट पानी पी रहे थे। ज्यादा पानी पीने से पेट में वजन हो जाता है जिसे ऊपर चढ़ते उठाने में दिक्कत आती है। यह मैंने शिलांग में लाइव रूट ब्रिज पर चढ़ते हुए जाना। 

लगभग बीस मिनट में हम ऊपर थे। अब प्यास भी लगी थी और पसीना काफी निकल चुका था इसलिए थोड़ा नमक थोड़ी शक्कर लेना जरूरी था। हमने नींबू पानी पिया। अच्छी बात यह थी कि यहाँ डिस्पोजेबल ग्लास नहीं थे इसलिए कचरा नहीं था। आसपास मधुमक्खियाँ उड़ रही थीं।

हम लोग झरने वाली नदी के किनारे आ गये जूते उतार कर पानी में पैर डाला ही था कि पतिदेव ने एकदम झटके से पैर बाहर निकाला।

"मछलियाँ काट रही हैं।"

"अरे ऐसे कैसे?" मैंने भी पानी में पैर डाले और कुछ ही सेकेंड में पैरों में गुदगुदी सी होने लगी। तीन-चार छोटी छोटी मछलियाँ पैरों की चमड़ी खा रही थीं।

"अरे ये तो फिश पेडीक्योर है" बहुत पहले इसके बारे में पढ़ा था। "पैर पानी में करे रहो लोग इसके लिए हजारों रुपये देते हैं यहाँ फ्री में हो रहा है।"

पसीने से पैरों की त्वचा फूल गई थी और मछलियों की दावत हो रही थी। अहा कितना अच्छा लग रहा है। कभी-कभी छह सात मछलियाँ आ जातीं और हमें पैर झटककर बाहर निकालने पड़ते।

हम लगभग घंटे भर पेडीक्योर करवाते रहे। हमारा जाने का समय हो गया था पैर बाहर निकाले तो महसूस हुआ कि पैर कितने मुलायम और चिकने हो गये हैं। क्या सच में इतनी डेड स्किन होती है? पता नहीं लेकिन पैर सच में बहुत अच्छे हो गये।

हमने जूते पहने और पार्किंग तक गये। वहाँ बहुत सारे फारेस्ट गार्ड थे कुछ जिप्सी में साथ आये थे कुछ वहीं ड्यूटी पर थे। वहाँ तकरीबन दो सौ गाड़ियाँ थीं उनमें अपनी गाड़ी नंबर से पहचानना कठिन था लेकिन तभी हमारे ड्राइवर ने हमें देख लिया और हाथ हिलाकर आवाज लगाई।

हम तो पहुँच गये थे लेकिन हमारे सहयात्री अभी तक नहीं आये थे। अब फाॅल से लौटने वाले अपनी जिप्सी ढूँढकर उसमें बैठकर जाने लगे थे। कई लोग पैदल जा रहे थे उनकी गाड़ी गेट के बाहर करीब तीन किमी दूर खड़ी थी। वे बुरी तरह थके हुए थे कुछ गीले कपड़ों में थे। निश्चित ही उन्हें नहीं पता था कि यहाँ क्या मिलने वाला है वे बस आ गये थे और इतना सुंदर प्रपात निर्मल पानी देखकर खुद को रोक नहीं पाये। वे वहाँ से कोई सवारी देख रहे थे जो उन्हें गेट पर उनकी गाड़ी तक छोड़ दे लेकिन कोई इसके लिए तैयार नहीं था। ड्राइवर ने कहा इस समय ये दो हजार रुपये तक देने को तैयार हैं लेकिन दिन भर के लिए चार हजार देने में कंजूसी करते हैं। अब इस बात पर क्या ही कहा जाये। जो अपनी गाड़ी से आते हैं वे अलग से गाड़ी के लिए हजारों रुपये क्यों दें और उन्हें पता भी कहाँ होता है कि कैसी जगह है कितनी दूर पैदल चलना होगा कैसा रास्ता होगा कितनी चढ़ाई होगी। वे बस चले जा रहे थे।

ड्राइवर ने बताया वह पहले ट्रक चलाता था फिर बस चलाने लगा अभी सात आठ साल से अपनी गाड़ी ले ली। अब बच्चे कहते हैं यहीं रहो बाहर मत जाओ। उसके घर उसी दिन पोती का जन्म हुआ था और वह गाड़ी चला रहा था।

हम गाड़ी में बैठकर इंतजार कर रहे थे पर्यटक अभी भी आते जा रहे थे। पैदल जाने वालों को देखते मेरे मन में भी पैदल चलने की इच्छा होने लगी। आधा घंटा हो गया था इंतजार करते मुझे लगा अगर अभी पैदल चलना शुरू करूँगी दस पंद्रह मिनट में वे लोग आ ही जाएंगे। मैं भी आधा पौन किमी चल लूँगी। पतिदेव का मन नहीं था रास्ता बस एक था सिर्फ जंगल और इतनी गाड़ियों की आवाजाही के बीच भालू के आने की संभावना नहीं के बराबर थी।

मैं चल पड़ी बस एक मोबाइल लेकर जिसमें नेटवर्क नहीं था। करीब दो सौ मीटर तक सड़क के किनारे जिप्सी खड़ी थीं उसके बाद बस जंगल और मैं। अहा क्या अद्भुत क्षण थे हरे भरे घने पेड़ लाल मिट्टी कहीं किसी मोड़ पर मिल जाता बहता पानी। लगातार ऊपर चढ़ती इस सड़क पर धूप छाँव के बीच मैं चलती जा रही थी।

वैसे तो वहाँ किसी का कोई डर नहीं था लेकिन लगातार लोगों के बीच शहरी शोरगुल के बीच रहने के कारण यह शांति भली लगते हुए भी सहज नहीं होने दे रही थी। मैं पचमढ़ी और अब इस एकांतिक ट्रेकिंग पर इसी शांति और जंगल को महसूस करने ही तो आई थी लेकिन फिर क्यों बार बार पीछे मुड़कर देख रही थी? मन में ख्याल था कि गाड़ी तो नहीं आ रही है फिर ख्याल आता अभी न आये थोड़ा और चल लूँ।

शहरों में पैदल चलना छूट गया। इंदौर में सड़क किनारे घूमने में कभी सहजता महसूस नहीं होती। आसपास के पार्क में अब इतनी जगह ही नहीं है कि घूम सकें।

तभी चार पाँच लड़के दिखे। उनकी गाड़ी भी शायद गेट के बाहर होगी। वे बातें हँसी मजाक करते पैदल चलते हुए सड़क से उतर कर जंगल की पगडंडी से ऊपर की सड़क पर चले जाते। रोमांचक तो था लेकिन मैं जो कर रही थी वह भी अपने आप में काफी रोमांचक था। आडे टेढ़े रास्ते पर जाकर पैर मोचाने का रिस्क लेना ठीक नहीं है। फिर वे जवान लड़के हैं और मुझे अपनी उम्र पता है। हम आगे पीछे चलते रहे।

करीब डेढ़ दो किमी बाद वह खड़ा तीखा मोड़ आया और मुझे याद आया कि जब स्कूल के बच्चों के साथ आये थे तब हम यहाँ काफी देर रुके थे। वे लड़के एक मोड़ पीछे रुक गये थे मैं ऊपर थोड़ी देर रुकी कुछ फोटो लिये तब तक वे लोग भी आ गये।

अब तो काफी देर हो चुकी थी। थकान तो नहीं थी लेकिन पतिदेव जरूर चिंता कर रहे होंगे उनकी इस चिंता की चिंता मुझे होने लगी। पता नहीं साथ वाले आये या नहीं। पतिदेव बीच में फँस गये अब न गाड़ी छोड़कर पैदल आ सकते हैं न वहाँ रुक पा रहे होंगे ।अब तो एंट्री पाइंट भी आने वाला होगा। वे लड़के आगे निकल गये मैं थोड़ा धीरे धीरे चलती रही तभी पीछे से हार्न सुनाई दिया। पीछे मुड़कर देखा जिप्सी की गति धीमी हो गई थी।

अहा सारी चिंता दुश्चिंता विचारों से मुक्ति। मैं गाड़ी में बैठ गई। सहयात्री ने मुझे पानी दिया। हम आगे बढ़े। वे लड़के दिखाई दिये। मैंने उन्हें देखकर हाथ हिलाया जोर से कहा "थैंक्यू"

क्या पता आगे जाकर वे देखते कि मैं पीछे नहीं आ रही हूँ और सोचते कि कहीं कुछ हो तो नहीं गया? वैसे मैं उनकी जिम्मेदारी नहीं थी लेकिन मुझे पता था कि उन्हें पता है कि मैं अकेली जा रही थी इसलिए उन्हें ये बताना कि मैं गाड़ी में चली गई हूँ ठीक लगा।

ड्राइवर ने कहा "आप तो बहुत चल लीं।"

इससे अच्छा पुरस्कार इस हिम्मत के लिए और क्या होगा?


अगला पड़ाव था लंच के लिए किसी रेस्टोरेंट में जाना। जिप्सी ड्राइवर के पास दो तीन आप्शन होते हैं। यहाँ खाएंगे वेज है या

किस्मत से हमारे साथ वाले भी वेजिटेरियन थे हमने एक रेस्तरां को मना किया क्योंकि वहाँ वेज नानवेज दोनों थे लेकिन अगला शुद्ध शाकाहारी देखकर वहीं रुक गये। ड्राइवर से खाने का पूछा तो वह बोले मैं यहीं स्टाफ के साथ खा लूँगा। वैसे भी पर्यटकों को लाने वाले ड्राइवर गाइड के लिए खाना मुफ्त होता है खरीद पर चालीस प्रतिशत तक कमीशन होता है और सब कुछ जानते हुए भी दुनिया का कारोबार यूँ ही चलता रहता है। रेस्तरां में बहुत भीड़ थी। एक हाॅल में आर्डर कर के खा सकते थे दूसरी तरफ था बुफे। 300 /-प्लेट। हालाँकि कीमत ज्यादा थी लेकिन आगे और दो पाइंट देखने थे इसलिए इंतजार करने का समय नहीं था। सीजन की भीड़ में सारा ध्यान बस खिलाने पर था बहुत बेसिक सा सेट अप साफ-सफाई बस उतनी जितने में खा सकें। हाँ खाने का स्वाद अच्छा था बिलकुल घर के खाने जैसा। दो सब्जी कढी दाल चावल सलाद पापड़ रोटी नान तंदूरी और खीर। बाहर एक पान की दुकान भी थी चालीस रुपये का एक पान। पिछली रात खाने के बाद टहलने गये थे तब पान खाया था और ज्यादा चूने ने मुँह खराब कर दिया था इसलिए बोलकर कम चूने वाला पान बनवाया।

धूप तेज थी सुबह से काफी दौड़ धूप हो चुकी थी खाने के बाद अब बस पसर जाने का मन था लेकिन धूपगढ़ सिर्फ जिप्सी से जाया जा सकता था इसलिए होटल नहीं जा सकते थे। अब पेट भरा तो थकावट भी चढ़ी और आलस भी। खैर हम पहुँचे रीछगढ़ या रिचगढ़।

अच्छा मजेदार बात है कि 75 साल बाद भी इसका एक नाम तय नहीं हुआ है। किसी स्थानीय ने रीछ देखा था इस गुफा में इसलिये यह रीछगढ़ है और दो बड़ी चट्टानें आपस में मिलकर एक रिज बनाती हैं इसलिए रिच गढ़ है।

वहाँ ऐसी भीड़ थी जैसे मुफ्त में जलेबियाँ बँट रही हों। ऊबड खाबड़ पत्थरों के बीच से बोलते बतियाते चीखते चिल्लाते हँसी मजाक करते लोग अपनी क्षमता अनुसार रास्ता ढूंढ कर नीचे उतर रहे थे। वह विशाल गुफा शोर से भरी हुई थी। कोई बगल में एक छोटी अंधेरी गुफा में जा रहा था तो कोई नीचे उतर कर पीछे के परकोटे में।

उतरना आसान नहीं था एक बार मन हुआ छोड़ दें फिर मन को समझाया आये हैं तो देखें तो कितना बदलाव हुआ है।

अच्छा लगा देखकर कि यह जगह बिलकुल भी नहीं बदली थी। पीछे दो चट्टानें वैसे ही माथा जोड़े न जाने क्या बातें कर रही थीं। सदियाँ बीत गईं उनकी बातें खत्म नहीं हुईं और लगता है अगली कई सदियों तक होंगी भी नहीं। लोग आते रहेंगे उनका पहनावा बातें रंग ढंग बदलते रहेंगे उनकी उत्सुकता के केंद्र बदलते रहेंगे और उन दोनों चट्टानों के पास उनके बारे में बातें करने का विषय रहेगा।

हमने कुछ फोटो लिये। इन चट्टानों के पीछे एक रास्ता है जो घने जंगल के अंदर जाता है। चालीस साल पहले भी वह रास्ता था और दस साल पहले जब गई थी तब भी। उस पर चलने की ललक तब भी थी आज भी लेकिन आज के लिए अकेले जंगल में जाने का कोटा पूरा हो चुका था। नहीं भी होता तो वहाँ जाना संभव नहीं होता। पता नहीं पतिदेव रोकते या अज्ञात के लिए मेरा खुद का डर बच्चों के लिए प्यार लेकिन उस रास्ते पर शायद कभी नहीं जा पाऊँगी।

वहाँ से ऊपर जाने का रास्ता काफी ऊँचा दिख रहा था। उस में समय लगता हम वापस चल पड़े। आधे रास्ते में सहयात्री नीचे उतरते दिखे यह तय था उन्हें फिर देर लगेगी जबकि इस बार ड्राइवर ने उन्हें जल्दी आने को बोल दिया था।

बाहर चाय पकौड़े की दुकान पर जबरदस्त भीड़ थी जबकि हमारा खाना गले में रखा था। हम आगे बढ़े रास्ते में एक पत्थर सिंहासन सा आभास दे रहा था। वहाँ रुके फोटो लिए तब तक कुछ और लोग लाइन लगाकर खड़े हो गये उन्हें भी फोटो लेना था। हम आगे बढ़े फिर एक जगह बैठ गये जब अभी जाना ही नहीं है तो गाड़ी में क्यों बैठें यहीं जंगल में क्यों न बैठे?

अगला पड़ाव था धूपगढ। वहाँ जाना रोमांचित कर रहा था। वैसे तो मैं पहले भी चार बार धूपगढ जा चुकी थी लेकिन वहाँ जाने का पहला अनुभव आज भी रोमांचित करता है।

धूपगढ सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी है जहाँ से सूर्यास्त देखना अद्भुत होता है और इतनी खतरनाक चढ़ाई लोग इसे देखने के लिए करते हैं। अब यहाँ प्रायवेट गाड़ियाँ बंद कर दी गई हैं लेकिन इक्कीस साल पहले जब हमने अपनी पहली गाड़ी मारूति वेन खरीदी थी और सबसे पहले पचमढ़ी घूमने गये थे उसकी यादें अब तक ताजा हैं ।

वह गैस कन्वर्टेड वेन थी जिसमें गैस सिलेंडर लगा था। पचमढ़ी आते हुए गाड़ी कहीं टकराई थी शायद लेकिन वह अच्छे से चल रही थी और हम पूरी पचमढ़ी घूम चुके थे। धूपगढ चढ़ते हुए जब खड़ी चढ़ाई पर गाड़ी आगे से ऊपर पीछे से नीचे हुई तो गैस की सप्लाई होना बंद हो गई। पतिदेव ने ब्रेक पर पूरी ताकत से पैर रखकर उसे पीछे लुढ़कने से रोका और बोले जल्दी नीचे उतरो और पहिये के पीछे पत्थर लगाओ। मैं नीचे उतरी और सड़क किनारे पड़ा पत्थर उठाकर लगाया फिर पतिदेव ने गाड़ी को रेस दी और दो तीन मीटर आगे बढ़ाया। वे फिर जोर से बोले फिर पत्थर लगाओ और मैंने दूसरा पत्थर उठाया दौड़ लगाई और फिर पत्थर लगाया। अब गाड़ी एक दो मीटर आगे बढ़ती मैं भागकर पत्थर लगाती खड़ी चढ़ाई पर भागते मैं हाँफने लगी।

पतिदेव ने गाड़ी को पेट्रोल पर किया लेकिन चूँकि गाड़ी गैस पर थी इसलिए बहुत थोड़ा सा पेट्रोल था जो टंकी में पीछे हो गया था और इंजन तक नहीं पहुँच पा रहा था। 

हमें थोड़ी देर हो गई थी इसलिए हमारे बाद नीचे से कोई गाड़ी नहीं आ रही थी बस यही अच्छा था। तभी मेरी नजर बगल में खाई पर पड़ी गहरी अंधेरी घाटी जिसका तल दिखाई नहीं दे रहा था। पतिदेव ने एक बार फिर कोशिश की और मुझसे कहा बैठो। मैं गाड़ी में बैठी गेट थोड़ा अटकाया न जाने कब फिर उतरना पडे। एक बार फिर भगवान का नाम लिया और मन में कहा 'भगवान जैसी आपकी मर्जी बस इतना करना कि बचें तो चारों मरे तो चारों। किसी को पीछे जीवन भर का दुख झेलने के लिए मत छोड़ना।'

इतनी देर में गाड़ी बमुश्किल बीस मीटर चली होगी। अब फिर गाड़ी को गैस पर करके पतिदेव ने गेयर लगाया और ये क्या गाड़ी दनदनाती हुई ऊपर चढ़ गई ऐसे जैसे उसमें कुछ हुआ ही नहीं था।

अब फिर उस रास्ते पर जाना उस दिन क्षण को साथ देखने का रोमांच था। सड़क बहुत अच्छी नहीं थी डामर रोड़ उखड़ी हुई थी और उसमें पैबल लगाने का काम चल रहा था जबकि पिछले चार बार यहाँ हमेशा डामर रोड़ ही थी।

ड्राइवर ने बताया कि यहाँ घने जंगल में नाग देवता का मंदिर है जहाँ हर नागपंचमी को मेला भरता है। करीब ढाई लाख लोग इस मेले में आते हैं। रास्ते में एक चट्टान दिखी जिस पर गणपति जी का आकार और झलक थी। इस चट्टान के नीचे देवता का मंदिर था और उसी के बगल से एक संकरा पैदल रास्ता। नागपंचमी पर धूपगढ जाने वाला रास्ता बंद कर दिया जाता है और यहाँ से लोग पैदल नाग मंदिर तक जाते हैं। दरअसल नाग देवता देश के ही नहीं दुनिया भर के आदिवासियों के देवता हैं और उनकी बहुत मान्यता है। दक्षिण अमेरिका में स्नैक किंगडम बहुत विशाल राज्य था।

ड्राइवर ने बताया कि जिस साल अच्छी बारिश होती है तभी मेला लगता है क्योंकि इतने लोगों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था हो जाती है। जंगल में टेंकर ले जाना संभव नहीं है। फिर बारिश में सब गंदगी बह जाती है। हाँ बाजार और प्लास्टिक हर जगह पहुँच चुका है और जंगल के बीच से बारह किमी फिर सड़क से छह आठ किमी कचरा कौन ढोकर लायेगा। इसलिए कचरा नदियों के रास्ते फिर गाँव शहर में आ जाता है।

धूपगढ में पहाड़ के ऊपर काफी बड़ा समतल मैदान है जिसके एक ओर से सूर्योदय दिखता है दूसरी ओर से सूर्यास्त। वैसे आज कुछ नहीं दिखने वाला था क्योंकि बादल हो गये थे। हम पूर्व की ओर गये वहाँ से दूर चौरागढ दिखाई दे रहा था। वह सतपुड़ा की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। यहाँ विशाल शिव मंदिर है जहाँ त्रिशूल चढ़ाये जाते हैं। कहते हैं भस्मासुर को वरदान देने के बाद जब वह शिव को भस्म करने दौड़ा तब उससे बचने के लिए शिव इस पर्वत पर भी गये थे और उनका त्रिशूल वहाँ छूट गया था।

यहाँ से नीचे दूर दूर तक पहाड़ और घने जंगल दिख रहे थे। हम जहाँ खड़े थे वहीं बगल में एक और चट्टान थी जो लगभग पचास फीट ऊँची होगी।

हम पश्चिम की ओर जाने लगे यहाँ भी एक दुकान पर चाय पकौड़े बन रहे थे और लोगों की भीड़ लगी थी। पश्चिम में बैठने के लिए सीढ़ी बना दी हैं ताकि लोग बहुत किनारे न जाएँ और फोटो लेने के लिए धक्का मुक्की न हो। बादल घने हो गये थे अंधेरा छाने लगा था सूर्यास्त में अभी भी आधा घंटा था और लोग उम्मीद में बैठे थे कि शायद बादल छँट जाएं जिसकी कोई संभावना नहीं थी।

इस जगह पर आने की यादें फोटो लेकर संजोई जा रही थीं। हम लोगों को देखते रहे उनके उत्साह को जिसमें सूर्यास्त न दिखने का कोई मलाल नहीं था वह दिखे न दिखे होगा जरूर और अगले दिन सूर्य फिर उगेगा। यहाँ होना उनके लिए एक याद है उसे संजोना है।

हवा ठंडी हो चली थी उतरते हुए अंधेरा हो जायेगा। अब चलना चाहिए ताकि रास्ते के सौंदर्य को एक बार फिर रौशनी में निहार सकें। हमारे सहयात्री सामने ही दिख रहे थे उनसे कहा अब चलें वे भी तैयार हो गये।

रास्ते में एक दो फोटो खींचे ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी रोककर छह सात पहाड़ों के पार वह स्थान दिखाया जहाँ मेला लगता है। गाड़ी लगातार चलती जा रही थी और हम सब गाड़ी में चुपचाप बैठे थे उस स्थान की सुंदरता को मन में बसाए दिमाग में उससे जुड़ी बातों को यादों के बक्से में जमाते हुए कुछ बहुत बहुमूल्य पीछे छोड़ आने की अकुलाहट लिये।












Thursday, June 19, 2025

जिंदगी इक सफर है सुहाना

 

खरगोन इंदौर के रास्ते में कुछ न कुछ ऐसा दिखता या होता ही है जो कभी मजेदार विचारणीय तो कभी हास्यापद होता है लेकिन एक ही ट्रिप में तीन चार ऐसी घटनाएँ कम ही होती हैं।
आजकल खरगोन या इंदौर से निकलते देर हो ही जाती है। तेज धूप में गाड़ी में चलता एसी भी कभी-कभी घुटन पैदा करता है। इस बार खरगोन से निकले सुबह के दस बजे अमूमन इस समय तक हम इंदौर पहुँच जाते हैं। जाम घाट पर चढ़ते समय तक तेज धूप गर्म हवा ने विंड शीट को भी गर्म कर दिया था जिसके कारण बार बार एसी को फ्रंट ब्लोअर पर करना पड़ रहा था ताकि काँच ठंडा हो और गाड़ी भी। ऐसी चिलचिलाती धूप में गाड़ी के सभी काँच पर काले फलके लगे रहते हैं और मैं तो अपनी तरफ इन्हें दोहरा करके लगा लेती हूँ। इतनी धूप में घाट के हरे भरे पेड़ भी आँखों को ठंडक नहीं दे पाते। हाँ उन्हें देखती जरूर रहती हूँ लेकिन बस सामने से।
तभी आगे एक बाइक पर एक परिवार जाता दिखा। पति पत्नी। पत्नी ने हवा में उड़ गया अपना साड़ी का सीधा पल्ला सिर पर रखा तब दिखा कि उसकी गोद में एक छोटा बच्चा है। अच्छा बच्चों को लोग सीधे बाहर की ओर मुँह करके बैठाते हैं। गर्मी में आधे कपड़े पहने वे मुँह हाथ पैर में हवा के थपेड़े सहते रहते हैं।
गाड़ी उन्हें ओवरटेक करके आगे बढ़ी तो देखा एक पाँच छह साल का बच्चा आगे भी बैठा था। मैंने ब्लैक शीट हटाकर देखा। नींद में ऊँघता सा गर्मी से बेहाल। हाय बेचारे मासूम बच्चे बता भी नहीं पाते कि उन्हें कोई तकलीफ है और माता-पिता समझते नहीं हैं कि उनके सिर पर रुमाल बाँध दें मुँह ढँक दें बीच में बैठा लें या उल्टी तरफ मुँह करके ही बैठा दें।
ओह बेचारा बच्चा!
"तुम्हारी जेब में रुमाल है क्या?" हमारे लेडीज रुमाल के प्रयोग बड़े सीमित होते हैं।
"हाँ क्यों पर एक ही है"
"ठीक है न तुम्हें कौन सा पसीना आना है एसी में बैठे हो। निकालो"
इतने वार्तालाप में गाड़ी लगातार चल रही थी और उनसे काफी आगे आ गई थी। अब गाड़ी धीमी की रुमाल खोलकर एसी वेंट के सामने कर फ्रेश किया और इंतजार करने लगे उस बाइक के आने का। हालाँकि ट्राफिक कम था लेकिन बीच घाट में रुकना ठीक नहीं था। रेयर मिरर में हम बाइक को आते देखते रहे।
अच्छा बाइक वालों को किसी भी तरफ से ओवरटेक करने की सुविधा हमारे देश में उपलब्ध है। उनके लिए दायां बांया कुछ नहीं होता बस जहाँ अगले टायर के समाने की जगह मिले वहाँ से निकल लो। इसलिये मैंने भी अपनी तरफ के फलके हटा दिये ऊँगली शीशा खोलने के लिए तैयार रखी थी वह पास आता जा रहा था और पास और पास।
किस तरफ से निकलेगा मेरी तरफ से दूसरी तरफ से और वह बगल से निकला। पतिदेव ने शीशा नीचे किया हाथ देकर उसे रोका रुमाल निकाल कर उसे दिया।
"ये बच्चे को बाँध दो बहुत गर्मी है।"
वे दोनों आदिवासी दंपत्ति अकबकाए रुमाल हाथ में लिया "हम तो बस यहाँ माताजी तक जा रहे हैं।"
"तुम तो साड़ी से सिर ढँके हो बच्चों को लपट लग रही है।" सुनकर वह हँस दी थोड़ी खिसियाई सी हँसी। "या तो उसे बीच में बैठाओ या उल्टा बैठाओ। बहुत गर्मी है। "
उनके चेहरे पर छोटी सी मुस्कान आई जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती और हम आगे बढ़ गये।
अगली शाम इंदौर में मार्केट जाना था इंडस्ट्री हाउस चौराहे पर गाड़ी सिग्नल पर रुकी थी। बगल में बाइक पर एक युवा कपल था अपनी बातों में मशगूल। इस उम्र में बातें भी तो बहुत होती हैं न जाने कहाँ कहाँ की बातें। सिग्नल हरा हो गया हम आगे बढ़े बाइक बगल में ही चल रही थी आसपास से गाड़ियाँ निकल रही थीं। व्यस्त चौराहा जो शाम के समय बेतरतीब हो जाता है पूरा ध्यान गाड़ी चलाने के साथ अगल बगल में भी देना पड़ता है। लड़का बाइक चला रहा था और लड़की इस समय भी बातें कर रही थी।
'हे भगवान अब से लड़कों को मल्टी टास्किंग स्किल दे कर ही भेजना।' सच में मन तो था कि कहूँ 'देवी थोड़ी देर तो चुप हो जाओ चौराहा निकल जाये फिर बातें कर लेना। वैसे मैं भी अपने साथ किसी को गाड़ी में इसीलिए नहीं बैठाती क्योंकि ट्राफिक हो या चौराहा बिना देखे समझे लोग बोलते जाते हैं तो जो चिढ़ पैदा करता है।
अगले दिन खरगोन वापसी थी। आजकल बायपास पर सुबह शाम जबरदस्त ट्राफिक होता है गाड़ी रेंग कर ही चलती है। यहाँ भी बगल में चलती एक बाइक पर नजर गई। अच्छा हम राजदूत सुजूकी जमाने के लोग नये जमाने की बाइक को अचरज और बेचारगी से देखते हैं। पीछे बैठी खाते पीते घर की लड़की आगे बैठे लड़के से चिपकी हुई थी। लड़का आगे की ओर झुका था हेंडल ही ऐसा था कि उसकी पीठ पचास डिग्री के कोण पर थी और पीठ पर लड़की का पूरा वजन था। 'बेचारा लड़का! लड़की को सीधा बैठने का भी नहीं कह सकता वह कहेगी इतना कमजोर है कि मेरा वजन नहीं झेल पा रहा है या बुरा ही मान जाये कि मुझे मोटा कहा।'
या शायद गाड़ी ही ऐसी है कि लद कर ही बैठना पड़ता है। कभी ऐसी गाड़ी पर बैठे नहीं तो कैसे पता होगा। बाइक आगे एक टाउनशिप की तरफ मुड़ गई और मैंने देखा लड़की सीधे बैठ गई। हा बेचारे लड़के की जान में जान आई होगी। अब मुझे तो ऐसा ही लगा हो सकता है लड़के को अच्छा लग रहा हो।
अब हम बायपास पर तेज गति से चल रहे थे तभी एक और विक्रम बेताल बाइक बगल में दिखी। अरे वही जिसमें पीछे वाली सीट इतनी ऊँची होती है कि लगता है वह आगे वाले की पीठ पर सवार है। अब बाइक पर दोनों लड़के थे तो फोटो ली जा सकती थी। चलती गाड़ी में फोटो लेना आसान तो नहीं है न। कभी लगता आ गई लेकिन एंगल बदल जाता कभी गाड़ी का नंबर आ जाता। खैर खूब सारी फोटो खींची और गाड़ी डिजाइन करने वाले को नमन किया।
कुछ और देर बाहर देखती तो कुछ और मैटर मिल जाता लेकिन धूप तेज हो रही थी इसलिए शीशे पर फलके लगाकर रेडियो पर गाने सुनते आगे का सफर तय किया।

Sunday, May 18, 2025

जाइंट लिली

 बात सन 80 की है। पापाजी का झाबुआ जिले के राणापुर से इंदौर ट्रांसफर हुआ था। इंदौर में खुद का मकान था जिसमें कभी रहे नहीं थे। हम तो बहुत छोटे थे अपने घर में रहने का सुख और इच्छा नहीं थी हमारे लिए तो जहाँ मम्मी पापा वही घर। इंदौर में मकान में किरायेदार थे उन्हें एक महीने पहले ही चिठ्ठी लिखकर मकान खाली करने को कह दिया गया था। उनकी जवाबी चिठ्ठी क्या आई नहीं पता।

वह पंद्रह अगस्त का दिन था। स्कूल में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन था। मैं गर्ल्स गाइड में थी और मुझे परेड में शामिल होना था। सामान का ट्रक सुबह जल्दी निकलना था लेकिन मैं स्कूल जाने की जिद पर अड़ गई। स्कूल में झंडावदन किया बाकी कार्यक्रम की याद नहीं है। बस इतना याद है जब वापस घर आई ट्रक में सामान भरा जा चुका था। घर का एक चक्कर लगाने तक का समय नहीं था और हम सब भी उसी ट्रक में सवार हो गये।

दोपहर बाद इंदौर पहुँचे तो किरायेदार हमें सामान सहित देखकर हैरान हो गये। वे छह साल से मकान में रह रहे थे। मकान खाली करने की चिठ्ठी को उन्होंने किराया बढ़ाने के लिए धौंस सा समझा और निश्चिंत रहे।

सामान परिवार सहित मकान मालिक को सड़क पर तो नहीं रहने दे सकते। ताबड़तोड़ दो कमरे खाली किये जिनमें हमारा सामान रखा गया बाकी दो कमरों में उनका पाँच लोगों का परिवार समाया। तीन-चार दिन में उन्होंने मकान ढूँढकर बदला। छह साल में उन्होंने किचन में इतनी चीकट कर दी थी जिसे हम महीनों रगड़ते रहे।

उन्हें पेड़ पौधे लगाने का शौक था सामने रातरानी जाइंट लिली और भी कुछ पेड़ पौधे लगे थे जो वहीं छूट गये। जाइंट लिली में साल में एक बार फूल आयेगा यह वे बता गये थे। 

आज पैंतालीस सालों बाद भी उनका छोड़ा जाइंट लिली फूलता है और उनकी याद दिला देता है। आज वे कहाँ हैं पता नहीं लेकिन उनकी उपस्थिति उस घर में बनी है। एक पौधा इतने साल आपकी उपस्थिति बता सकता है इसलिए पेड़ लगाना चाहिए वे हमारे बाद भी हमारी याद दिलाते रहेंगे।

Friday, April 18, 2025

गंगा आरती

 

डेस्टिनेशन वेडिंग आजकल का सबसे पापुलर ट्रेंड है। किसी दर्शनीय स्थल पर्यटन स्थल पर किसी रिजार्ट में शादी करना। इसके कई महत्वपूर्ण पहलू हैं जैसे सिर्फ करीबी रिश्तेदारों को लेकर जाना शादी का पूरा कार्यक्रम इवेंट कंपनी को दे देना जिससे सभी मुक्त भाव से शादी में शामिल हो सकें। फोटो वीडियो में खूबसूरत बैकग्राउंड मिले वगैरह वगैरह।
तो मुद्दा यहाँ डेस्टिनेशन वेडिंग के लाभ हानि का नहीं है बल्कि है इसमें शामिल होने के अपने अनुभव का। ऋषिकेश से बारह पंद्रह किमी दूर एक रिजार्ट में एक शादी में शामिल होने का मौका मिला। गंगा नदी के किनारे यह छोटा सा रिजार्ट दो तल्ले में बना था एक तल में कमरे रिसेप्शन वगैरह दूसरे उससे निचले तल्ले में डाइनिंग हाल पूल आदि। पहाड़ काटकर बनाई जगह का खूबसूरत उपयोग किया गया था।
ऋषिकेश जाने के लिए देहरादून तक ही फ्लाइट मिलती हैं वह भी सीमित इसलिए हम रात तीन बजे उठकर एयरपोर्ट पहुँचे। कैब रात में ही बुक कर दी थी लेकिन उसे सुबह तीन बजे उठाना हमारी जिम्मेदारी थी। खैर वह साढ़े तीन बजे आ गया और चार बजे हम घर से निकल गये। एक बार नींद खुल जाये तो फिर आसानी से कहाँ आती है अलबत्ता भूख जरूर लग जाती है तो हमें भी छह बजे भूख लग आई। एयरपोर्ट पर ही वडा खाकर काफी पी और सवार हो गये एक छोटी-सी एयर टैक्सी में। साठ सत्तर सीटें होंगी बस। जब हम चले थे अंधेरा ही था पहले जयपुर में लैंड किया यहाँ ट्रांजिट था कुछ लोग उतरे कुछ चढे़ और हम देहरादून के लिए रवाना हो गए। आसमान में सूरज उगने को था मैं पूर्व तरफ की खिड़की पर बैठी थी। बादलों को चीरकर बाहर झांकते सूरज की फोटो लेना वैसे भी मुझे बहुत पसंद है इसलिये फटाफट तीन-चार फोटो लीं। फटाफट इसलिये क्योंकि जो सौंदर्य ओट से झाँकते मुखड़े का होता है वह पूर्ण दर्शन में कहाँ होता है। फिर आसमान में सीधा चलता प्लेन भी धीरे-धीरे मुड़ता है अपनी दिशा बदलता है और खिड़की के सामने दिखता सूरज या बादल का टुकड़ा पीछे ही नहीं छूटता गायब ही हो जाता है।
नीचे पहाड़ियाँ दिखने लगी थीं लेकिन सूर्य रश्मियाँ अभी धरती पर पहुँची नहीं थीं इसलिए कुछ स्पष्ट न था। खैर कुछ ही देर में हमें उस देवभूमि पर उतरना था इसलिए आँखों को ज्यादा कष्ट नहीं दिया।
देहरादून का एयरपोर्ट वैसे तो छोटा-सा है लेकिन भव्य है। बाहर विशाल खंबो पर टिकी छत उसके बीच से दिखता आसमान। बड़े बड़े तांबई खंबे जिन पर बौद्ध मंत्र लिखे थे।
इवेंट वालों की गाड़ी आ चुकी थी हमारी मंजिल दूर तो न थी लेकिन रास्ता आसान नहीं था। पहाड़ जितना लुभाते हैं उतना ही कठिन है इनमें यात्रा करना। घुमावदार रास्ते सिर घुमा देते हैं और पेड़ पहाड़ के बजाय सारा ध्यान खुद पर रहता है। वह तो अच्छा था कि एक रात पहले ही मैंने गोली खा ली थी इसलिए रास्ता आनंद से गुजर गया।
गाड़ी जब सड़क पर रुकी वहाँ उतरते अंदाजा भी नहीं था कि नीचे उतरते इस रास्ते से कहाँ पहुँचेंगे। इवेंट वाले तिलक की थाली और माला लिये खड़े थे हमारा स्वागत हुआ वेलकम ड्रिंक दिया गया और हमारे कमरे तक सामान पहुँचा।
कमरा अच्छा था बड़ा साफ-सुथरा और एक छोटी सी बालकनी भी। दरवाजा खोलकर बाहर आये तो वहाँ लाल मुँह के बंदरों को बैठे देखा। ओह तो बालकनी में इनका राज है मतलब दरवाजा खुला नहीं रख सकते बल्कि खुद भी बेपरवाही से खड़े नहीं रह सकते। सामने गंगा नदी थी और उसके किनारे कई नाव वाले खड़े थे ध्यान से देखा कुछ नाव थीं कुछ राफ्ट थे। रिवर राफ्टिंग कौन करना चाहता है इसके बारे में शादी के लिए बने व्हाटस अप ग्रुप में कई बार पूछा गया था लेकिन नदी की लहरों में जाना न बाबा। सफेद बालू का किनारा ऊपर चढ़ते विशाल पेड़ों से घिर गया था। वहाँ खड़े रहना भला लग रहा था लेकिन थकान भी हावी हो रही थी। अभी नहाना है फिर थोड़ा आराम कर लें। आज दिन भर मेहमानों का आना चलता रहेगा सबसे मिलना भी तो है।
नहाकर भूख लग आई हमने डाइनिंग हाॅल में जाकर खाना खाया जो नीचे वाले तल पर था इसके सामने एक स्वीमिंग पूल था और किनारे से गंगा जी दिख रही थीं। शांत हरा पानी जो उस तरफ के पहाड़ पर लगे पेड़ों की झांई के कारण हरा था पुकार रहा था अपने पास उकसा रहा था कि डुबकी लगा लो।
इस असमंजस से उबारा इस खबर ने कि शाम को गंगा आरती होगी। अरे तभी जाएंगे वैसे भी सामने दिखता तट लगभग सौ फीट नीचे था और धूप तेज थी बालू तप रही थी जाना शायद सरल हो लेकिन ऊपर चढना आसान नहीं होगा।
थोड़ा आराम तो क्या करते आने वालों से मिलने की हुलस ने नींद कहाँ आने दी। शाम पाँच बजे चाय पीकर हम नदी किनारे पहुँचे। ऊपर से जो नदी तट समतल दिख रहा था वह वास्तव में करीब छह आठ फीट नीचे था और वहाँ बालू की खड़ी दीवार सी थी। सावधानी से  नदी तक पहुँचे उसे प्रणाम करके उसमें उतरे। हिमालय से उतरी नदी इतनी दूर बहने पर भी बर्फ की ठंडक नहीं छोड़ पाई थी। दो मिनिट में ही पैर सुन्न हो गये लेकिन उससे बाहर आने का मन नहीं हो रहा था। मुँह हाथ धोकर डूबते सूरज को अर्ध्य दिया प्रणाम करके बाहर आये तब तक पैर जम चुके थे।
परिवार के सभी सदस्य आ चुके थे बातचीत हँसी फोटो का दौर चल रहा था। नदी किनारे बड़े पत्थर पर बैठें पानी में पैर डालें या बाहर रखें जैसी महत्वपूर्ण चर्चा चल रही थी। सूर्य अस्त नहीं हुआ था बस पहाड़ के पीछे चला गया था। वर पक्ष के मेहमान भी आ चुके थे वे भी नदी को प्रणाम करके फोटो खिंचवा रहे थे। पण्डित जी आरती की तैयारी में लगे थे। तेज हवा में दीपक की लौ का ठहरना मुश्किल था इसलिए रुई की बाती के साथ कपूर डाला गया था।
सब आरती के लिये इकठ्ठा होने लगे देखा वहाँ दो पण्डित जी हैं। ऊपर नजर दौड़ाई एक और रिजार्ट नजर आया। ओह अच्छा हमारे वाले पण्डित जी उधर हैं। हम अपनी चप्पलें छोड़ उधर भागे। मंत्र उच्चारण के साथ गंगा पूजन फिर आरती शुरू हुई। गंगा के प्रथम दर्शन के साथ ही मन में श्रद्धा उमड़ पड़ी थी। स्वर्ग से उतरी नदी पृथ्वी वासियों के पाप हरने के लिए। उन्हें अपने जल से तृप्त करने उनके लिए उपजाऊ मिट्टी लाकर उनकी क्षुधा शांत करने के लिए पहाड़ों को लाँघते पत्थरों पर उछलते अपने तन पर असंख्य चोटें सहते बह रही है। लोग उसका दोहन कर रहे हैं उसमें कचरा अपशिष्ट डाल रहे हैं लेकिन वह एक माँ की तरह अपने बच्चों की नादान हरकतों को नजरअंदाज कर बस बह रही है।
गंगा के सभी घाटों पर गंगा आरती कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए ही की जाती है। अद्भुत वातावरण था पहाड़ों पर ढलती सांझ की परछाई में गहन गंभीर होती गंगा के चमकीली बालू के तट पर देश के दूरदराज से आये लोग श्रद्धा से नतमस्तक होकर आरती में शामिल थे। बारी बारी से सभी दीपक लेकर आरती कर रहे थे और यह अवसर मिलने से अभिभूत थे।
आरती के बाद जिसकी इच्छा हो वह दीपदान कर सकता था पण्डित जी पत्तों के दोने में फूल और घी में डूबी बत्ती रखे हुए थे। जो चाहे दीपक ले ले और अपनी श्रद्धा अनुसार दक्षिणा दे दे।
हमने दीपक लिया खड़ी बालू पर गिरते फिसलते नीचे उतरे तेज हवा को हथेलियों से रोकते दीपक बाला और गंगा माँ को प्रणाम करके अपने बच्चों की खुशियों की कामना करते हुए उसे प्रवाहित कर दिया। दूर तक वह दीपक लहरों के साथ आगे बढ़ता रहा हम उसे देखते रहे चकित होते रहे। यह दीपक की जिजीविषा थी या माँ का प्यार जो हिचकोले खाते उस दीपक को संभाले हुए था ताकि वह अपनी शक्ति भर उजियारा करे और जीवंत रहे। चूँकि पहला दीपक हमारा था जो नजरों से ओझल होने तक टिमटिमा रहा था उसे देखते हम अग्नि और पानी की इस जुगलबंदी को उनकी एक दूसरे के प्रति सदाशयता को देख चमत्कृत थे।
अंधेरा हो चुका था इसलिए सभी ऊपर आ गये।

#ऋषिकेश

#गंगा_आरती

Thursday, September 26, 2024

अनजान हमसफर

 इंदौर से खरगोन अब तो आदत सी हो गई है आने जाने की। बस जो अच्छा नहीं लगता वह है जाने की तैयारी करना। सब्जी फल दूध खत्म करो या साथ लेकर जाओ। गैस खिड़कियाँ बंद करो इतना सारा सामान गाड़ी में रखो लेकिन क्या करें करना ही पड़ता है। उसके बाद हाईवे पर जो अदूरदर्शिता के चलते खोदकर रखा है पुल बनाने के लिए वह रास्ता गुस्सा दिलाता है। एक बार महू पार कर लिया और मिलिट्री एरिया में आ गये फिर तो बस आनंद का सफर होता है और इसमें लगभग एक घंटा लग जाता है। अब ध्यान जाता है आगे पीछे चलने वाली गाड़ियों पर सवारियों पर आसपास के खेत खलिहान कच्चे पक्के घरों पर जंगल और घुमावदार रास्तों पर।

आज ऐसे ही रास्ते पर एक बाइक पर नजर गई। तीन सवारियाँ दो लड़के उनके पीछे एक दुबली पतली छोटी सी लड़की उसकी गोद में एक बच्चा दो तीन बैग। दो तीन बार वह बाइक क्रास हुई और हर बार उस पर नजर गई।

अधिकतर मैं अकेले गाड़ी चलाना पसंद करती हूँ मैं और मेरी तन्हाई मेरा रेडियो मेरे गाने। गाड़ी में या तो ऐसा साथ हो जिससे बातचीत का आनंद हो या चुपचाप चलें या फिर अकेले हों। मन में आया इस लड़की को गाड़ी में बैठा लूँ तब तक वह गाड़ी आगे बढ़ गई।

जाम घाट पर पार्वती मंदिर के आगे रास्ते पर बादल उतरे थे। इतना घना व्हाइट आउट कि दस मीटर आगे भी न दिखे। अरे आज फिर! यही कहा मन ने। मैंने गाड़ी धीमी की मोबाइल में वीडियो आॅन किया और एक हाथ में मोबाइल थामे वीडियो बनाते धीरे-धीरे जाम गेट की तरफ बढी। रेयर व्यू में देखा वह बाइक मेरे पीछे हो गई। सुरक्षा के हिसाब से यह अच्छा था। घने बादल के बीच रास्ता किस तरफ मुड़ रहा है यह भी नहीं दिख रहा था। लग रहा था आगे बारिश होगी। 

जाम गेट पर कुछ दिखने लगा और वह गाड़ी अब बगल से आगे निकलने को हुई तभी मैंने कार का शीशा नीचे करके उसे हाथ दिया।

कहाँ जा रहे हो? इसे गाड़ी में बैठा दो।

हम भी खरगोन जा रहे हैं। गुड़िया भी है साथ में।

हाँ तभी तो कहा तुम तीन होते तो थोड़ी कहती। उन्होंने तुरंत उस लड़की और गुड़िया को गाड़ी में बिठाया एक बैग गाड़ी में रखा।

मंडलेश्वर में मिलना कहकर मैंने गाड़ी आगे बढा दी।

आज देवानंद का जन्मदिन है विविधभारती पर प्यारे गाने बजे और मैं साथ न गाऊँ कैसे संभव है। थोड़ी देर मुझे संकोच हुआ फिर सोचा गाड़ी मेरी है यार मैं चाहे जो करूँ 😜

खैर थोड़ा गाना थोड़ी बातचीत वह लड़की पास के गाँव की है शादी को तीन साल हुए ग्यारह महीने की बेटी है। खरगोन कालेज से एम काॅम कर रही है। कालेज जाती है सुबह दस बजे तक घर के काम हो जाते हैं और बच्ची को सब संभाल लेते हैं।

मंडलेश्वर में बाइक पीछे आती नहीं दिखी तो हम आगे बढ़ गये। अब वह थोड़ी बैचेन हुई। बार बार साइड मिरर में देखती।

मैंने कहा चिंता मत करो फोन नंबर याद है तो फोन कर दो। उसे अपना फोन दिया क्योंकि उसका फोन रिचार्ज नहीं था और बैग में था। फोन की घंटी गई किसी ने नहीं उठाया।

कोई बात नहीं गाड़ी चला रहे हैं आवाज नहीं आ रही होगी। जब देखेंगे फोन लगा लेंगे। गुड़िया उठ गई थी थोड़ा कुनमुनाई अचरज से मुझे देखा। धीरे से मेरा हाथ छुआ। सोकर उठी थी भूखी थी वह फीड करवाने लगी। मुझे याद आया कई बार बच्चों को बाइक से लेकर जाते थे कभी ऐसा भी होता कि गाड़ी रोकने के लिए सुरक्षित स्थान नहीं मिलता तब बाइक पर चलते हुए फीड करवाया है। 

कसरावद पार करके हम आगे बढ़ गये तब फोन आया। उन्हें बता दिया खरगोन में कहाँ आना है। कुछ खास समझ नहीं आया बोले हम वहाँ आकर फोन कर लेंगे।

खरगोन आ गया हम घर पहुंच गये। आज सुबह काॅफी नहीं पी थी मुझे काॅफी पीना था। वर्माजी डिब्बा भरकर रबड़ी लाये थे बोले उसे दे दूँ।

हाँ बिलकुल वह रास्ते में फीड करवा रही थी भूख लगी होगी।

उसने पहले गुड़िया को खिलाई थोड़ी खुद खाई तब तक फोन आ गया। और वे दोनों चले गये।

Sunday, September 15, 2024

शिवा बाबा

 

शिवा बाबा
बहुत दिनों से विचार चल रहा था शिवा बाबा जाना है लेकिन दो घंटे का रास्ता गर्मी उमस के चलते मैं ही जाना टालती रही। शुक्रवार फिर मन बना लेकिन शनिवार लोक अदालत है इसलिए नहीं जा पाये फिर तय हुआ रविवार को चलेंगे।
आज सुबह निकलना तो जल्दी था लेकिन कुछ रविवार का आलस कुछ काम निपटा लेने का लालच दस साढ़े दस बज ही गये। अच्छा यह था कि आज धूप नहीं थी। खरगोन से बिस्टान होते धूलकोट से तितरानिया पाडल्या होते बुरहानपुर जिले में प्रवेश किया। सड़क कुछ डामर की कुछ कांक्रीट की कुछ गढ्ढेदार। पूरा आदिवासी इलाका छोटे छोटे फलिए दूर दूर खेत में एक एक झोपड़े आसपास खेत और उसके बाद सागौन के जंगल। बारिश न बची धरती को हरियाली की चादर से ढंक दिया था। रास्ते पर इक्का दुक्का वाहन की आवाजाही। पूरी तरह एक अलग दुनिया। छोटे छोटे गाँव में दैनिक जरूरत के सामान की एक दो दुकानें इसके अलावा न कोई बाजार न बड़े भारी मकान।
बस चले जा रहे थे शिवा बाबा।
दो तीन जगह रास्ता पूछा लोगों ने बड़े उत्साह से बताया आखिर वे उनके भी पूज्य हैं। गाड़ी मंदिर के सामने रुकी तब भी अंदाजा नहीं था इतना विशाल भव्य लेकिन सरल सहज मंदिर होगा। सामने बड़ा सा प्रांगण जिसके दोनों तरफ पेड़ों की कतारें। उसे पार करके हम पहुँचे एक कुएं पर जो तिरपाल से ढँका था। पानी इतना कि दो हाथ रस्सी से निकल जाये और पानी ऐसा कि एसिड से धुला कांच भी शरमा जाये। स्टील की बाल्टी में भरे पानी की पारदर्शिता देखकर चौंक गये हम। कुएं में झांका तो आश्चर्य से मुँह खुला रह गया। इतना साफ शुद्ध जल।
वहाँ हाथ पैर धोकर पीछे बने एक हाॅल में बैठे। हाँ मंदिर बारह बजे से एक बजे तक बंद रहता है। करीब दस मिनट बाद मंदिर खुला और हम दर्शन के लिए पहुँचे। साफ सुथरे मंदिर में शिवा बाबा की छोटी सी पिंडी मंदिर में सिर्फ पुरुषों का प्रवेश। हमने बाहर से दर्शन किये और सिंदूर चढ़ाया। बगल में देवी जी का मंदिर था जिसमें दुर्गा काली और गौरी की प्रतिमा थीं। दोनों ही मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बने थे। गोपुरम मूर्ति मंदिर की पेंटिंग का काम दक्षिण भारतीय कारीगरों ने किया है।
इसके बाद हम पहुँचे मंदिर के विशेष आकर्षण केंद्र पर।
जी हाँ इस मंदिर में एक पत्थर है थोड़ा गोल चौकोर सा सामान्य सा दिखने वाला पत्थर लगभग चालीस पचास किलो का। इस पत्थर को उठाने के बाद आदमी सीधा नहीं हो पाता और आधा एक फीट उठाकर रख देता है। यही पत्थर ग्यारह लोग एक तर्जनी से उठा लेते हैं। जी हाँ ग्यारह लोग चाहिये और पत्थर उठाने के पहले शिवा बाबा का आव्हान करना चाहिए। अगर किसी के भी मन में यह अहंकार आया कि मैं उठा लूँगा फिर यह पत्थर नहीं उठता। अब ग्यारह लोग कहाँ से आएँ? मंदिर में दर्शन करने आये लोगों को आवाज दी कुछ मंदिर के सेवादार थे सबने एक साथ जयकारा लगाया तर्जनी ऊंगली आगे की ओर देखते ही देखते चालीस पचास किलो के पत्थर को कमर की ऊँचाई तक उठाकर नीचे रख दिया।
बाद में बातचीत में पता चला कि पहले इसे सात लोग उठा लेते थे। शायद अब धरती पर पाप का बोझ ज्यादा हो गया है इसलिए ग्यारह लोग लगते हैं।
शिवरात्रि पर यहाँ बड़ा मेला लगता है हालांकि उस समय पत्थर को एक जंगले में रखा जाता है बाहर नहीं निकालते।प्रांगण में एक बड़ी तुला रखी थी। मन्नत पूरी होने के बाद लोग तुलादान करते हैं।
दर्शन के बाद चाय नाश्ते का आग्रह किया गया। साथ ही जानकारी मिली कि रामदेवरा का जागरण था रात में और आज अभी उनका भण्डारा चल रहा है। साहब जमीन पर बैठकर प्रसाद ग्रहण करेंगे या नहीं पूछने में संकोच था। मैंने तुरंत समाधान किया कि चाय नाश्ता न बनाया जाये हम रामदेवरा जी का प्रसाद ग्रहण करेंगे। सुनकर ही सेवादार लोग इतने प्रसन्न हो गये कि तुरंत आयोजन स्थल पर इंतजाम के निर्देश दिए गये। हम उनके पीछे वहाँ पहुँचे।
एक चौकी पर रामदेवरा जी विराजित थे दर्शन करके अंदर के साफ सुथरे कमरे में बिछात बिछाई गई और भोजन परोसा। सब्जी पूरी सूजी का हलवा दाल चावल। सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन। हलवा खाने के पहले लगा कि खूब मीठा होगा लेकिन बिलकुल नापतौल से डली शक्कर न मीठा न फीका। पता चला कि आज पूरा गाँव इस आयोजन में शामिल है। आसपास रहने वाले भी आज गाँव आ गये हैं। भोजन भी सभी ने मिलकर बनाया है।
भोजन प्रसाद पाकर हम बैठे और ग्रामीणों ने अपनी बिजली की समस्या साझा की। अच्छा यह था कि उसका समाधान भी था। उसके लिए जरूरी निर्देश देकर हम वहाँ से विदा हुए।
#शिवाबाबा
#बुरहानपुर

Tuesday, May 21, 2024

पोस्ट आफिस

 

पोस्टआफिस 
आज पोस्ट आफिस जाने का काम पडा। घर के पास वाला पोस्ट आफिस बंद था एक मन हुआ कि वापस घर चला जाए लेकिन फिर सोचा थोड़ा दूर ही सही गाड़ी से जाना है चले ही जाती हूँ। गूगल पर रास्ता देखते वहाँ पहुँची नई बनी बिल्डिंग में साफ सुथरा आफिस उसमें व्हीलचेयर जाने के लिए बना रैंप। पार्किंग शेड हालांकि वह पर्याप्त न था फिर भी कुछ तो था जितनी जगह थी उस हिसाब से।
अंदर जाकर देखा तो एक काउंटर पर लंबी लाइन नजर आई आगे लगभग छह सात आदमी खड़े थे उनके पीछे दो बच्चे खड़े थे जिनकी उम्र लगभग दस ग्यारह साल होगी और वे आपस में धींगामस्ती करते अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे थे। खैर मैं उनके पीछे जाकर खड़ी हो गई। अन्य काउंटर पर पोस्ट आफिस अकाउंट के काम हो रहे थे एक काउंटर जिस पर दिव्यांग लिखा था बंद था क्योंकि उस समय वहाँ कोई नहीं था।
मेरे आगे खड़े बच्चे के हाथ में दो तीन लिफाफे थे और दो सौ के नोट के साथ कुछ चिल्लर भी। वे आपस में धीरे धीरे बात करते कभी गले में हाथ डालकर लडियाते कभी लड़ते रूठते मनाते।
लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी तभी एक व्यक्ति एक डब्बा लेकर वहाँ आया लाइन को देखा और सामने काउंटर पर लाइन के बगल में जाकर खड़ा हो गया और डब्बा काउंटर पर रख दिया।
पूरी तरह सफेद बाल मूँछें बड़े से पेट पर उठंगी शर्ट पैंट और चप्पल पहने उसने एक दो बार आगे पीछे देखा और फिर अपना मोबाइल निकाल कर उसका कैमरा आॅन किया। काउंटर पर पैसों का लेनदेन चल रहा था उसने एक फोटो क्लिक की और फिर इधर-उधर देखा तो मुझे अपनी तरफ देखता पाया और जरा सकपका सा गया। फिर उसने कैमरा बंद करके किसी को फोन लगाया थोड़ी बहुत बातचीत करके फोन जेब के हवाले किया।
लाइन बहुत धीरे चल रही थी वह लगातार काउंटर के काम होते देख रहा था। तब तक मेरे पीछे और दो तीन लोग आकर खड़े हो गये।
तभी पीछे खड़े एक लड़के ने कहा एक्सक्यूज मी मैम मेरे पास कैश नहीं है आप मुझे 50 रुपये दे देंगी मैं आपके नंबर पर आनलाइन पेमेंट कर दूँगा।
दस सेकेंड लगे समझने में फिर मैंने कहा कि आनलाइन पेमेंट काउंटर पर कर दीजिए।
यहाँ आनलाइन की सुविधा नहीं है।
मैंने एक नजर काउंटर पर डाली वहाँ कोई क्यू आर कोड नहीं था। चूँकि मैं खुद आनलाइन ट्रांजेक्शन कम करती हूँ इसलिए उसकी बात गले नहीं उतरी और मैंने कहा ऐसे कैसे नहीं होगा आनलाइन ट्रांजेक्शन? यह सरकारी विभाग है केंद्र शासन का है आनलाइन सुविधा तो होना ही चाहिए। आप कहिये वे उपलब्ध करवाएंगे। नहीं तो आप काउंटर पर बैठे व्यक्ति के नंबर पर ट्रांजेक्शन करिये वह अपनी जेब से पैसे भर देगा।
कह तो दिया बाद में सोचती रही अगर कैश न होने से उसका काम नहीं हुआ तो क्या उसे पचास रुपये दे दूँ? फिर लगा क्या पता सच में पैसे नहीं हैं या फोन नंबर स्कैन करने के लिए झांसा है। क्या पता सच में कोई जरूरत मंद हो। तब तक उसने किसी को फोन लगाया और कहा कि आनलाइन पैसे दे सकते हैं क्या। वहाँ से जो भी कहा गया पर उसने अच्छा ठीक है कहते फोन बंद किया तो लगा हो जायेगा।


अब ध्यान फिर आगे गया।
जैसे ही सभी आदमी वहाँ से हटे और बच्चों का नंबर आया वह तुरंत डब्बा उठाकर आगे बढा और मैंने उसे टोक दिया। "भाईसाहब ये बच्चे और मैं आपके पहले से खड़े हैं आप लाइन में आइये।"
"मैं सीनियर सिटीजन हूँ"
यहाँ कहाँ लिखा है सीनियर सिटीजन के लिए अलग लाइन है? मैं भी लाइन में खड़ी हूँ महिलाओं की कोई अलग लाइन नहीं बनाई तो आप भी लाइन में आइये। ये बच्चों का नंबर है।
"सीनियर सिटीजन की कोई कद्र नहीं है मैं बता दूँ "वह कुछ अनाप-शनाप पर आया और मैंने ऊँगली उठाई
" जरा तमीज से "और वह चुप।
काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने उससे कहा आप लाइन में आइये। बच्चों के जाने के बाद उसने कोई कोशिश नहीं की कि आगे बढ़े मैंने अपना काम किया और बाहर निकल गई।
गाड़ी में बैठकर खुद से बड़बड़ाई जब तक आदमी लाइन में थे तब तक सीनियर सिटीजन होना याद नहीं आया। हष्ट-पुष्ट इंसान दो छोटे बच्चों की बारी मारकर सीनियर सिटीजन होने का दंभ भर रहे हैं। वैसे निकलते हुए देख लिया था कि मेरे बाद उनका ही नंबर था।

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...