Tuesday, December 7, 2010

ये सन्निकटता बनी रहे.....

आज जो अनोखी घटना हुई मेरे साथ उसने न सिर्फ मन को हिला दिया लेकिन एक अनूठी संतुष्टि का भाव भी दे गया...
स्कूल से आ कर अखबार पढ़ रही थी की एक खबर पर नज़र पड़ी पाकिस्तान में आत्मघाती बम विस्फोट से ५० लोगो की जाने गयी...
ऊंह वहां तो ये होता ही रहता है,मन में उठे ये भाव हतप्रभ करने वाले थे एक क्षण को ठिठकी,ये क्या सोचा ?क्यों सोचा?मरने वाले किसी के भाई बंद थे ,पर न जाने किस रो में पन्ना पलट दिया।
थोड़ी ही देर बाद किचन में काम करते हुए वहां कोने में रखी एक बंद पड़ी ट्यूब लाइट ,अचानक फिसल कर गिर पड़ी और धमाके की आवाज़ के साथ फूटे कांच की किरचे चेहरे को छूते हुए पूरे किचन में फ़ैल गयी । चेहरे पर लगी किरचे .......हाथ चेहरे पर जाते हुए अनायास ही मन कुछ मिनिटों पहले की अपनी सोच तक पहुँच गया ... वहां के लोग भी किसी के भाई बंद होते है ,किसी का परिवार,मरने का दर्द सबका एक सा होता है........
उस एक क्षण ने सारे एहसास एक साथ करा दिए....
बम धमाके में मरने वालों का दुःख,उनके परिवार के लिए संवेदना ,और इस सबसे बड़ा एक अलौकिक एहसास की ईश्वर मेरे बहुत करीब है.....मेरे मन के हर विचारों को पढ़ते हुए,गलत सोच के लिए तुरंत अपने तरीके से आगाह करते हुए....
बस ये सन्निकटता बनी रहे ........

Monday, November 15, 2010

सिद्धार्थ से बुद्ध बनने की ओर....


मम्मी ,बाल दिवस पर हमें सेवाधाम आश्रम जाना है ,बेटी ने जब आ कर कहा तो मन में एक ख्याल आया,ये स्कूल वाले न पता नहीं क्या क्या फितूर करते रहते है। अब रविवार को सुबह जल्दी उठो टिफिन बनाओ।
जाना जरूरी है क्या?? अपनी सुहानी सुबह को बचाने की एक अंतिम कोशिश करते हुए मैंने पूछा?

हाँ ,हमारा एक टेस्ट इसी पर आधारित होगा,इसलिए जाना जरूरी है।

ठीक है और कोई चारा भी न था,अब तो मार्क्स का सवाल था।

मम्मी ,पता है लोगो के साथ कैसे कैसे होता है। वहा हमें एक १०५ साल की एक बुजुर्ग महिला मिली,जब वो वहा ई थी तब ऐसा लग रहा था की अब बचेगी नहीं,और एक एक औरत और उसका बच्चा तो सूअरों के बीच मिला था।
बेटी ने अपनी यात्रा वृतांत सुनते हुए कहा। वो हतप्रभ थी ,ये जान कर की लोगो के साथ क्या क्या होता है।

और में सोच रही थी अच्छा हुआ स्कूल से उन्हें ले जाया गया ,

ये सिद्धार्थ अब बुद्ध बनने की राह देख चुके है ।


Sunday, October 31, 2010

एक बार....

उठे जब जनाजा मेरा
बस एक बार आ जाना,
दूर से ही सही ,
एक झलक देख लेना
दिखला जाना।

न देना कन्धा मेरे
जनाजे को,
न करना रुसवा मुझे
ज़माने में,
न आने देना मेरा
नाम भी होंठों पर
चेहरे की हर शिकन
छुपा जाना ।

न दे सकोगे एक
मुठ्ठी माती भी,
जानती हूँ
पर सबके जाने के
बाद,
दो फूल कब्र पर
रख जाना ।

नहीं देखना चाहती
आंसूं तुम्हारी आँखों में ,
पर हो सके तो
दो बूँद मेरी कब्र
पर गिरा जाना।

हसरत ही रही मिलने
की तुमसे,
dar था समझ न
सकेगा जमाना,
इसलिए दूर से ही सही,
एक झलक देख लेना
दिखला jana ना।

Saturday, October 2, 2010

परिचय

बाबु कमल नाथ दफ्टर में सबके चहेते थे,दिन भर लोगो की चुटकिया लेना,हल्केफुल्के समस सुनाना,किसी का मुंह लटका देख कर उसे हँसाना,काम का कितना ही बोझ क्यों न हो हमेशा हँसते हुए करना,यही उनकी पहचान थी। उनके मोबाइल में ऑफिस के सभी साथियों के फ़ोन नम्बर थे ,जिन पर वो घर से भी मेसेज करते थे। उनके बॉस भी उन्हें जानते थे उनसे कभी कुछ कहते नहीं थे बल्कि वो भी उनके हंसी मजाक का हिस्सा बन जाया करते थे।

पुराने बॉस का तबादला हो गया और नए बॉस आये। उन्हें बाबु कमलनाथ का ये हंसी मजाक पसंद नहीं था,पर उनको कुछ कह नहीं पाए क्योंकि उनके काम में कोई कोताही नहीं थी।बाबू कमलनाथ इससे बेखबर थे। उन्होंने कही से बॉस का नम्बर भी कबाड़ लिया और उन्हें भी मेसेज भेजने लगे। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उनके हर सन्देश के बाद उन्हें बॉस से धन्यवाद सन्देश मिलता ,कमलनाथजी उन्हें बहुत सज्जन व्यक्ति समझने लगे।

एक दिन सन्देश के बाद आये धन्यवाद के साथ एक प्रश्न भी आया "आप कौन है?? "

कमलनाथजी ने अपना परिचय मेसेज द्वारा भेज दिया।

उस दिन के बाद कमलनाथजी के संदेशों के बाद कोई धन्यवाद सन्देश नहीं आया।

Saturday, September 25, 2010

दौटेर्स डे के बहाने ..........

कल दौटेर्स डे है ,वैसे तो हमारे यहाँ ये दिन साल में दो बार ९-९ दिन के लिए मनाया जाता है ,पर वैश्वीकरण ने हमें अपने रीति- रिवाजों के अलावा भी कई दिन त्यौहार मानाने का मौका दिया है। अब में इस फेर में नहीं पड़ना चाहती की ये सही है या गलत। बस एक ही बात है दिमाग में की ये मेरी उन नन्ही परियों के लिए है जिनसे मेरे घर और जीवन में रौनक है।
२० साल पहले जब मेरे जीवन में किसी नन्हे सदस्य के आगमन की आहट हुई तो मन झूम उठा। उस समय तो सिर्फ ममता थी, फिर जब मन ने ये सोचना शुरू किया की क्या होना चाहिए जो निश्चित रूप से किसी के हाथ में न था पर मुझे ही क्या सबको अपनी उमीदों और दुआओं पर बहुत भरोसा रहता है सो मैंने भी सोचना शुरू किया ,कभी लड़का कभी लड़की। इसी बीच दिवाली आ गयी .दीपक लगाते हुए अनायास ही मन ने कहा इस घर में बिटिया आयी तो अगले साल सारे घी के दीपक लगाउंगी ,और सच में होंठो पर सुंदर सी हंसी गालों में गढ्ढे बड़ी बड़ी आँखों से निहारती बेटी जब गोद में आयी तो लगा पूरा घर दीपों से रोशन हो गया।
हॉस्पिटल में जब नर्स बेटी को नहलाने के लिए लेने आयी तो मन काँप गया कही इन्होने बदल दी तो ?ये तो इतनी छोटी है इसे पहचानूंगी कैसे?? बहुत ध्यान से देखा,उसके नन्हे हाथों को थामे फिर उसकी पतली पतली लम्बी लम्बी उंगलिया देखी,लगा यही सही पहचान है कितनी सुंदर उंगलियाँ है इससे सुंदर तो किसी की हो ही नहीं सकती और बिटिया नर्स को पकड़ा दी। जब वो नर्सरी से वापस आयी तो सबसे पहले उसकी उँगलियाँ देखी और इत्मिनान किया हाँ ये मेरी ही बिटिया है क्योंकि इससे सुंदर उँगलियाँ तो किसी की हो ही नहीं सकती।

सारा दिन उसके साथ कहाँ बीत जाता था पता ही नहीं चलता। हमारे जीवन की धुरी हो गयी वो। उसके हिसाब से उठाना बैठना ,खाना पीना ,कही आना जाना... थोड़ी बड़ी हुई जब मोटरसाइकल पर आगे बैठती थी ,उसके लिए कैप लाना ,छोटे चश्मे लेना.बीच-बीच में चप्पल -जूते चेक करना पता नहीं कितनी ही एक-एक चप्पल गिर जाती थी । मेरा तो सारा दिन "मेरे घर आयी एक नन्ही परी " गाते हुए निकल जाता था । उसके बोलना सीखते ही घर की रौनक को चार चाँद लग गए ,सारा दिन बातें और गाने ,मुझे याद है हाथ में कलम ले कर घर के फर्श पर चित्रकारी करते हुए जब उसने कहा मम्मी देखो "अ" तो मन विभोर हो गया मेरी बेटी पढना लिखना सीख रही है ।उसकी तोतली बोली में बोले गयी शब्द आज भी हमारे घर की डिक्शनरी के स्थाई शब्द है । दाल छालूम (दाल चावल ),किचड़ी (कीचड )और एक गीत "ओ हसीना गुण-गुण गाणी "ये आज भी हमारे यहाँ इसी तरह गया जाता है । ४ साल की थी जब सिंठेसैजर बजाना सीखने लगी ,म्यूजिक टीचर अपने घर पर एक कार्यक्रम करवाते थे वहां उसे बजाते हुए सुना तो में अपने आंसू न रोक पाई। दिवाली पर रंगोली बनाना,होली पर पापा को रंग लगा कर किलकारी भरना यादें यादें कितनी यादें सब तो लिख ही नहीं पाउंगी ...

फिर जब दूसरे नन्हे मेहमान के आगमन की आहट हुई तो मन आशंकित हुआ अगर इसके मन को कभी ठेस पहुंची तो ?उसे प्यार से बताया की कोई छोटी बहन या भाई आने वाला है तो उसने झट से कहा मुझे तो बहन चाहिए.और भगवन ने उसकी सुन ली। एक दिन बहुत दुखी थी और गुस्से में बोली मम्मी अब अपने घर किसी को मत बुलाना और न अपन किसी के घर जायेंगे । मैंने पूछा क्यों ? तो बोली सब मेरी छोटी बहिन को मुझसे मांगते है हम ले जाये - हम ले जाएँ मुझे अच्छा नहीं लगता में इसे किसी को नहीं दूँगी। आंसू छलक आये मेरे ,मन के किसी कोने में एक दुश्चिंता थी ,दो बेटियां हमारे बाद इनका कौन ?वो एक पल में दूर हो गयी और हजारों हज़ार धन्यवाद दिया भगवन को की दूसरी भी बेटी दी जब ये दोनों है एक दूसरे के साथ तो किसी और की क्या जरूरत??

यादे यादे यादें न जाने कितनी ,बस जिसने भी इन यादों को याद करने के लिए ये दिन इजाद किया उसको धन्यवाद,aur dhanyavad arun royji ko jinhone is din ke liye kuchh likhane ka agrah kiya.

Monday, August 23, 2010

जीजी तूने चिठ्ठी नहीं लिखी

रक्षाबंधन,ये शब्द ही मन में हलचल मचा देता है हर दिल में चाहे वो भाई हो या बहन अपनो की यादे उनके साथ बिताये बचपन के अनगिनत खट्टे -मीठे पल आँखों के आगे कौंध जाते हैं। बात बात पर वो भाइयों से लड़ना,दादी का उलाहना देना,भाई से लड़ेगी तो वो ससुराल लेने नहीं आएगा,पापा के पास भाइयों की शिकायत करना,और पापा से उन्हें डांट पड़वा कर युध्ध जीतने जैसी अनुभूति होना, साईकिल सिखाने के लिए भाई के नखरे,और बाज़ार जाने का कहने पर तू रहने दे मैं ला दूंगा कह कर लाड जताना ....और भी न जाने क्या क्या.....और बचपन में राखी के दिन सुबह से भाइयों का आस पास घूमना जीजी राखी कब बांधेगी?हर बीतते सावन के साथ राखी की एक अनोखी याद । और ये यांदे हर भाई बहन के मन में अपना स्थान बिना धूमिल किये बनाये रखती हैं सालों साल यहाँ तक की मरते दम तक। दादी को अपने भाइयों के यहाँ जाने की उत्सुकता और मम्मी को लेने आये मामा के लिए भोजन बनाते देखना ,मामा के यहाँ जाने की तय्यरियाँ करना न जाने क्या क्या.....
पर यादे हमेशा एक अनोखा सा अहसास ही कराती है। कभी कभी इन एहसासों में एक अजीब सी उदासी का अहसास भी होता है जब किसी सहेली के सामने राखी की तय्यारियों की बाते पूरे उत्साह से होती है और बाद में उसे चुप देख कर ध्यान आता है की उसका तो कोई भाई ही नहीं है।

बात बहुत पुराणी है शायद ३५ साल पुराणी,दादी के साथ राखी के दिन गोपाल मंदिर गयी ,दादी हर शुभ दिन गोपाल मंदिर जरूर जाती थीं और सबसे पहली राखी भी घर में बाल्मुकुंदजी को ही बंध्वाती थीं ,वहां मंदिर के द्वार पर भिखारी बैठे रहते थे जो हर आने जाने वाले से पैसे मांगते थे ,पर एक भिखारी हाथ में राखी ले कर कर हर महिला को रोक कर उसे राखी बाँधने की याचना कर रहा था,जो कातरता उसकी आवाज़ में थी वो आज भी शूल बन कर दिल में कही गहरे पैठी हुई है,जब किसी के भाई व्यस्तता के कारन बहनों को नहीं बुलाते या बहने नहीं जा पाती ,तब पता नहीं क्यों एक हाथ जेहन में उभरता है हाथ में राखी और स्वर में याचना लिए -ऐ बहन मुझे राखी बांध दे,ऐ जीजी रुक तो जा,मुझे राखी बांध दे में नेग भी दूंगा ऐ जीजी रुक जा राखी बांध दे ।

शादी के बाद ये सौभाग्य रहा हर साल भाइयों की कलाई राखी बाँधने के लिए मिलती रही ,दोनों में से एक न एक भाई हमेशा हाज़िर रहता था.जो नहीं आ पाटा था उसके लिए राखी के साथ खूब बड़ी सी चिठ्ठी लिखती थी,फिर टेलेफोन का समय आ गया । एक बार आलस कहूँ या कुछ और, छोटे को चिठ्ठी नहीं लिखी , बस राखी भेज दी , शायद ये सोच कर की बात तो हो ही जाती है,जितना उत्साह उसे राखी भेजने का था उससे कही ज्यादा की उसे पसंद आयी की नहीं ये जानने का रहता था,इसलिए फ़ोन पर उससे पूछा राखी पसंद आयी?पर जवाब आया "जीजी तूने चिठ्ठी तो लिखी ही नहीं "। उस दिन अपने आलस पर इतनी शर्म आयी की कह नहीं सकती ,कितने ही बहाने बनाने की कोशिश की पर उसका कहना "जो बात तेरी चिठ्ठी पढ़ने में है फ़ोन पर बात करने में थोड़ी है "ने जबान सिल दी ।

इस साल राखी ला कर राखी सच में समय नहीं मिल पाया इसलिए चिठ्ठी नहीं लिख पाई ,भाई के शब्द मन में गूंजते रहे ,जीजी तूने चिठ्ठी नहीं लिखी, इसलिए सोच लिया चाहे देर से स्पीड पोस्ट से भेजूंगी ,पर चिठ्ठी लिख कर साथ जरूर रखूंगी। इस बार मेरी राखी के साथ चिठ्ठी भी पहुंचेगी।

Saturday, August 14, 2010

मानसिकता को भ्रष्ट होने से बचाए ..........

पंद्रह अगस्त आते ही लोगो में देश भक्ति की लहर दौड़ने लगती है। देश के भ्रष्ट नेतायों को,सड गए तंत्र को,कोसने का सिलसिला शुरू हो जाता है.और ये सब इतने खुले आम होता है की वाकई लगता है हम एक स्वत्रंत देश के स्वतंत्र नागरिक है,जब जहाँ चाहे जो चाहे जब चाहे कह सकते हैं। प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रोनिक मीडिया सभी और देश के हालत को कोसने का ,और भ्रष्टाचार को नेताओ की देन बताने का सिलसिला।
आइये याद करे अपने बचपन को .जब हम छोटे थे क्या कभी हमने भ्रष्टाचार का नाम सुना था?क्या इसका इतना प्रचार किया जाता था?देश के नेता बेशक सही मायने में लीडर थे ,उनकी एक साफ सुथरी छवि थी ,उनकी इज्जत थी ,और हम उन पर यकीन करते थे,सिस्टम पर भरोसा करते थे। तो आज इतनी पुरानी बात करने का क्या औचित्य?
आइये बताती हूँ

छोटे बच्चे क्लास ५-६ के,अंतर विद्यालय गायन प्रतियोगिता में भाग लेने गए,नहीं जीत पाए,कोई और स्कूल जीत गया ,अब बच्चों की बातें सुनिए,मेम उस स्कूल के प्रिंसिपल और जजेस की बहुत अच्छी दोस्ती है ,जब भी फलाने स्कूल के प्रिंसिपल जज होते है ,वही स्कूल जीतता है ,मैंने कहा नहीं बेटा ऐसा नहीं है उन बच्चों ने वाकई बहुत अच्छा गाया था इसलिए वो जीते,पर बच्चों के मन से इस बात को निकलना और उनकी खुद की कमियों की और उनको देखने के लिए प्रेरित करना बहुत मुश्किल काम था ।
childran'स डे पर बच्चों को फिल्म दिखने का विचार हुआ,पर निर्णय लेते देर हो गयी ,हम दो तीन टीचर इस बारे में बात कर ही रहे थे की बुकिंग मिलेगी या नहीं ,तभी एक बच्चा बोला मेम उस थिएटर के मालिक मेरे पापा के दोस्त है उनसे कह कर बुकिंग करवा लेते है। (१०-११ साल के बच्चे जान पहचान का महत्त्व समझते है ,सोचते है जान पहचान है तो हर काम हो जायेगा ,चाहे कितना भी मामूली काम क्यों न हो खुद कोशिश करने के बजाय जान पहचान से काम क्यों न निकलवा लिया जाये)।
छुट्टियाँ लगने से पहले बच्चों से पूछा कौन कहा जा रहा है ?बच्चे उत्साहित थे सब अपने-अपने प्लान बता रहे थे,तभी एक बच्चा बोला में सिक्किम जाऊंगा,मैंने कहा मुझे भी जाना है पर अब रेसेर्वाशन नहीं मिलेगा,बच्चे चिल्लाये नहीं मेम आप किसी एजेंट के पास जाइये उनके पास रहते है ,थोड़े पैसे ज्यादा लेते है पर १००% मिल जाता है,हम तो दो घंटे में प्लान बना कर कही भी चले जाते है। (बच्चे के ज्ञान पर अचंभित में सोचने लगी क्या ये बच्चे कभी सीधे तरीके से जिंदगी में कोई काम करना चाहेंगे?)।
पैसे लेकर देकर कोई काम करवाना,किसी की जीत में किसी और का हाथ देखना ,किसी की हार में किसी का हाथ देखना,हर काम का शोर्टकट ढूँढना ,हर अधिकारी कर्मचारी को पैसे लेने देने में उस्ताद समझना ,हर सरकारी तंत्र को आँख मूँद कर बेकार नाकारा समझाना हर नेता को बिकाऊ समझना ,ये सभी बाते हमने अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता की आड़ में नयी पीढ़ी के मन में कूट-कूट कर भर दी है ,इस पर हम चाहते है की युवा पीढ़ी इमानदार हो ,मूल्यों और संस्कारों का पालन करे,सिस्टम को इमानदार तरीके से चलने में अपना योगदान दे । क्या हमें नहीं लगता की हम हर समय गलत धुन्धने के कुछ सही ढूंढें और उसका प्रचार ज्यादा करे जिससे नयी पीढ़ी को ये विश्वास हो की हमारे देश में बहुत कुछ अच्छा भी है,क्या आज़ादी की सालगिरह पर हमें हमारी मानसिकता को भ्रष्ट होने से बचाने की जरूरत नहीं है ।

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...