Saturday, September 25, 2010

दौटेर्स डे के बहाने ..........

कल दौटेर्स डे है ,वैसे तो हमारे यहाँ ये दिन साल में दो बार ९-९ दिन के लिए मनाया जाता है ,पर वैश्वीकरण ने हमें अपने रीति- रिवाजों के अलावा भी कई दिन त्यौहार मानाने का मौका दिया है। अब में इस फेर में नहीं पड़ना चाहती की ये सही है या गलत। बस एक ही बात है दिमाग में की ये मेरी उन नन्ही परियों के लिए है जिनसे मेरे घर और जीवन में रौनक है।
२० साल पहले जब मेरे जीवन में किसी नन्हे सदस्य के आगमन की आहट हुई तो मन झूम उठा। उस समय तो सिर्फ ममता थी, फिर जब मन ने ये सोचना शुरू किया की क्या होना चाहिए जो निश्चित रूप से किसी के हाथ में न था पर मुझे ही क्या सबको अपनी उमीदों और दुआओं पर बहुत भरोसा रहता है सो मैंने भी सोचना शुरू किया ,कभी लड़का कभी लड़की। इसी बीच दिवाली आ गयी .दीपक लगाते हुए अनायास ही मन ने कहा इस घर में बिटिया आयी तो अगले साल सारे घी के दीपक लगाउंगी ,और सच में होंठो पर सुंदर सी हंसी गालों में गढ्ढे बड़ी बड़ी आँखों से निहारती बेटी जब गोद में आयी तो लगा पूरा घर दीपों से रोशन हो गया।
हॉस्पिटल में जब नर्स बेटी को नहलाने के लिए लेने आयी तो मन काँप गया कही इन्होने बदल दी तो ?ये तो इतनी छोटी है इसे पहचानूंगी कैसे?? बहुत ध्यान से देखा,उसके नन्हे हाथों को थामे फिर उसकी पतली पतली लम्बी लम्बी उंगलिया देखी,लगा यही सही पहचान है कितनी सुंदर उंगलियाँ है इससे सुंदर तो किसी की हो ही नहीं सकती और बिटिया नर्स को पकड़ा दी। जब वो नर्सरी से वापस आयी तो सबसे पहले उसकी उँगलियाँ देखी और इत्मिनान किया हाँ ये मेरी ही बिटिया है क्योंकि इससे सुंदर उँगलियाँ तो किसी की हो ही नहीं सकती।

सारा दिन उसके साथ कहाँ बीत जाता था पता ही नहीं चलता। हमारे जीवन की धुरी हो गयी वो। उसके हिसाब से उठाना बैठना ,खाना पीना ,कही आना जाना... थोड़ी बड़ी हुई जब मोटरसाइकल पर आगे बैठती थी ,उसके लिए कैप लाना ,छोटे चश्मे लेना.बीच-बीच में चप्पल -जूते चेक करना पता नहीं कितनी ही एक-एक चप्पल गिर जाती थी । मेरा तो सारा दिन "मेरे घर आयी एक नन्ही परी " गाते हुए निकल जाता था । उसके बोलना सीखते ही घर की रौनक को चार चाँद लग गए ,सारा दिन बातें और गाने ,मुझे याद है हाथ में कलम ले कर घर के फर्श पर चित्रकारी करते हुए जब उसने कहा मम्मी देखो "अ" तो मन विभोर हो गया मेरी बेटी पढना लिखना सीख रही है ।उसकी तोतली बोली में बोले गयी शब्द आज भी हमारे घर की डिक्शनरी के स्थाई शब्द है । दाल छालूम (दाल चावल ),किचड़ी (कीचड )और एक गीत "ओ हसीना गुण-गुण गाणी "ये आज भी हमारे यहाँ इसी तरह गया जाता है । ४ साल की थी जब सिंठेसैजर बजाना सीखने लगी ,म्यूजिक टीचर अपने घर पर एक कार्यक्रम करवाते थे वहां उसे बजाते हुए सुना तो में अपने आंसू न रोक पाई। दिवाली पर रंगोली बनाना,होली पर पापा को रंग लगा कर किलकारी भरना यादें यादें कितनी यादें सब तो लिख ही नहीं पाउंगी ...

फिर जब दूसरे नन्हे मेहमान के आगमन की आहट हुई तो मन आशंकित हुआ अगर इसके मन को कभी ठेस पहुंची तो ?उसे प्यार से बताया की कोई छोटी बहन या भाई आने वाला है तो उसने झट से कहा मुझे तो बहन चाहिए.और भगवन ने उसकी सुन ली। एक दिन बहुत दुखी थी और गुस्से में बोली मम्मी अब अपने घर किसी को मत बुलाना और न अपन किसी के घर जायेंगे । मैंने पूछा क्यों ? तो बोली सब मेरी छोटी बहिन को मुझसे मांगते है हम ले जाये - हम ले जाएँ मुझे अच्छा नहीं लगता में इसे किसी को नहीं दूँगी। आंसू छलक आये मेरे ,मन के किसी कोने में एक दुश्चिंता थी ,दो बेटियां हमारे बाद इनका कौन ?वो एक पल में दूर हो गयी और हजारों हज़ार धन्यवाद दिया भगवन को की दूसरी भी बेटी दी जब ये दोनों है एक दूसरे के साथ तो किसी और की क्या जरूरत??

यादे यादे यादें न जाने कितनी ,बस जिसने भी इन यादों को याद करने के लिए ये दिन इजाद किया उसको धन्यवाद,aur dhanyavad arun royji ko jinhone is din ke liye kuchh likhane ka agrah kiya.

Monday, August 23, 2010

जीजी तूने चिठ्ठी नहीं लिखी

रक्षाबंधन,ये शब्द ही मन में हलचल मचा देता है हर दिल में चाहे वो भाई हो या बहन अपनो की यादे उनके साथ बिताये बचपन के अनगिनत खट्टे -मीठे पल आँखों के आगे कौंध जाते हैं। बात बात पर वो भाइयों से लड़ना,दादी का उलाहना देना,भाई से लड़ेगी तो वो ससुराल लेने नहीं आएगा,पापा के पास भाइयों की शिकायत करना,और पापा से उन्हें डांट पड़वा कर युध्ध जीतने जैसी अनुभूति होना, साईकिल सिखाने के लिए भाई के नखरे,और बाज़ार जाने का कहने पर तू रहने दे मैं ला दूंगा कह कर लाड जताना ....और भी न जाने क्या क्या.....और बचपन में राखी के दिन सुबह से भाइयों का आस पास घूमना जीजी राखी कब बांधेगी?हर बीतते सावन के साथ राखी की एक अनोखी याद । और ये यांदे हर भाई बहन के मन में अपना स्थान बिना धूमिल किये बनाये रखती हैं सालों साल यहाँ तक की मरते दम तक। दादी को अपने भाइयों के यहाँ जाने की उत्सुकता और मम्मी को लेने आये मामा के लिए भोजन बनाते देखना ,मामा के यहाँ जाने की तय्यरियाँ करना न जाने क्या क्या.....
पर यादे हमेशा एक अनोखा सा अहसास ही कराती है। कभी कभी इन एहसासों में एक अजीब सी उदासी का अहसास भी होता है जब किसी सहेली के सामने राखी की तय्यारियों की बाते पूरे उत्साह से होती है और बाद में उसे चुप देख कर ध्यान आता है की उसका तो कोई भाई ही नहीं है।

बात बहुत पुराणी है शायद ३५ साल पुराणी,दादी के साथ राखी के दिन गोपाल मंदिर गयी ,दादी हर शुभ दिन गोपाल मंदिर जरूर जाती थीं और सबसे पहली राखी भी घर में बाल्मुकुंदजी को ही बंध्वाती थीं ,वहां मंदिर के द्वार पर भिखारी बैठे रहते थे जो हर आने जाने वाले से पैसे मांगते थे ,पर एक भिखारी हाथ में राखी ले कर कर हर महिला को रोक कर उसे राखी बाँधने की याचना कर रहा था,जो कातरता उसकी आवाज़ में थी वो आज भी शूल बन कर दिल में कही गहरे पैठी हुई है,जब किसी के भाई व्यस्तता के कारन बहनों को नहीं बुलाते या बहने नहीं जा पाती ,तब पता नहीं क्यों एक हाथ जेहन में उभरता है हाथ में राखी और स्वर में याचना लिए -ऐ बहन मुझे राखी बांध दे,ऐ जीजी रुक तो जा,मुझे राखी बांध दे में नेग भी दूंगा ऐ जीजी रुक जा राखी बांध दे ।

शादी के बाद ये सौभाग्य रहा हर साल भाइयों की कलाई राखी बाँधने के लिए मिलती रही ,दोनों में से एक न एक भाई हमेशा हाज़िर रहता था.जो नहीं आ पाटा था उसके लिए राखी के साथ खूब बड़ी सी चिठ्ठी लिखती थी,फिर टेलेफोन का समय आ गया । एक बार आलस कहूँ या कुछ और, छोटे को चिठ्ठी नहीं लिखी , बस राखी भेज दी , शायद ये सोच कर की बात तो हो ही जाती है,जितना उत्साह उसे राखी भेजने का था उससे कही ज्यादा की उसे पसंद आयी की नहीं ये जानने का रहता था,इसलिए फ़ोन पर उससे पूछा राखी पसंद आयी?पर जवाब आया "जीजी तूने चिठ्ठी तो लिखी ही नहीं "। उस दिन अपने आलस पर इतनी शर्म आयी की कह नहीं सकती ,कितने ही बहाने बनाने की कोशिश की पर उसका कहना "जो बात तेरी चिठ्ठी पढ़ने में है फ़ोन पर बात करने में थोड़ी है "ने जबान सिल दी ।

इस साल राखी ला कर राखी सच में समय नहीं मिल पाया इसलिए चिठ्ठी नहीं लिख पाई ,भाई के शब्द मन में गूंजते रहे ,जीजी तूने चिठ्ठी नहीं लिखी, इसलिए सोच लिया चाहे देर से स्पीड पोस्ट से भेजूंगी ,पर चिठ्ठी लिख कर साथ जरूर रखूंगी। इस बार मेरी राखी के साथ चिठ्ठी भी पहुंचेगी।

Saturday, August 14, 2010

मानसिकता को भ्रष्ट होने से बचाए ..........

पंद्रह अगस्त आते ही लोगो में देश भक्ति की लहर दौड़ने लगती है। देश के भ्रष्ट नेतायों को,सड गए तंत्र को,कोसने का सिलसिला शुरू हो जाता है.और ये सब इतने खुले आम होता है की वाकई लगता है हम एक स्वत्रंत देश के स्वतंत्र नागरिक है,जब जहाँ चाहे जो चाहे जब चाहे कह सकते हैं। प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रोनिक मीडिया सभी और देश के हालत को कोसने का ,और भ्रष्टाचार को नेताओ की देन बताने का सिलसिला।
आइये याद करे अपने बचपन को .जब हम छोटे थे क्या कभी हमने भ्रष्टाचार का नाम सुना था?क्या इसका इतना प्रचार किया जाता था?देश के नेता बेशक सही मायने में लीडर थे ,उनकी एक साफ सुथरी छवि थी ,उनकी इज्जत थी ,और हम उन पर यकीन करते थे,सिस्टम पर भरोसा करते थे। तो आज इतनी पुरानी बात करने का क्या औचित्य?
आइये बताती हूँ

छोटे बच्चे क्लास ५-६ के,अंतर विद्यालय गायन प्रतियोगिता में भाग लेने गए,नहीं जीत पाए,कोई और स्कूल जीत गया ,अब बच्चों की बातें सुनिए,मेम उस स्कूल के प्रिंसिपल और जजेस की बहुत अच्छी दोस्ती है ,जब भी फलाने स्कूल के प्रिंसिपल जज होते है ,वही स्कूल जीतता है ,मैंने कहा नहीं बेटा ऐसा नहीं है उन बच्चों ने वाकई बहुत अच्छा गाया था इसलिए वो जीते,पर बच्चों के मन से इस बात को निकलना और उनकी खुद की कमियों की और उनको देखने के लिए प्रेरित करना बहुत मुश्किल काम था ।
childran'स डे पर बच्चों को फिल्म दिखने का विचार हुआ,पर निर्णय लेते देर हो गयी ,हम दो तीन टीचर इस बारे में बात कर ही रहे थे की बुकिंग मिलेगी या नहीं ,तभी एक बच्चा बोला मेम उस थिएटर के मालिक मेरे पापा के दोस्त है उनसे कह कर बुकिंग करवा लेते है। (१०-११ साल के बच्चे जान पहचान का महत्त्व समझते है ,सोचते है जान पहचान है तो हर काम हो जायेगा ,चाहे कितना भी मामूली काम क्यों न हो खुद कोशिश करने के बजाय जान पहचान से काम क्यों न निकलवा लिया जाये)।
छुट्टियाँ लगने से पहले बच्चों से पूछा कौन कहा जा रहा है ?बच्चे उत्साहित थे सब अपने-अपने प्लान बता रहे थे,तभी एक बच्चा बोला में सिक्किम जाऊंगा,मैंने कहा मुझे भी जाना है पर अब रेसेर्वाशन नहीं मिलेगा,बच्चे चिल्लाये नहीं मेम आप किसी एजेंट के पास जाइये उनके पास रहते है ,थोड़े पैसे ज्यादा लेते है पर १००% मिल जाता है,हम तो दो घंटे में प्लान बना कर कही भी चले जाते है। (बच्चे के ज्ञान पर अचंभित में सोचने लगी क्या ये बच्चे कभी सीधे तरीके से जिंदगी में कोई काम करना चाहेंगे?)।
पैसे लेकर देकर कोई काम करवाना,किसी की जीत में किसी और का हाथ देखना ,किसी की हार में किसी का हाथ देखना,हर काम का शोर्टकट ढूँढना ,हर अधिकारी कर्मचारी को पैसे लेने देने में उस्ताद समझना ,हर सरकारी तंत्र को आँख मूँद कर बेकार नाकारा समझाना हर नेता को बिकाऊ समझना ,ये सभी बाते हमने अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता की आड़ में नयी पीढ़ी के मन में कूट-कूट कर भर दी है ,इस पर हम चाहते है की युवा पीढ़ी इमानदार हो ,मूल्यों और संस्कारों का पालन करे,सिस्टम को इमानदार तरीके से चलने में अपना योगदान दे । क्या हमें नहीं लगता की हम हर समय गलत धुन्धने के कुछ सही ढूंढें और उसका प्रचार ज्यादा करे जिससे नयी पीढ़ी को ये विश्वास हो की हमारे देश में बहुत कुछ अच्छा भी है,क्या आज़ादी की सालगिरह पर हमें हमारी मानसिकता को भ्रष्ट होने से बचाने की जरूरत नहीं है ।

Saturday, July 24, 2010

भारतीय संस्कृति में शादी में लेन-देन का प्रचलन बहुत अधिक है,और ये कभी कभी लालच की हद तक जा पहुँचता है.जब भी इस बारे में घर में बाते होती है वो इस रूप में होती है जैसे लड़के वाले ज्यादा से ज्यादा हडप कर लेना चाहते है ,उनके रिश्तेदार ज्यादा सयानापन दिखा रहे है,इसी तरह शादी के रिसेप्शन के खर्चे,गहनों कपड़ो पर होने वाला खर्च आदि के बारे में बाते सहज रूप में न हो कर एक आक्षेप के रूप में होती है । जहा घर के लोग इन्हें सहज लेते है वहा रिश्तेदार बाल की खाल निकल कर सहज रिश्तों को तनाव का रूप देने से नहीं चूकते,लड़की जिस घर में पली-बड़ी है उस से उसका लगाव स्वाभाविक है ,जब वो इन बातों के लिए अपने परिवार को परेशान होते देखती है उसके मन में ससुरालवालों के लिए एक दुर्भावना आ जाती है ,शादी के बाद भी वो इन बातों से ही घर के व्यवहार को जोड़ कर देखती है जो पूर्वाग्रह के रूप में नज़र आती है ।

Tuesday, June 15, 2010

महेश्वर यात्रा













छुट्टियों में कही जाने का कार्यक्रम नहीं बन पाया तो सोचा चलो एक दो दिन के लिए महेश्वर ही हो आया जाये.वैसे मालवा की गर्मी छोड़ कर निमाड़ की गर्मी में जाना कोई बुध्धिमात्तापूर्ण फैसला तो नहीं कहा जायेगा,पर और कही जाने के लिए सफ़र के लिए ही कम-से-कम २४ घंटे चाहिए,फिर रुकने के लिए समय ही कहा बचा? हमारे पास कुल दो दिन का समय था जिसमे आना-जाना और घर ऑफिस की दिनचर्या से थोडा आराम हमारा लक्ष्य था.इसलिए महेश्वर को चुना.वैसे भी वहा ज्यादा घूमना नहीं था ले दे कर एक घाट ही तो है जहा जाया जा सकता है।
तो हम पहुँच गए महेश्वर। महेश्वर होलकर वंश की महारानी "अहिल्याबाई 'की कर्मस्थली रही है.उन्होंने इंदौर रियासत की बागडोर यही से संचालित की.नर्मदा नहीं के किनारे उनका बहुत साधारण सुविधायों वाला किला बना है.पर उन्होंने यहाँ नदी के किनारे भव्य घाट बनवाये।( हमारे जाने के दो दिन पहले ही किसी फिल्म की शूटिंग के लिए पूरा देओल परिवार यहाँ था)।
दिन तो होटल मे ऐ सी में गुजरा पर शाम को घूमने घाट पर चले गए।वहा शाम की आरती हो रही थी । पंडितजी के साथ कुछ श्रद्धालु आरती और भजन गा रहे थे.कुछ लोग नहा भी रहे थे.पर नहाने के बाद घाट पर दिया जला कर अपनी श्रध्दा समर्पित कर रहे थे। हम लोग भी आरती के ख़त्म होने तक वहा खड़े रहे ,फिर बैठने का स्थान तलाश करने लगे । पत्थर तो गर्म थे पर नदी में पाँव डाल कर बैठना बहुत सुकून दायक लग रहा था।हमारे सामने ही एक परिवार के बहुत सारे सदस्य खाना खा रहे थे,और हम बैठे हुए अनुमान लगाने लगे की गर्मियों की छुट्टियों में सब बहन-बेटियां अपने बच्चों के साथ मायके आयी है और आज यहाँ पिकनिक मनाई जा रही है । घर से लाया खाना ,पानी की बड़ी सी बोतल ,बिछाने के लिए चादर,बर्तन,और ढेर सारी बातें। खाना खा कर बच्चे खेलने लगे पानी में तैरती बड़ी बड़ी मछलियों को देखने लगे,बड़ी उम्र की महिलाये घाट पर घूमने निकल गयी,और बाकियों ने फटाफट सामान समेत लिया। अभी हम उस परिवार की चहल-पहल में ही खोये थे तभी आवाज़ आयी"जय श्री कृष्णा" और हमरी बगल में एक और परिवार आ कर अपनी चादर बिछाने लगा। थोड़ी ही देर में खाने का सामान सज गया । अपने आस-पास नज़र डाली तो पाया की यहाँ कई परिवार है जो अपना शाम का खाना यहाँ आ कर खा रहे है। मन विभोर हो गया इस सहज सरल जीवन शैली को देख कर। दिनभर की तीखी धुप में तो बाहर निकलना संभव नहीं है,शाम को इस छोटी सी जगह में जाये तो कहा जाए ? इसलिए शाम होते ही परिवार की महिलाये बच्चे खाना बना कर नदी किनारे आ कर गपशप करते हुए खाते है और अपनी दुकान या काम से फारिग हो कर घर के पुरुष सदस्य भी यही आ जाते है। एक दो घंटे का समय कट जाता है ,रूटीन से हट कर मन प्रसन्न हो जाता है।
दूसरे दिन शनि जयंती थी ,सोचा जब इतने पावन दिन इस पवित्र नगरी में जीवनदायनी नर्मदा के किनारे है तो क्यों न स्नान किया जाये। घाट पर कपडे बदलने की व्यवस्था संतोषप्रद थीं, सो दूसरे दिन सुबह पहुँच गए नदी किनारे.घाट खचाखच भरे थे,पर कोई चिकचिक नहीं थी ,सभी शांति से जगह मिलाने का इन्तेजार कर रहे थे।ऐसा लग रहा था आज तो सारा महेश्वर ही यहाँ उमड़ आया है। स्नान के साथ लोगो का मिलाना मिलाना ,हालचाल पूछना ,नहा कर साथ लाये लोटे से घाट पर बने शिवलिंग पर जल चढ़ाना ,दीपक लगाना ,सब इतना सुखद लग रहा था,की उसका वर्णन नहीं कर सकती । ऐसा लगा महानगरीय जीवन शैली में जाने कितनी छोटी-छोटी बातों को त्याग कर हम कितनी ही बड़ी-बड़ी खुशियों को अपने जीवन में आने से रोक रहे है । दिन के उजाले में इन भव्य घाटों को देख कर अचम्भित हो गए। उस ज़माने में जब मशीनी सुविधाए नहीं थी ,कैसे बने होंगे ये घाट,कैसे की गयी होगी इनकी परिकल्पना कितना समय लगा होगा इन्हें बनाने में,और कितना संयम रहा होगा उन लोगो में ,ये सोच में ही नहीं समां पाया।
स्नान के बाद घट पर स्थित सहस्त्रबाहु मंदिर दर्शन के लिए गए। यह एक अति प्राचीन मंदिर है जहा सालों से शुध्ध घी के ७ दीपक जल रहे है। यहाँ इन दीपक के लिए घी दान देने की परंपरा है,और यहाँ इतना घी चढ़ावे में आता है .की कई कमरे भरे हुए है।
महेश्वर यहाँ की हाथ की बनी महेश्वरी साड़ियों के लिए प्रसिध्ध है । इन सरियों को हाथ से बने लूम पर बनाया जाता है.जिनकी सुनहरी किनारी अपनी सुन्दरता में बेजोड़ अब घूमने आये और खरीदी न करे ये पत्नीव्रत धर्म के खिलाफ होता है। इसलिए दो साड़ियाँ खरीद कर पतिदेव को उनका धर्म निभाने का पुण्य प्राप्त करने का मौका भी दिया।
इस तरह महेश्वर यात्रा सानंद संपन्न हुई । साथ में कुछ फोटेस है आप अभी इन्ही का आनद लीजिये,और जब भी समय मिले घूम आइये।






Tuesday, June 8, 2010

न्याय........

२ दिसम्बर १९८४ शाम को ५ बजे मम्मी और पास में रहने वाली वैध आंटी के साथ घूमने निकली। सूरज पश्चिम में डूबने को था.आसमान में सुर्ख लाल रंग बिखेर कर आगाह कर रहा था की,पंछियों घर जाओ मुझे जाना है। पंछी भी जैसे सूरज की चेतावनी को समझ कर अपने साथिओं को आवाज़े दे कर तेज़ी से चले जा रहे थे।
मम्मी ने कहा ,कितनी सुंदर शाम है पूरा आसमान लाल हो गया ,"देखो कैसा दिन फूला है"।
आंटी बोली ,हमारी दादी कहती थी ऐसा दिन डूबना अशुभ होता है।
अरे, हम तो समझ रहे थे कितना सुन्दर लग रहा है, मम्मी ने कहा ।
बात आयी गयी हो गई,हम लोग घूम कर कुछ गप्प्पे मार कर वापस अपने -अपने घरो को चले गए।
दूसरे दिन सुबह सामान्य हुई.अपने काम निबटा कर मम्मी आराम कर रही थी, तभी पास वाली आंटी ने आवाज़ दे कर कहा ,:भाभी जल्दी आओ ,वैध भाभी के यहाँ कुछ हो गया।
देखा उनके घर के सामने भीड़ जमा थी.कुछ लोग अंदर थे ,बाहर लोगो से बात करने पर पता चला की कल भोपाल में कुछ हादसा हो गया ,वैध सर वही थे ,उनकी तबियत ख़राब हो गयी है। अभी भोपाल से फ़ोन आया है ,सर के कोलाज में ,वहा से उनके साथियों ने घर आ कर खबर दी । आंटी के कुछ करीबी रिश्तेदार आये है उन्हें भोपाल ले जाने के लिए।
यहाँ आंटी अपने बेटे के साथ रहती थी,अंकल का कुछ दिनों पहले ही भोपाल तबादला हुआ था.उनका बड़ा बेटा कही बाहर रह कर पढ़ रहा है। जब आंटी बाहर आयीं तो सभी ने उन्हें धधास बंधाया ।
सब ठीक हो जायेगा भाभीजी ,आप चिंता मत करो।
उस शाम सूरज भी जैसे आगाह करना भूल गया, बस उदास सा, लालिमा बिखेरे बिना चला गया । लोगो में चर्चा होती रही क्या हुआ होगा, सर तो बिलकुल ठीक थे,वगैरह वगैरह ।
उस समय २४ घंटों के न्यूज़ चैनल्स नहीं होते थे,न ही शाम के अखबार खंडवा जैसी छोटी सी जगह में छपते थे ।
रात ८ बजे के समाचार में पता चला की हादसे की भयावहता क्या है ?पर कौन सी गैस,कितनी नुकसानदेह ये अभी भी समझ नहीं आ रहा था ।
दूसरे दिन अखबारों में छपी ख़बरों ने तो जैसे सब को हिला कर रख दिया। अब सही मायने में सब को वैध सर की तबियत की चिंता हुई।
उस समय मोबाइल जैसे साधन भी नहीं ठ । २-३ दिन बाद किसी लड़के ने कोलेज से ला कर खबर दी ,कि "सर नहीं रहे "।
कोलोनी में सन्नाटा पसर गया ,आंटी की,उनके बच्चो की ,इतनी बड़ी जिम्मेदारियों की चिंता ने सब को व्यथित कर दिया।
१२-१५ दिन बाद जब आंटी वापस आयी ,तब पूरी बात पता चली। अंकल रसायन शास्त्र के प्रोफेसर थे। जब गैस फैली उन्हें उसकी सान्ध्रता का अंदाजा हो गया था। और उसकी मारक शक्ति का भी, पर उन्हें मालूम था की मुह-नाक पर गीला कपडा रखने से इससे बचा जा सकता है। इसलिए वे न सिर्फ उनके परिवार के लोगो को बल्कि हॉस्पिटल में भी और लोगो को मुह पर गीला कपडा रखने की सलाह देते रहे। और बोलने के लिए अपने मुह से गीला कपडा हटाते रहे,और गैस की चपेट में आने से उनकी मौत हो गयी।
इस आकस्मिक आघात से उबरने में आंटी को बहुत समय लगा ,गैस त्रासदी के मुआवजे के रूप में मिलाने वाली रकम उनके बेटों के भविष्य की राह बना सकती थी।
पर आंटी के मन में इस त्रासदी के जिम्मेदार लोगो के लिए जो गुस्सा था ,वह मुआवजे की रकम से ठंडा नहीं हो सकता था।
सालों -साल भोपाल गैस त्रासदी की खबरे पढ़ते रहे ,आन्दोलन होते रहे,दिलासे मिलते रहे ,
"कल मिलेगा न्याय"जब ये शीर्षक पढ़ा तो मन में एक आस बंधी अब आंटी चैन मिलेगा ,उनकी जिंदगी की खुशियाँ छीनने वाले को सजा मिलेगी.शायद और जिम्मेदार लोग इस सजा से सबक सीखेंगे ,और अपने काम के प्रति गंभीर होंगे।
२५ साल के इन्तेजार के बाद जो हाथ आया ,ऐसा लगा अगर ये फैसला आंटी के जाने के बाद आता तो शायद वो इंतजार में ही सही एक आस के सहारे जी तो लेती। इस फैसले के बाद उनके दिल पर क्या गुजारी होगी ......
अब मैं क्या बताऊ आपको........

Saturday, May 15, 2010

बोलिए....ये हमारे सरोकार हैं ..........

कितना पानी ढोलते है,मकान मालिक को तो पता ही नहीं,रोज़ रोज़ पाइप लगा कर नहाते है ,किससे कहे ,कैसे कहे? ये रोज़ ही महिला मंडली की चर्चा का विषय होता था.नयी बसी कालोनी में नित नए मकान बनते थे,जहा सामान की रखवाली के लिए चौकीदार होते थे,उन्हें टूबवेल चलने की आज़ादी होती थी और पानी बर्बाद करने की भी।
एक शाम जब ये चर्चा चल रही थी तभी मैं भी मंडली में शामिल हुई और पूछा माजरा क्या है,तब पता चला की सामने के मकान में रोज़ पानी की बर्बादी हो रही है। अपने अनुभव से ये तो जान ही लिया था कि पानी यदि बरसात के मौसम से ही सहेज कर नहीं रखा तो गर्मी में टूबवेल साथ नहीं देंगे।
दूसरे ही दिन शाम को २-३ लड़के पाइप चालू करके नहा रहे थे.पानी भरपूर बह रहा था। पानी बेकार बहता देख कर पारा चढ़ जाता है,और मुझे याद आ जाते है वो दिन जब मई-जून की गर्मी में सारा दिन बिना पानी पिए गुजारा करती थी .पैसे लेकर भी कोई पानी भरने को तैयार नहीं होता था..क्योंकि पानी का कोई स्त्रोत ही नहीं था।
बस पहुँच गयी वहा और उन लडको से कहा ,कितना पानी बहा रहे ?
बोले आंटीजी नहा रहे है।
ठीक है पर नहाने के लिए बाल्टी में भी तो पानी लिया जा सकता है ।
जी पर यहाँ पानी तो है न ।
हा पानी है पर इस तरह बहावोगे तो एक दिन ख़त्म हो जायेगा । तुम्हे मालूम है गाँवों में लोग कितनी मुश्किल से गुजारा करते है। तुम्हारे ही घर में औरते कितनी दूर से सर पर पानी ले कर आती है। किस गाँव के हो तुम लोग?
आंटीजी,निमाढ़ के।
तो तुम्हे नहीं मालूम वहा पानी की कितनी परेशानी है?
जी मालूम है।
फिर ?? फिर भी यहाँ मिल रहा है तो बेकार में बर्बाद कर रहे हो। अरे जीतनी जरूरत हो वापारो ,ज्यादा हो तो किसी जरूरतमंद को देदो,पर इस तरह बर्बाद तो मत करो।
जी आंटीजी,हम समझ गए ,हमने ये सोचा ही नहीं था,अबसे हम पानी बेकार नहीं धोलेंगे
टूब वेल तो कब से बंद हो गया था। उस दिन के बाद उन लडको ने कभी पानी बर्बाद नहीं किया।
मन को एक संतुष्टि मिली,पर कई प्रश्न भी उठ खड़े हुए ।
*जब लोगो ने देखा तो खुद उन लडको को ऐसा करने को मन क्यों नहीं किया?
*लोग सही बात कहने को बुरा बन्ने का खतरा क्यों समझते ?
*क्या यही बात मैं किसी पढ़े लिखे व्यक्ति को समझती तो वो भी इसे इतनी आसानी से समझ जाता?
तो जब भी आप अपने आस-पास कोई गलत kaam होते देखते है तो कुछ कहते क्यों नहीं? ये हमारा समाज है,हमारे सरोकार है इन्हें हमहें ही सुधारना है.और कई काम तो अक्सर अनजाने में होते है आप को बस एक बार बताना है ये ठीक नहीं है ,पर अधिकतर लोग इतनी भी जहमत नहीं उठाते,क्यों??????

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...