बहुत पहले इसी शीर्षक से एक कविता लिखी थी आज उसी कविता का दूसरा रूप प्रस्तुत कर रही हूँ http://kavita-verma.blogspot.in/2011/07/blog-post.html
लौटते ही घर
झांक आते थे हर कमरे ,
आँगन रसोई और छत पर
मेरी एक झलक पाने को ,
नज़रों से पुकारा करते थे मुझे
अपने पास आने को
जब धीरे से अटका देते थे
कली मोगरे की मेरे बालों में
जतन से पल्लू में छुपा कर उसे
में सराबोर हो जाती थी
तुम्हारे प्यार की खुशबू से
बस यूं ही देखा करते थे
मुझे संवरते हुए
मेरे हाथ से लेकर सिन्दूर दानी
भर देते थे सितारे मेरी मांग में
अंकित कर देते थे
तुम्हारे प्यार की मोहर
मेरे माथे पर
तुम अब भी वही हो
चाहते मुझे
अपने अंतस की गहराइयों से
और व्यावहारिक और जिम्मेदार
अपने प्यार के मजबूत
सुरक्षा चक्र से घेरे मुझे
लेकिन न जाने क्यों
मुझे याद आती है
तुम्हारी उँगलियों के पोरों की
वो हलकी सी छुअन
में याद करती हूँ
उन दिनों के तुम .