Monday, June 3, 2019

पोर्टब्लेयर डायरी 1

इंदौर से शाम छह बजे घर से चले तब तक बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि कैसी जगह होगी। अब तक कई समुद्र के किनारे जा चुके हैं इसलिए वैसे ही किसी जगह की छवि मन में थी। इंदौर का हवाई अड्डा जैसा कि न्यूज में पढते थे उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत और भव्य था। अभी कुछ दिन पहले ही एयर पोर्ट डायरेक्टर आर्यमा सान्याल जी से मुलाकात हुई थी और उनके व्यक्तित्व ने जितना प्रभावित किया था एयरपोर्ट ने उसमें इजाफा ही किया। शाम सात बजे पहली बार प्लेन में कदम रखा। इंडिगो की नीले सफेद रंग से सजी धजी फ्लाइट।
करीब डेढ़ घंटे में हम मुंबई पहुंचे और वहाँ इंतजार शुरू हुआ बिटिया का। लगभग आधे घंटे तक साफ सफाई बोर्डिंग चैक के बाद बिटिया फ्लाइट में आई और फिर तो यात्रा में जान आ गई।
रात लगभग साढ़े बारह बजे कोलकाता एयरपोर्ट पहुंचे और लगेज के इंतजार में खड़े हो गए। एक एक कर सभी का लगेज आ गया लेकिन हम खड़े ही रहे। तभी एक आदमी ने पूछा आपको आगे जाना है क्या तो आपका लगेज आगे के लिए बुक हो गया है वहीं मिलेगा। अब तक जोर से भूख लग आई थी। एयरपोर्ट से बाहर जाने पर फिर से सिक्यूरिटी चैक से गुजरना पड़ता इसलिए सोचा कि यहीं कुछ खा लेते हैं। कोलकाता एयरपोर्ट बहुत बड़ा और भव्य है। देखते देखते हम ऊपर फर्स्ट फ्लोर तक पहुंचे। कुछ फोटो लिये। फूड जोन बंद हो चुका था बस एक दो स्टाॅल टी जंक्शन और सीसीडी के खुले थे। वहाँ पेट भर खाने लायक विशेष कुछ नहीं था लेकिन भूख लगे तो जो मिले वही सही।
हालाँकि जिस तरह स्लीपर पहनने वाले के लिए हवाई यात्रा सुलभ बनाई गई है वैसे ही स्लीपर पहनने वाले के लिए खाने पीने के सामान के रेट भी सुगम होते तो ठीक था। अभी तो ये सूटबूट वालों के लिए भी विचारणीय लगे। कोलकाता एयरपोर्ट पर रात के समय भीड़ कम हो गई थी लेकिन एसी की ठंडक दिन की गर्मी और भीड़ भाड़ के अनुसार ही थी। अठ्ठारह डिग्री सेल्सियस से कम के तापमान पर चादर ओढ़ कर भी सारी रात ठिठुरते ही गुजरी। उस पर लगातार चलता म्यूजिक सोने कैसे देता। खैर हमारे यहाँ के अनुसार तो रात ही थी लेकिन सुदूर पूर्व में तो साढ़े चार बजे उजाला होने लगता है। सुबह साढ़े पाँच की फ्लाइट के लिए साढ़े चार बजे चेक इन की प्रक्रिया शुरू हो गई।
हल्के बदलाये उजाले में शुरू हुए सफर में ऊपर और नीचे दोनों तरफ बादल थे। बादलों के आर पार कुछ भी नहीं था फिर लगा कि बादलों की परछाई बन रही है नीचे पानी था। नहीं पानी नहीं समुद्र जो धुंधलाई रौशनी में बादलों सा ही दिख रहा था। अजीब सा सपनई नजारा था जिसमें बादल कहाँ शुरू हो कर कहाँ समुद्र से मिल रहे थे और समुद्र क्षितिज पर कहाँ बादलों पर सवार हो गया था पता ही नहीं चल रहा था। सात बजे बाद सूरज अपना उनींदा पन हटा कर आसमान के मैदान में डट कर खड़ा हुआ तब बादलों ने अपना साम्राज्य समेटा और धरती आसमान के बीच की सीमा रेखा स्पष्ट हुई लेकिन धरती पर तब तक समुद्र का साम्राज्य फैल चुका था। गहरा नीला समुद्र अपने गहन गंभीर स्वरूप में किनारे पर एक दो छोटी छोटी लहरें पहुँचा कर अपने होने का प्रमाण दे रहा था। दूर तक गहरे हरे पेड़ समुद्र की गंभीरता में सुर मिलाये खड़े थे और आसमान तक एक शांत सुंदर क्षेत्र के होने का संदेश पहुँचा रहे थे। आसमान से दिखने वाले इस नजारे ने आभास दे दिया था कि हमने जितना सोचा था उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत जगह पर हम पहुँच चुके हैं और अब उसे भरपूर अपने दिलो दिमाग में समाने के लिए खुद को तैयार कर रहे थे।
पोर्टब्लेयर का वीर सावरकर हवाईअड्डा अपनी छोटी सी नीली इमारत के साथ हमारा इस्तकबाल करने को तैयार था। एयरपोर्ट के बाहर हमारे नाम की तख्ती लिये ड्राइवर हमारा इंतजार कर रहा था।
कविता वर्मा 

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (05-06-2019) को "बोलता है जीवन" (चर्चा अंक- 3357) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    सभी मौमिन भाइयों को ईदुलफित्र की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुंदर यात्रा संस्मरण अभी तो रास्ता पार किया है आगे का विवरण दिजीये गा।

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  3. सुन्दर संस्मरण!!

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 05/06/2019 की बुलेटिन, " 5 जून - विश्व पर्यावरण दिवस - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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