Tuesday, July 5, 2016

विवेक पूर्ण उपयोग जरूरी है

विवेक पूर्ण उपयोग जरूरी है
सोशल नेटवर्क ने जिस तरह लोगों को जोड़ा है उन्हें मनोरंजन और जरूरी सूचनाओ से अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है वह न अनदेखी की जा सकती है न ही उसके महत्व को अस्वीकार किया जा सकता है।  फोन और फिर मोबाइल ने भी लोगों को जोड़ा लेकिन उसके साथ बड़े भारी बिल की चिंता भी जुडी रहती थी। लेकिन व्हाट्स एप ने इस चिंता को काफी हद तक कम किया है। लोग अपने परिवार के सदस्यों सहेलियों दोस्तों के ग्रुप बना कर आपसी बातें शेयर करते हैं जो सभी के बीच होती हैं। एकदम ड्राइंग रूम में बैठ कर होने वाली चर्चाओ जैसी बातें हंसी मजाक चुटकुले सभी कुछ तो होता है यहाँ। दोस्तों के ग्रुप में सूचनाओ का आदान प्रदान आसानी से होने लगा है तो स्टूडेंट्स अपने जरूरी डिस्कशन भी यहाँ कर लेते है आने जाने में टाइम बर्बाद किये बिना तो प्रोफेशनल्स अपनी कामकाजी उलझनें उपलब्धियाँ। साहित्य जगत में ब्लॉग के बाद व्हाट्स एप साहित्यिक गतिविधियों के लिए एक नया साइट बन गया है जिसमे साहित्यिक सामग्री पर लाइव चर्चा संभव हुई है। 
तकनीकि जब कुछ सुविधा देती है तो उस सुविधा के साथ कुछ सावधानियाँ रखने की जरूरत भी होती है। ये विडम्बना ही है कि हमारे यहाँ का प्रबुद्ध वर्ग भी ऐसी सावधानियों की ओर से बिलकुल लापरवाह होता है। 
मीना ने सहेलियों के ग्रुप पर आया सांप्रदायिक भड़काऊ मैसेज अपने फैमिली ग्रुप पर डाल दिया बिना ये सोचे की परिवार की बातों में ऐसे सांप्रदायिक मैसेज का क्या काम है? उस ग्रुप में बच्चे भी जुड़े थे उन्होंने भी उस मैसेज को बिना ठीक से पढ़े समझे अपने दोस्तों के ग्रुप पर फॉरवर्ड कर दिया। इसका क्या अौचित्य है ये जानने की या बताने की किसी ने जरूरत ही नहीं समझी। बस सब एक गलत सन्देश के वाहक बनते चले गए। किसी ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में नहीं सोचा। 
राधा के पास किसी लड़की के किडनैप होने का मैसेज आया उसने बिना सोचे समझे उसे अपनी सहेलियों के ग्रुप पर भेज दिया।  उसमे एक फोन नंबर भी दिया गया था। अब नंबर सच था या गलत लड़की को सही में किडनैप किया गया था या उसे बदनाम करने की कोई साजिश थी ये जानने की किसी ने जहमत नहीं उठाई। अगर वह सन्देश गलत था तो उस सन्देश और फोन नंबर की वजह से उस परिवार को कितनी मानसिक तकलीफ उठानी पड़ी होगी। अगर किसी का अपहरण हुआ है तो वह यूं खुले आम सड़कों पर तो नहीं घूम रहा होगा की किसी की नज़रों में आ जाये और पुलिस को खबर हो जाये। 
विनीता के पास एक मैसेज आया दूर किसी शहर में किसी को किसी खास ग्रुप के ब्लड की जरूरत है उसने उस मैसेज को अपने शहर की सहेलियों के ग्रुप पर डाल दिया बिना ये सोचे की यहाँ बैठ कर कोई कैसे इतनी दूर अस्पताल में पड़े व्यक्ति की मदद कर पायेगा? बस वह मैसेज ऐसे ही एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप तक घूमता रहा बिना किसी विचार या ठोस कार्यवाही के।  
धार्मिक राजनैतिक अन्धविश्वास युक्त मैसेज यहाँ तेज़ी से फैलते हैं जिसमे खुद की कोई खास विचारधारा नहीं होती बस हमारे पास आये हैं इसलिए हमें इन्हे आगे भेजना है यही सोच होती है। कई सन्देश तो इस धमकी के साथ आते हैं कि अगर इसे आगे नहीं भेजा तो आपका कोई अहित होगा। क्या हम मन से इतने कमजोर हैं कि कोई सन्देश हमारा हिट अहित कर सके ? लेकिन बस एक सोच रहती है भेज दो भेजने में क्या जाता है ? ऐसी चीज़े धीरे धीरे हमें धर्म भीरु दब्बू बनाती हैं। 
दुःख और अचरज तो तब होता है जब महिलाओ पर बने जोक्स सबसे ज्यादा महिलाये ही एक दूसरे को भेजती हैं। चलिए हँसने के लिए इन्हे भेजा जाता है और कोई इन्हे गंभीरता से नहीं लेता वहाँ तक तो ठीक है लेकिन कई सन्देश तो इतने अपमान जनक होते हैं कि उन्हें पढ़ कर भेजने वाले की अक्ल पर तरस आता है। 
कभी सोचा है कि क्या आपके ग्रुप के सभी मेंबर्स इन्हे पढ़ते भी हैं ? कभी ध्यान दीजिये एक ही ग्रुप पर एक ही मैसेज कई कई बार भेजा जाता है। किसी ने भेजा आपने नहीं पढ़ा आपने भेजा किसी और ने नहीं पढ़ा लेकिन फिर भी मोबाइल हमेशा हाथ में होता है हर दो मिनिट में चेक किया जाता है कोई नया मैसेज आया क्या ? 
एक और ट्रेंड है सुबह होते ही गुड मॉर्निंग करते फोटो भेजने का  अगर आप दो चार ग्रुप के मेंबर हैं तो समझ लीजिये सुबह सुबह आपके मोबाइल में ४० / ५० फोटो आ जायेंगे अब जब भी फुर्सत मिले उन्हें डाउन लोड करिये फिर डिलीट करिये बिना हिसाब लगाये की इसमे आपका कितना समय और नेट वाउचर का पैसा जाया होता चला जाता है। घर के लोगों के साथ सुबह बिना गुड मॉर्निंग बोले हो सकती है लेकिन समूह पर आप नज़र अंदाज हो जाएगी अगर आपने फूलों के गुलदस्ते या राधा कृष्ण साईं बाबा के फोटो नहीं भेजे। 
धार्मिक फोटो से साथ ही कर्मकांड फ़ैलाने का काम भी इन दिनों खूब हो रहा है। साईं बाबा का दुग्ध स्नान करता फोटो लाखों चूड़ियों से सुसज्जित देवी का चित्र और ऐसे ही कई। समझ नहीं आता जिन साईं बाबा ने फकीरी में जीवन जिया वे इस तरह दूध स्नान से कैसे प्रसन्न होंगे। लेकिन उनके भक्तों के पास इतना सोचने का समय ही कहाँ है वे तो बस अंध श्रद्धा वश फोट मैसेज आगे बढ़ाते जा रहे हैं। 
किसी सोशल या पर्सनल इवेंट के समय तो पढ़े लिखे प्रबुद्ध कहे जाने वाले लोग भी ऐसे मैसेज भेजते हैं कि उनके पढ़े लिखे होने पर शक होने लगता है। फिर चाहे विराट कोहली के आउट होने पर अनुष्का को पनौती कहने वाले मैसेज हों या शाहिद की शादी कम उम्र मीरा से होने और इसे करीना से बदला करार देने वाले मैसेज हों लोगों के दिमागी दिवालियेपन पर अफ़सोस होता है और ऐसे सन्देश ऐसी पढ़ी लिखी महिलाये भी आगे बढाती हैं जो स्वयं को सामाजिक सरोकारों की पुरोधा समझती हैं। 
नेपाल में भूकंप के दौरान वहाँ के कई फोटो तेज़ी से फैले जिनमे कई वहाँ बिखरी लाशों के बिलखते औरतों और बच्चों के थे तो कई संदेश अगले भूकंप के झटकों के बारे में। जबकि भूकंप की पूर्व चेतावनी नहीं की जा सकती है।  ऐसे संदेशों से वहाँ फंसे लोगों में बेवजह घबराहट फैली खाने पीने की  वस्तुओं के दाम अचानक कई गुना बढ़ गए और संदेश करने वाले अपने इस असामाजिक कृत्य से बेपरवाह ही रहे। 

 इस माध्यम से जानकारी युक्त सन्देश भी भेजे जाते हैं लेकिन उन संदेशों की प्रमाणिकता की जाँच कोई नहीं करता।  आयुर्वेदिक नुस्खों की तो भरमार है यहाँ। आप किसी तकलीफ का जिक्र भर करिये और देखिये फटा फट दो चार उपाय बता दिए जायेंगे। इन पर विश्वास उतना ही होता है जितना ये उपाय बताने वाले पर आपका विश्वास है। उपाय काम कर गया तो ठीक नहीं किया तो कौन सा आपने फीस दी है बल्कि कुछ समय बाद तो ये भी भूल जायेंगे कि ये उपाय बताया किसने था आखिर तो ग्रुप में बहुत सारे लोग हैं। 

हाँ जो लोग नए नए इस माध्यम से जुड़ते हैं उन्हें तो आने वाले हर सन्देश नए लगते हैं उनकी सक्रियता से तो डर ही लगता है। मजे की बात ये है कि कई सन्देश इस टैग लाइन के साथ होते हैं कि मार्केट में नया है जल्दी आगे भेजो। ये एक तरह का मानसिक प्रभाव पैदा करता है खुद की पीठ थपथपाने को प्रोत्साहित करता है कि हमने इतना बढ़िया मैसेज सबसे पहले भेजा और फिर बार बार चेक करते हैं कि कितने लोगों ने इसे पढ़ा या इस पर वाह वाह की कितनी तालियाँ बजीं और कितने लाइक्स आये। देखा जाये तो ये बाजार वाद में आपको पूरी तरह जकड़ने का तरीका होता है जिसमे आप फंसते जाते हैं। अपना बहुमूल्य समय इस पर जाया करते हैं और अपने जरूरी काम या शौक का समय इस पर बर्बाद कर बैठते हैं और इन सबका अफ़सोस हावी होता जाता है। 
ऐसा नहीं है कि इसे बिलकुल बंद ही कर दिया जाना चाहिये। आपा धापी की इस जिंदगी में दोस्तों घर परिवार वालों के संपर्क में रहने का ये बहुत अच्छा साधन है बस जरूरत है इसके सदुपयोग की। 
* अपने व्हाट्स ऍप के समय को समूह के सभी साथियों की सहमति से सीमित करिये।  तय करिये ऐसा समय जब अधिकतर लोग फुर्सत में हो कर इस पर बात कर सकें। बाकि समय या तो इसे बंद करिये या अपने मन को कड़ा करिये कि आप बार बार मैसेज चेक नहीं करेंगी। 
* समूह में सबकी रूचि किस मे है ये तय करिये फोटो विडिओ चुटकुले या आपसी बातचीत उसके अनुसार समय सारिणी बनाइये। हफ्ते में एक दिन निश्चित समय पर सब चैट करेंगे ऐसा कुछ तय करिये ताकि आप अपनों से जुड़े रह सकें उनके हालचाल पता हों। 
* अपने समूह के नियम बनाइये जिसमे अश्लील सांप्रदायिक सामग्री महिलाओं के बारे में फूहड़ जोक्स जैसी सामग्री शेयर ना की जाये।  परिवार और दोस्तों के मन में महिलाओं के प्रति सम्मान भाव पैदा करना हम महिलाओं की ही जिम्मेदारी है। 
* व्यक्ति विशेष को निशाना बना कर होने वाली टिप्पणियों से बचिये।  
* सुनिश्चित करिये हफ्ते में कम से कम एक दिन कुछ रोचक ज्ञानवर्धक सामग्री साझा की जाएगी जिससे सभी लाभान्वित होंगे। उस पर चर्चा की जा सकती है। 

तकनीकि एक सुविधा हमें प्रदान करती है लेकिन उस सुविधा का विवेक पूर्ण उपयोग हमें ही सुनिश्चित करना है। 
व्हाट्स एप पर किसी भी तरह के धार्मिक राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था को आहत करने वाले संदेश गंदे चित्र या वीडियो नहीं पोस्ट करें। 
किसी वर्ग संप्रदाय भौगोलिक क्षेत्र विशेष से संबंधित किसी भी प्रकार के भड़काऊ बहकाने वाले संदेश पोस्ट ना करें।  

क्या आप जानते हैं व्हाट्स एप विश्व की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है। 
व्हाट्स एप की कीमत जमैका , आइसलैंड उत्तरी कोरिया की जी डी पी से ज्यादा है। 
लगभग पचास करोड़ लोग व्हाट्स एप का उपयोग करते हैं। 
व्हाट्स एप में लगभग 55 कर्मचारी हैं जो सभी अरबपति हैं। 
हर रोज़ लगभग दस लाख लोग इससे जुड़ते हैं। 
लगभग पाँच करोड़ फोटो इस पर शेयर किये जाते हैं। 
इस कंपनी की कीमत नासा के साल भर के बजट जो लगभग १७ अरब डॉलर है उससे ज्यादा है। 

इस सबमे हम आप बिना सोचे समझे अपना समय और पैसा लगा रहे हैं जो हमारे किसी काम नहीं आ रहा है।  ये पैसा बाहर जा रहा है टेलीकॉम कम्पियों की जेब में जा रहा है और हम खुश हैं कि हम कितने सक्रिय हैं।  जरा रुकिए और सोचिये ये कितना जायज है।  

कविता वर्मा 

Tuesday, June 7, 2016

एक सार्थक दिन


समाज सेवा प्रकोष्ठ का तीन दिवसीय बाल व्यक्तित्व विकास शिविर देवास जिले के गंधर्व पुरी में लगा। आज दूसरा दिन था और मुझे बच्चों को कहानियों के माध्यम से साहित्य और शिक्षा से जोड़ना था। सुबह लगभग आठ बजे हम इंदौर से चले। गाँव की ही एक अधबनी धर्मशाला में शिविर लग रहा था। साफ सुथरी बिसात बिछी थी पंखे चल रहे थे जो गर्मी से राहत देने की भरसक कोशिश में लगे थे। 
इसके पहले एक शिविर में मैंने कहानियाँ सुनाई थीं पर वहाँ छोटे बच्चे थे यहाँ सभी उम्र के बच्चे थे आठ नौ साल से लेकर सत्रह अठारह साल तक के।  स्वाभाविक है अब कंटेंट में बदलाव करना जरूरी था।  कुछ देर बच्चों की गतिविधियों को देखते मैंने एक दिशा निर्धारित की। 





सामान्य बात चीत से शुरू हुई गोष्ठी बच्चों के ज्ञान पढ़ने की आदत और इंटरनेट के उपयोग तक पहुंची। इंटरनेट पर उपलब्ध ज्ञान और कथा कहानियों में उपलब्ध ज्ञान के अंतर को बताते हुए कहानियों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण सोच और नज़रिए का विकास भाषा बोली का विकास जैसी बातें बच्चों को बताई। 
एक बात उभर कर आई कि ग्रामीण बच्चों में पढ़ने की आदत बिलकुल नहीं है ना ही उनके पास किताबें हैं और ना ही कोई प्रेरणा।  स्कूल में लाइब्रेरी है यह बात भी कई बच्चों को नहीं पता। जिन्हे पता है उन्होंने भी कभी वहाँ से पढ़ने के लिए पुस्तकें नहीं ली। अखबार पढ़ने की आदत भी बिलकुल नहीं है। हाँ कुछ बड़े बच्चे जो इंटरनेट का उपयोग करते हैं वे भी वहाँ से सिर्फ गाने डाउन लोड करते हैं या शायद कुछ ऐसी साइट्स देखते हैं जो वे बता नहीं सकते थे या व्हाट्स ऐप या फेस बुक चलाते हैं। यहाँ तक की बच्चों को नए फ़िल्मी गानों के अलावा पुराने फ़िल्मी या जनगीत भी नहीं पता। 

गाँव में हर घर पक्का है सड़के पक्की है बच्चों का रहन सहन पहरावा भी साफ सुथरा और व्यवस्थित दिखा।  ऊपरी तौर पर देखा जाए तो बहुत तरक्की दिखी लेकिन वैचारिक बौद्धिक तरक्की में कहीं बहुत पीछे छूट गए। ऐसा लगा कि इन बच्चों के साथ बैठ कर बेतकल्लुफी से बात करने की बहुत जरूरत है। कई ऐसी बाते हैं जिन्हे बताया जाना चाहिए कई ऐसे प्रश्न हैं जिन्हे सुलझाया जाना चाहिए। उनको दिशा देने की बहुत जरूरत है। 
एक और बात जो उभर कर आई बच्चे चाहे जिस भी उम्र के हों कहानियाँ बड़े ध्यान से सुनते हैं और उनमे निहित संदेशों को भी बखूबी समझ लेते हैं जो हम उन्हें देना चाहते हैं। गंधर्व पुरी एक ऐतिहासिक स्थल है यहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर है। मंदिर से कई पुरानी मूर्तियाँ निकली हैं जिनमे से कई तो वहीं रखी हैं तो करीब ढाई तीन सौ मूर्तियाँ पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में रखी हैं।  यहाँ घर बनाने के लिए नींव की खुदाई करने पर भी मूर्तियाँ निकलती हैं।  
चिलचिलाती धूप में 44 डिग्री टेम्प्रेचर में मंदिर संग्रहालय घूमकर रास्ते में भोजन करते हुए लगभग चार बजे घर पहुंचे। एक सार्थक दिन रहा जिसने बहुत कुछ सिखाया और बहुत कुछ सिखाने को प्रेरित किया।  
कविता वर्मा 

Friday, June 3, 2016

आसान राह की मुश्किल

गरीब के लिये पड़ाव क्या और मंजिल क्या ? रास्ता आसान क्या और कठिन क्या ? उसे तो जब तक सांस है तब तक चलते जाना है अपनी मजबूरियों के साथ। इसी रास्ते में कहीं आम की छाँव मिल जाये तो सुस्ता लिए और कभी केरी सी कोई ख़ुशी मिल जाये तो उसे चुन ले। रोड़े काँटे पत्थर तो वहाँ भी मिलते हैं तब अफ़सोस भी होता है कि काश आसान राह चुनी होती पर जब सुस्ता कर आगे बढ़ते हैं तो लगता है थोड़ा कठिन सही पर इस रास्ते की कोई मंजिल तो है।

http://matrubharti.com/book/4470/

Thursday, May 19, 2016

उपन्यास काँच के शामियाने (समीक्षा )


रश्मि रविजा का उपन्यास काँच के शामियाने जब मिला थोड़ी व्यस्तता थी तो कुछ गर्मी के अलसाए दिन।  कुछ उपन्यास की मोटाई देखकर शुरू करने की हिम्मत नहीं हुई।  फेसबुक और व्हाट्स अप के दौर में इतना पढ़ने की आदत जो छूट गई। 

दो एक दिन बाद पुस्तक को हाथ में रखे यूं ही उलटते  पुलटते पढ़ना शुरू किया। सबसे ज्यादा आकृष्ट किया प्रथम अध्याय के शीर्षक ने 'झील में तब्दील होती वो चंचल पहाड़ी नदी ' वाह जीवन के परिवर्तन को वर्णित करने का इससे ज्यादा खूबसूरत तरीका क्या हो सकता था / फिर जो पढ़ना शुरू किया तो झील के गर्भ में बहती धार सी कहानी में उतरती चली गई। बस वह कहानी अब कहानी नहीं रह गई थी वह शब्द चित्रों में बदलती किसी रील सी चलती चली जा रही थी। जिसमे सब विलीन हो गया आलस पृष्ठ अध्याय अतन्मयता सब।  रह गई तो सिर्फ जया उसकी पीड़ा उसका संघर्ष उसकी जिजीविषा। 

एक समय ऐसा भी आया जब मन में आक्रोश पूरे उफान पर था राजीव के लिए नहीं जया के लिए उसकी माँ भाई भाभी बहनों के लिए। रिश्तों के सतहीपन , मजबूरी की आड़ में कायरता जिम्मेदारी से भागने की कोशिश यही तो वास्तविकता है अधिकांश रिश्तों की जिनके लिए जीते मरते उनका मान रखते जिंदगी गुजार दी जाती है।  राजीव और उसके परिवार के लिए तो घृणा थी वितृष्णा थी और ढेरों बद्दुआएँ थीं।  इनके साथ भारतीय परिवारों का कड़वा बदबूदार सच भी था।  पुरुषों की विकृत मानसिकता के पालन पोषण का घृणित दायित्व परिवार वाले ही निभाते हैं फिर भले वह उनके लिए ही मुसीबत बन जाये।  धन लोलुपता सोचने समझने की शक्ति छीन लेती है तो ईर्ष्या असुरक्षा सही गलत की पहचान। 

स्त्री के लिए सभी रिश्ते काँच के शामियाने ही साबित होते हैं जो उसे जीवन की कड़ी धूप से कतई नहीं बचाते और इस धूप में तप निखर कर वह कुंदन बन जाती है लेकिन कितनी स्त्रियाँ यह बड़ा प्रश्न है।

अलबत्ता जीवन की कड़वी हकीकतों को बारीकी से बुना गया है।  हर पात्र अपनी अच्छाई निकृष्टता मजबूरी कायरता कुटिलता के साथ पूरी शिद्दत से अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है और खुद के लिए प्यार घृणा दया आक्रोश उत्पन्न कराने में पूरी तरह सक्षम है। यह उपन्यास तीव्रता से इस बात को बल देता है कि भारतीय परिवारों में बच्चों खासकर लड़कों की परवरिश को गंभीरता से देखने सुधारने की जरूरत है तो लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ साथ आत्म सम्मान से जीना सिखाने की। 

रश्मि जी ने इस उपन्यास में ढेर सारे प्रश्न खड़े किये है जिसके जवाब समाज को ढूंढना है और ये उपन्यास सोच को समाधान ढूंढने की दिशा में मोड़ने में सक्षम है। 

रश्मि जी को इस उपन्यास के लिए बहुत बहुत बधाई आप यूँ ही लिखती रहें समाज को नई सोच के साँचे में ढालने के लिए। आपके यशस्वी लेखन के लिए मेरी शुभकामनाये। 

कविता वर्मा 

काँच के शामियाने 
लेखिका रश्मि रविजा 
हिन्द युग्म प्रकाशन 
मूल्य 140 रुपये 

Wednesday, April 27, 2016

'बन रही है नई दुनिया ' ( पुस्तक समीक्षा )



अमरजीत कौंके का कविता संग्रह 'बन रही है नई दुनिया ' कुछ दिनों पहले ही मिला जिसे व्यस्तता के चलते पढ़ नहीं पाई पर जब एक बार पढ़ने बैठी तो छोड़ते ही नहीं बना।  संग्रह की पहली आकर्षित करने वाली पंक्ति  ' मुहब्बत के उस एहसास के लिए जो जीवन की स्याह अँधेरी रातों में किसी जुगनू की तरह टिमटिमाता है ' इतनी रोचक और भावपूर्ण है कि आप उसके भीने एहसास में डूबते चले जाते हैं। 

शुरूआती कविताओं में ही अमरजीत जी की विराट सोच विराट ह्रदय की झलक मिल जाती है।  उनकी कवितायेँ अपने प्रेम को धरती पहाड़ नदी जंगल से परे सूरज चाँद से लेकर अंतरिक्ष ब्रम्हांड तक ले जाती है और प्रेम को उसकी विशालता में महसूस करती हैं।  

अपने आसपास के परिवेश को कवि ने शिद्दत से महसूस किया और जिया है फिर चाहे वह बस का सफर हो वैक्यूम क्लीनर से घर की सफाई , चादर की धुलाई पत्थर पक्षी या तितली।  कवि की कलम हर विषय पर पूरे अधिकार से चली है और उन्हें सार्थक अर्थ प्रदान करती है। 

बानगी देखिये , कहता हूँ खींच लो / वैक्यूम क्लीनर के साथ / मेरे दिमाग में फंसी/ यादों की मकड़ियाँ / बुनती रहती हैं जाले हमेशा / उलझा रहता है मन। 

गरीब मजदूर हालात के मारे इंसानों का सूक्ष्म निरिक्षण करती कई कवितायेँ कवि की गहन संवेदनशील दृष्टी का परिचय देती हैं। अस्पताल, नई दुनिया के आलीशान निर्माण , महल दुमहलों में होने वाले वर्ग विशेष के कार्यकलाप कवि की वक्र दृष्टी से बच नहीं सके हैं। 

प्रेम के सतहीपन या सम्पूर्ण  की ललक को व्यक्त करती खूबसूरत कविता है 'अनछुए होंठ ' जो दो जिस्मों के संबंधों के अनदेखे अनछुए अधूरेपन को व्यक्त करती है।  

धर्म के नाम पर फैली अराजकता दंगे आगजनी से आम आदमी मजदूर वर्ग औरतें बुजुर्ग बच्चे किस तरह शिकार होते सहम जाते हैं और इन सबके पीछे बड़ी ताकतें किस तरह अपनी सफलता पर अट्टहास करते हैं ये कविताओं में तीखे तेवर के साथ मौजूद है। 

इंसान के अंदर छुपा हैवान जंगली जानवर जो समय समय पर मुखौटा उतार अपने असली रूप में आ जाता है और मानवता को शर्मसार करता है।  इस मुखौटे वाले इंसान से व्यथित कवि ने अपनी पीड़ा भावुक शब्दों में उंडेली है। 

मानव की विनाश लीला आतंकवाद से निरीह पशु पक्षी जीव जंतु किस तरह प्रभावित होते हैं इसे महसूस करने वाला कोमल मन उनकी स्थिति को देखता महसूसता और शब्दों में उतरता है। 

कविताओं में एक भावुक प्रेमी के दर्शन होते हैं जो अपने सहचर के मोह में जीने को आतुर है उसके मन मरुस्थल में प्रेम के पुष्प उग आये हैं। 
बानगी देखिये 
मोह की कुछेक बूंदे क्या गिरीं / कि मेरे कण कण में / फिर प्यास जग गई / जीने की प्यास/ अपने भीतर से/ कुछ उगाने की प्यास। 

लेकिन कवि यथार्थ से मुँह नहीं मोड़ता वह जानता है भावुक प्रेमी का प्रेम छिन जाने पर भी जीवन गति नहीं थमती बस एक 'दाग ' रह जाता है। 
काश मुझे पकड़ने का नहीं/ त्यागने का ढंग आता/ इस तरह ही शायद / मैं तुम्हारी याद को / छल पाता। 

कहीं कहीं किसी कालखण्ड में नैराश्य भाव भी उपजा है जिसमे प्रेम से बिछड़े टूटे मन के दर्शन होते हैं। 

कुछ नहीं होगा ', ' क्यों लगता है ', 'तुमने तो ' स्त्री पुरुष मन की मजबूत थाह है। इन  कविताओं  की हर पंक्ति मन पर अपना अक्स छोड़ जाती है। प्रेम के उतार चढाव विश्वास अविश्वास को व्यक्त करती ये कविताएं अथाह प्रेम में अविश्वास की लहरों के थपेड़ों से मन को हिला देती हैं। 
बानगी देखिये 
उसकी आँखों में / उन युद्धों की तस्वीर झलकती थी / वहाँ मेरा अक्स तो / कहीं भी नहीं था। 

लेकिन / कभी महसूस करके देखना / कि सब कुछ होने के बावजूद / कुछ नहीं होगा हमारे पास / अपने सच्चे दिनों की/ मोहब्बत जैसा। 

मैं कहता / दिन तारीखों की/ याद तुम्हीं रख लो / मेरे भीतर तो बस / मिलन के उन पलों का / एहसास ही / महकता रहने दो।  

कुछ कविताएं काफी लम्बी हैं जिन्हे खण्डों में बाँटा गया है जिससे भाव भिन्नता की पहचान आसान हुई है।  पढ़ते हुए जब आप रुक कर इसे महसूसते हैं तो ये खण्ड आपकी मदद करते हैं। पूरा संग्रह अपने आसपास की इतनी बातों को समेटे हुए है कि अमरजीत जी की संवेदन शीलता पर हैरानी होती है। कविताओं में कहीं कहीं आंचलिक शब्द माटी की सोंधी गंध से दिल दिमाग में समा जाते हैं।

इस पर भी कवि आपको निर्णय का हक़ देता है कि उनकी कविताओं का मूल्यांकन किया जाये और उनकी सार्थकता होने पर ही उन्हें संचित किया जाये। ये आत्मविश्वास कितने कवियों में होता है।  कुल मिला कर अमरजीत कौंके जी का ये कविता संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है। 

कविता वर्मा 
बन रही है नई दुनिया 
बोधि प्रकाशन जयपुर 
मूल्य 100 रुपये 







Wednesday, March 9, 2016

क्या सच में है समानता

क्या सच में है समानता


पिछले चार पाँच दिन से लगभग रोज़ ही महिला दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रमों में जाना हो रहा है।  किसी होटल के ए सी हॉल में बढ़िया चाय नाश्ते के साथ सशक्त महिलाएं महिला सशक्तिकरण की बातें कर रही हैं।  हालाँकि कुछ वक्ताओं ने कुछ नए विचार भी दिए जिनसे निश्चित ही नया नजरिया विकसित हुआ। हर कार्यक्रम के साथ एक कसक भी रही कि ऐसे विचार उन महिलाओं तक पहुँचना चाहिए जो अभी भी आगे आने की हिम्मत नहीं जुटा पाई हैं वे इनसे प्रेरणा ले सकती हैं।  

आज बेटी से बात हुई उसने बताया उसकी कंपनी में सभी महिला कर्मचारियों (अधिकांश लड़कियाँ हैं ) की एक मीटिंग बुलाई गई थी और उनसे अपने साथ होने वाले व्यवहार के बारे में बोलने को कहा गया। प्रोग्राम का थीम था pledge for  parity समानता की शपथ।  अधिकांश लड़कियों ने अपने परिवार में उन्हें मिले सहयोग और समानता की बात कही कुछ ने अपने संघर्ष की बात भी बताई पर कंपनी में होने वाले भेदभाव की बात किसी ने नहीं की।  जब मेरी बेटी के बोलने की बारी आई तब उसने कुछ यूँ कहा।  

* सर अभी सभी ने घर में मिले सपोर्ट समानता की बात कही लेकिन कंपनी में होने वाले भेदभाव के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा।  मैं बताना चाहती हूँ की प्लांट में हमें इंजीनियर नहीं बल्कि लड़कियाँ समझा जाता है।  जब भी किसी सीनियर का फ़ोन आता है और  हम फ़ोन उठाते है सबसे पहले पूछा जाता है कोई मेल इंजीनियर है क्या वहाँ उससे बात करवाइये।  अगर वहाँ मेल इंजीनियर न हो तो फ़ोन रख दिया जाता है हमसे बात नहीं की जाती।  मुझे कंपनी ने इंजीनियर के रूप में अपॉइंट किया है किसी लड़की के रूप में नहीं। 

* जब शॉप फ्लोर पर काम करना होता है तो हमारे कलीग इंजीनियर हमें मना करते हैं कि तुम लड़की हो तुम रहने दो।  क्यों रहने दो लड़की होने से क्या फर्क पड़ता है  मैं यहाँ काम करने और सीखने आई हूँ लड़की होने के कारण मुझे मौके नहीं दिए जाते ये मुझे मंजूर नहीं है।  

* कंपनी की पॉलिसी है कि लड़कियों को नाइट शिफ्ट नहीं दी जाती हम तो नाइट शिफ्ट में भी पूरा काम कर सकते हैं पर इस वजह से हमें हमारे डे शिफ्ट में किये गए काम को कम करके आँका जाता है। 

* एक भ्रम ये भी है कि लड़कियों को ज्यादा सहानुभूति मिलती है उन्हें जब चाहे छुट्टी दे दी जाती है पर ऐसा नहीं है हम भी अपने ब्रेकिंग पॉइंट तक काम करते हैं प्लांट में मेन पावर की कमी को देखते हुए छुट्टी लेना टालते हैं वो कोई नोटिस नहीं करता।इन सब के बाद भी हमारी हेल्थ सबसे ऊपर है और जब हमें आराम की जरूरत होगी हम छुट्टी लेंगे। 

*हमसे यहाँ लड़कियों वाले काम करवाये जाते हैं।  अगर मैं शिफ्ट में नहीं हूँ और किसी को कोई रजिस्टर या कोई टूल चाहिए तो वह खुद ढूंढने के बजाय फ़ोन करके पूछता है फलानि चीज़ कहाँ रखी है ? ऑफिस में दो अलमारियाँ हैं जिसमे सारा सामान होता है लडके खुद से नहीं निकाल सकते ? जब मेरा ऑफ है या मैं ड्यूटी पर नहीं हूँ तब सामान का पता बताने के लिए मुझे डिस्टर्ब क्यों किया जाता है ? मैं यहाँ इंजीनियर हूँ इन लड़कों की माँ नहीं जो हर चीज़ उन्हें हाथ में दूँ। 

* सर मैं यही कहना चाहती हूँ की हमें अपने घर परिवार में समानता का माहौल मिला है।  हमारे परिवार को पता है हम सब कर सकते हैं हमें भी पता है हम सब कर सकते हैं लड़कों के बराबर और उनसे ज्यादा ही कर सकते हैं पर ये बात लड़कों को नहीं पता है।  आप ये महिला दिवस और pledge of parity उनके साथ मनाइये।  उन्हें बताइये की हम लड़कियाँ नहीं उन्ही के सामान इंजीनियर हैं। 

* सर इसी माहौल के कारण इस कंपनी में महिलाएं टॉप पर नहीं पहुँच पाती। 
इस पर सीनियर अधिकारी बोले क्यों क्यों हमारे बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में एक महिला हैं वो वहाँ तक पहुंची है तो तुम लोग भी पहुँच सकते हो। 
मेरी बेटी ने कहा सर सिर्फ एक महिला बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में है क्योंकि वह सरकार की पालिसी है की वहाँ एक महिला का होना जरूरी है।  इस बात पर सन्नाटा खिंच गया।  

* इसके बाद एक सीनियर ने मेरी बेटी से पूछा तुम कुछ भी कहने से डरती नहीं हो ना ? उसने जवाब दिया नहीं सर मेरी मम्मी ने मुझे सिखाया है जो गलत है उसे बोलो अगर नहीं बोलोगी तो लोग हमेशा तुम्हे दबाएंगे।  इसलिए मैं खुल कर बोलती हूँ और किसी से नहीं डरती। 

उसके बोलने के बाद एक और लड़की में हिम्मत आ गई और उसने कहा सर दो घंटे में ये मीटिंग ख़त्म हो जाएगी उसके बाद सब कुछ फिर वैसा ही होगा जैसा होता आया है आज इस मीटिंग से कुछ नहीं बदलने वाला है।  

ये है बड़ी बड़ी इंटरनेशनल कंपनी में लड़कियों की आज की स्थिति लेकिन कुछ साहसी लड़कियां pledge of parity के लिए बोल रही हैं खुल कर सामने आ रही हैं और सही मायने में महिला दिवस मना भी रही हैं और लोगों को मनाना सीखा भी रही हैं।  
मुझे गर्व है मेरी बेटी और उस जैसी सभी बेटियों पर।  
कविता वर्मा 








Monday, February 1, 2016

तेरे मेरे बीच में

पिछले कुछ दिनों में महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश को लेकर फिर बवाल मचा। रूढ़िवादी इसे धर्म और धार्मिक आस्था पर प्रहार मान रहे है तो प्रगतिशील इसे बदलाव का शुभ संकेत। इस बहस से एक बार फिर स्त्री पुरुष समानता की चर्चा जोरों पर है वहीँ स्त्रियों के अधिकारों की पुनः पड़ताल की जा रही है।  एक मौका था केरल के सबरीमला तीर्थ में महिलाओं के मासिक में होने का पता लगाने वाली मशीन लगाने का फैसला या शिंगणापुर में एक महिला भक्त का शनि चबूतरे पर चढ़ तेल चढाने की घटना।  इसके बाद तो पूरे देश में मानों हड़कंप ही मच गया और महिला संगठनों सहित समाज के विभिन्न वर्गों में इस प्रतिबन्ध के अौचित्य और सही गलत को लेकर एक बहस शुरू हो गई। 

समानता की अवधारणा में असमानता 
वैसे तो सबरीमला ऐसा मंदिर है जहाँ हर जाति धर्म और आस्था के लोग प्रवेश कर सकते है।  ब्राह्मण और दलित बिना किसी भेदभाव के दर्शन कर सकते हैं पर इस मंदिर में बारह से पचास वर्ष की उम्र की महिलाओं का प्रवेश वर्जित है यानि जीवन का वह काल जब स्त्री एक प्राकृतिक चक्र के द्वारा मासिक धर्म से होती है। कहीं कोई महिला या बच्ची जो इस उम्र से पहले या बाद में इस अवस्था में तो नहीं है इसका पता लगाने के लिए वहाँ एक मशीन लगाने का निर्णय लिया गया था जिसका पुरजोर विरोध हुआ।  इसके खिलाफ कोर्ट में केस दायर किया गया जिसका निर्णय आना शेष है।  साथ ही उस निर्णय वो चाहे जो भी हो उस पर देश की क्या प्रतिक्रिया होगी ये भी जानना भी दिलचस्प होगा। 

छुपा है पुरुषों का डर 
स्त्री के मासिक चक्र उससे उत्पन्न असहजता और दर्द से पुरुष वर्ग हमेशा चकित और भ्रमित रहा है। साथ ही स्त्री की गर्भधारण और संतानोत्पत्ति की क्षमता को पुरुष एक चमत्कारिक शक्ति के रूप में देखता आया है।  एक ऐसी शक्ति जो शारीरिक रूप से स्त्री से ज्यादा शक्तिशाली होने के बावजूद भी पुरुष के पास नहीं है। वह कहीं न कहीं खुद को स्त्री से हीन पाता है। ये जानते हुए भी कि इस चमत्कार में उसका भी योगदान है पर वह प्रत्यक्ष नहीं है और अपनी संतति के लिए पुरुष को स्त्री पर निर्भर रहना ही पड़ता है।  इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव ये रहा कि वह स्त्री की इसी शक्ति को उसकी कमजोरी करार देने को उद्धत हुआ। एक डर की कहीं स्त्री उससे अधिक शक्तिशाली न हो जाये उसकी संप्रभुता को स्वीकार न करना पड़े इसलिए पुरुष वर्ग ने मासिक धर्म को स्त्री की अपवित्रता से जोड़ा। उसे उन दिनों में कमजोरी अधिक आराम जैसे भुलावे में रख कर दैनंदिन कार्यों से अलग रखा। पूजा पाठ धर्म कर्म के लिए अनुपयुक्त बता कर उस पर मानसिक वार किया जिससे वह स्त्री  महीने के कुछ दिन स्वयं को कमजोर और अपवित्र मान कर पुरुष की हर आज्ञा सर माथे पर ले ले।  
मासिक धर्म से जुडी भ्रान्तिया और वर्जनाएँ  इसी का परिणाम है जो पुरुष समाज से होते हुए स्त्री समाज तक इस तरह फ़ैल गए कि अब वे सभी भ्रांतियां मानों स्त्रियों की ही धरोहर हो गई। 

शक्ति को शक्ति से दूर करना 
ईश्वर की उपासना एक और शक्ति और चमत्कार के सामने नतमस्तक होना था जिसे पुरुष ने मासिक के नाम पर या स्त्री होने के नाम पर बड़ी आसानी से स्त्री से छीन लिया। वह नहीं चाहता था कि एक शक्ति दूसरी शक्ति की निरंतर उपासना कर और शक्तिमान हो जाये।  
तथाकथित धर्म के ठेकेदार धर्म की व्याख्या और उसके प्रचार प्रसार के माध्यम से स्वयं का रुतबा और प्रभाव ही बढ़ाते रहे हैं। इसकी आड़ में स्त्री शक्ति से जुड़ा उनका भय भी पोसाता रहा और नए नए धार्मिक नियमों के द्वारा स्त्री को कमजोर करने के तरीके अपनाते रहे हैं। 
वेद जो हिन्दू धर्म के मान्य धर्म ग्रन्थ हैं उनमे स्त्री के साथ ऐसे किसी भेदभाव की कोई जानकारी नहीं है।  सिर्फ वेद ही क्यों हर धर्म ग्रन्थ में स्त्री को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए हैं लेकिन धर्म की व्याख्या करने वालों ने अपनी शक्ति और संप्रभुता बढ़ाने के लिए स्त्रियों को हमेशा ही उनके अधिकारों से वंचित किया है। 

वर्जित है मूर्ति का स्पर्श
पुरुषों ने जहाँ मासिक धर्म को स्त्री की कमजोरी निरूपित किया वहीँ ब्रह्मचर्य को पुरुषों की शक्ति।  ब्रह्मचर्य स्वयं की इन्द्रियों पर अंकुश होना चाहिए था जिसे स्त्री से दूरी निरूपित कर दिया गया। दूर रह कर इन्द्रियों पर वश किया तो क्या किया? ब्रह्मचर्य तो समाज में रहते हुए स्वयं पर नियंत्रण करना होना था लेकिन पुरुष जानता था स्वयं पर नियंत्रण आसान नहीं है। हनुमान शनि महाराज भैरव बाबा और भी अन्य कई देवताओं के भक्त बन उनकी भक्ति से खुद को शक्तिशाली बनाने के लिए उनसे स्त्रियों को दूर रखने के नियम बनाये गए। 
हनुमान मंदिर में स्त्रियां मूर्तियों को स्पर्श नहीं कर सकती शनि मंदिर या भैरव मंदिर में स्त्रियां पूजा नहीं कर सकती जैसे नियम अपना वर्चस्व बनाये रखने की कोशिशे मात्र हैं। 

पवित्रतम का अपवित्र होना 
कुछ दिनों पहले शनि शिंगणापुर में एक महिला सुरक्षा व्यवस्था को धता बता कर चबूतरे पर चढ़ गई और उसने शनि भगवान को तेल चढ़ा दिया।  इस बात का बवाल पूरे देश में मचा।  चार सुरक्षा कर्मी निलंबित कर दिए गए।  दर्शन रोक कर शनि चबूतरे को दूध से धोया गया उसकी शुद्धि की गई। फिर चर्चा शुरू हो गई क्या महिलाओं का निषेध उचित है ? जिस भारतीय दर्शन में ईश्वर दर्शन से सभी पापों का नष्ट होना माना जाता है वही ईश्वर एक महिला के स्पर्श मात्र से अपवित्र कैसे हो सकता है? जिस ईश्वर की पवित्रता के लिए उसे स्त्री से दूर रखा जाता है पौराणिक गाथाओं के अनुसार वह ईश्वर भी स्त्री की कोख से जन्मा है अपनी जननी स्वरुप स्त्री के स्पर्श से कोई देवता अपवित्र कैसे हो सकता है? फिर उस देव स्थान को पवित्र करने के लिए उसे दूध से धोया जाता है वह दूध भी तो किसी मादा पशु का ही होता है।  ऐसे में ये दोहरे मापदंड सिर्फ और सिर्फ स्त्री की सामाजिक धार्मिक शक्ति को घटाने के साधन मात्र बन कर रह जाते हैं। 

हथकंडे और भी हैं 

धर्म के नाम पर सारी वर्जनाएं महिलाओं के लिए ही हैं। यज्ञ हवन पिंडदान अंतिम संस्कार से महिलाओं को सदैव दूर रखा गया।  लेकिन धीरे धीरे वर्जनाएं टूट रही हैं स्त्रियां खुद इन्हे तोड़ रही हैं।  कई मामलों में थोड़े बहुत विरोध के बाद परिवार वाले भी समर्थन कर रहे हैं तो कई बार समाज का सहयोग भी मिल रहा है लेकिन ये बहुत व्यक्तिगत मसले रहे हैं जिनका असर एक छोटे से तबके में होता है। हालाँकि इन प्रयासों को वाहवाही मिलती है लेकिन इसका प्रभाव सीधे सीधे धर्म के ठेकेदारों के प्रभाव या रोजी रोटी पर नहीं पड़ता या वे वहाँ सीधे पहुँच नहीं पाते क्योंकि मामला भावनात्मक भी होता है। इसीलिए समाज में ऐसे बदलाव दिखाई दे रहे हैं सराहे जा रहे हैं और परंपरा में शामिल होने लगे हैं। इससे साफ़ है कि आम भारतीय मानस धार्मिक मान्यताओं और स्त्री की धार्मिक भागीदारी में बदलाव के लिए तैयार हो रहा है। 


ईश्वर एक प्रावधान अनेक 
रूढ़ियाँ समूह विशेष की दिमागी जड़ता की प्रतीक होती हैं ये उस समाज या क्षेत्र विशेष में ज्यादा मुखर होती हैं जिन्हे धर्म के ठेकेदारों ने अपने कब्जे में ले रखा है उनका वर्चस्व इतना अधिक है कि धार्मिक भावना के आहत होने के डर से  कानून और प्रशासन कुछ नहीं कर पाते। ये स्थिति सिर्फ हिन्दू देव स्थानों की नहीं है बल्कि हर धर्म में महिलाओं के साथ ये भेदभाव होता है। ये जानना भी कम दिलचस्प नहीं है कि शिंगणापुर में स्त्रियाँ शनि चबूतरे पर नहीं चढ़ सकतीं लेकिन कई स्थानों पर शनि पूजा के लिए ऐसा कोई बंधन नहीं है वहाँ स्त्री पुरुष सामान रूप से दर्शन पूजन करते हैं बल्कि पीढ़ियों से महिला पुजारी ही मंदिर में पूजा और व्यवस्था का कार्यभार संभल रही हैं।  

मानसिक बंधन फिर भी हैं 
रेखा ने घर में पूजा की पूजा के अंत में नारियल फोड़ना था लेकिन उसके पति घर में नहीं थे।  बेटी ने कहा मम्मी आप खुद ही नारियल फोड़ दो लेकिन बचपन से जमे संस्कार उसे ऐसा करने से रोकते रहे।  नारियल बलि का प्रतीक है और महिला बलि कैसे दे सकती है ? वह पड़ोस से किसी को बुलाने चली गई तब तक उसकी बेटी ने नारियल फोड़ दिया। रेखा पहले तो हतप्रभ रह गई फिर सोचा चलो ठीक है आजकल बेटा बेटी बराबर हैं ये सोच कर चुप रह गई। धार्मिक बंधनों से कई बार निकलने का मन तो होता है लेकिन बरसों से दिमाग में जिन मान्यताओं को जमा दिया गया है उनसे उबरना आसान भी नहीं हैं लेकिन अब अगली पीढ़ी ये भेदभाव नहीं झेले इसके लिए खुद को तैयार किया जा रहा है।  
अभी शनि शिंगणापुर ट्रस्ट की अध्यक्ष एक महिला बनी लेकिन उन्होंने भी बरसों से चली आ रही परंपरा को ही निभाने की बात कही।  साफ है या तो ये मानसिक बेड़ी इतनी मजबूत है कि इसे तोड़ने का साहस नहीं है या फिर खुद को मिले रुतबे और अधिकार को खोने का डर कोई क्रन्तिकारी कदम उठाने की इजाजत नहीं देता।

दरअसल ये विडम्बना ही है कि  देश में जितने भी धर्म हैं  उनकी सही व्याख्या आम जनमानस तक कभी पहुंची ही नहीं इसके पहले ही साधू संतों पण्डे पुजारियों मुल्ला मौलवियों ने इसे अपने स्वार्थ और फायदे के लिए तोड़ मरोड़ कर पेश कर दिया। जिन लोगों ने स्वाध्याय से धर्म को जाना और रूढ़िवादिता का विरोध किया उन्हें नास्तिक ठहरा दिया गया उन पर जानलेवा हमले तक हुए।  धार्मिक आयोजन का स्वरुप ही अब विकृत हो कर व्यापार बन गया है ऐसे में आम जन इस चकाचौंध से प्रभावित हो कर रूढ़ियों के भंवर में फँसता ही जा रहा है। 

सबरीमला और शिंगणापुर में जो भी हुआ उसने देश में महिलाओं की स्थिति का एक ताज़ा चित्र खींच दिया साथ ही धर्म के ठेकेदारों के सामने धर्म और कानून की असहाय स्थिति को भी उजागर कर दिया। देश का कानून महिलाओं को चाहे बराबरी का अधिकार देता है धर्म ने भले स्त्री को देवी शक्ति निरूपित किया हो लेकिन जड़ मानसिकता के पुरुष इस स्थिति को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए अभी बहुत संघर्ष करना होगा आखिर हजारों बरसों की मानसिक गुलामी से मुक्त होना इतना आसान भी तो नहीं हैं।  
कविता वर्मा 
 इंदौर 
डेली न्यूज़ में प्रकाशित कवर स्टोरी 

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