Saturday, June 27, 2015

छू लिया आसमान


बचपन से वह उस पहाड़ी को देखती आ रही थी। उबड़ खाबड़ रास्ते फैले झाड़ झंखाड़ और फिसलन के बीच से उसकी चोटी पर वह बड़ा सा पत्थर सिर उठाये खड़ा था। मानों चुनौती दे रहा हो दुनिया को है हिम्मत इन दुर्गम रास्तों को पार कर मुझ तक पहुँचने की ?आसमान को छू लेने की ?
उसने भी हमेशा सपना देखा था एक दिन वह वहाँ तक जरूर पहुँचेगी लेकिन इतना आसान तो ना था। 
रास्ते के छोटे पत्थरों से रोड़े तो उसकी पढाई में भी आये।लोगों की कंटीली बातें ताने सुन कर उनसे अपने आत्मविश्वास को लहूलुहान होने से बचाते उसने नौकरी शुरू की। पुरुष मानसिकता की कीचड भरी फिसलन में खुद को संभालते संभालते आज जब उसका प्रमोशन ऑर्डर हाथ आया उसका मन चोटी की उस बड़ी चट्टान पर उछल कर मानों आसमान को छू रहा था। 
 कविता वर्मा 

Tuesday, June 2, 2015

इस प्रयास को समर्थन मिले

शांति प्रिय और सुरक्षित माने जाने वाले शहर इंदौर में पिछले कुछ दिनों में जो घटनाएँ घटीं वे इस शहर की छवि से कतई मेल नहीं खातीं। जिस तरह शहर में गुंडा गर्दी बढ़ रही है शराब और ड्रग्स के नशे में सरे राह लोगो पर कातिलाना हमले हो रहे हैं वह शहर की फ़िज़ा में चिंता घोलने के लिए काफी थे ही उस पर एक और खबर ने लोगों को ना सिर्फ चौंका दिया बल्कि हर लड़की के माता पिता को चिंता में डाल दिया। गुंडों के डर से एक परिवार को अपनी बेटियों को शहर में ही हॉस्टल में भेजना पड़ा। जब वे अपने माता पिता से मिलने आईं तो वे गुंडे फिर उनके घर में आ धमके और लड़कियों से छेड़ खानी शुरू कर दी और उन के माँ बाप पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया। शहर में गुंडा विरोधी अभियान के तहत पुलिस की कार्यवाही को कई न्यूज़ चैनल्स ने सनसनी खबर के तौर पर दिखाया जिसमें गुंडों की सरे आम पिटाई की गई उनका जुलुस निकाला गया। पुलिस के इस कदम पर सवालिया निशान लगाये गए की क्या उसे ऐसे अधिकार हैं ?क्या मानव अधिकारों का उलंघन नहीं है ?मुख्यमंत्री का ये बयान की पुलिस कार्यवाही में कोई राजनैतिक हस्तक्षेप नहीं होगा ने हंगामा ही बरपा दिया। विरोधियों ने तो यहाँ तक कहा कि सरकार गुंडा गर्दी पर उतर आई है। 
पहले भी कई परिवारों ने कबूला है कि वे गुंडा गर्दी से बचाने के लिए अपनी बेटियों की पढाई छुड़वा कर उन की कम उम्र में शादी करने को मजबूर हुए हैं। 
इंदौर जैसे शहर में गुंडों के हौसले रातों रात तो नहीं बढ़ गए।  स्वाभाविक है पिछले काफी समय से या तो इन्हे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाये गए या राजनैतिक प्रश्रय से इनके लिए उपजाऊ जमीन तैयार की गई , और जब पानी सिर से ऊपर जाने लगा तब इन पर लगाम लगाने की कवायदें की गई। 
इंदौर में लिंगानुपात का अंतर प्रांत के कई पिछड़े जिलों से से भी काफी अधिक है। ये वो जमीनी हकीकत है जो सरकार की बालिकाओ के लिए चलाई जा रही कई योजनाओं के बाद है। क्या माना जाये कि लोगों में व्याप्त भय उन्हें लिंग परिक्षण के लिए बाध्य कर रहा है ? लड़कियों का जन्म लेना उसके बाद उनकी परवरिश सुरक्षा जैसे मुद्दों पर माता पिता की चिंता स्वाभाविक है। पुलिस प्रशासन उन्हें सुरक्षा देने में बुरी तरह नाकामयाब रहा है। 
अभी जब गुंडा विरोधी अभियान चलाया गया जिसमे गुंडों की उन्ही के इलाकों में पिटाई करके उनका जुलुस निकाला गया इस पर देश भर में एक बहस शुरू हो गई । इसे अनैतिक और बर्बर कार्यवाही करार दिया गया तो कहीं इन गुंडों के मानवाधिकारों की बात भी कही गई। ये शोर मचाने वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या तो जमीनी हकीकत से बिलकुल अनजान है या इससे आँखें मींचे बस खबरे और बहस चला कर वाहवाही बटोरना चाहता है। 
ये हमारे देश की विडम्बना है कि यहाँ गैर कानूनी कामों में लिप्त लोगों के जीने के अधिकारों की जोरदार पैरवी करते समय हमारा प्रबुद्ध वर्ग आम आदमी के शांति से जीने के अधिकार को भूल जाता है। उन लड़कियों और उनके परिवारों के उन सपनों को भूल जाता है जो इन गुंडों के कारण असमय दम तोड़ देते हैं। 
पुलिस भी जानती है कि हमारी लचर कानून व्यवस्था इन्हे हफ्ते भर भी कैद में नहीं रख पायेगी और बाहर आ कर ये सवा शेर हो जायेंगे इसलिए इन्हे इन्ही के इलाके में पीट कर और इनका जुलुस निकाल कर इन्हे ये सन्देश देने की कोशिश की जा रही है कि ये कानून से ऊपर नहीं है और लोगों में उनके खौफ को कम करने का एक प्रयास है जिसे हर इंदौरी का समर्थन मिलना ही चाहिए। 
कविता वर्मा 

Sunday, May 3, 2015

ऐसा भी होते रहना चाहिए


वैसे तो लिखने की आदत समय के साथ पनपी लेकिन धीरे धीरे इसमें मज़ा आने लगा। लेकिन ये लेखन कुछ छोटे मोटे लेखो तक ही सीमित था। गुणी जनो के संपर्क में आकर और कुछ गोष्ठियों में शामिल होते रहने से इसका फलक विस्तृत होता गया और कविता कहानियां लघुकथाओं तक जा पहुँचा। कभी सोचा न था अपना कहानी संग्रह छपेगा बस लिखने का सिलसिला थोड़ा सुचारू गति से चल निकला फिर एक ख्याल सपना बन कर जेहन पर छा गया और धीरे धीरे लगा कि एक सपना आकार ले रहा है। 

अपने प्रथम कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले 'पर लोगों की प्रतिक्रिया जानने की उत्सुकता किसे नहीं रहती। जान पहचान वालों की प्रतिक्रियाओं में एक अौपचारिकता भी छुपी रहती है। हालांकि अधिकतर प्रतिक्रियाएं सकारात्मक ही रहीं। कई मित्रों ने जिनमे कैलाश शर्मा जी राहुल वर्मा जी ने खुद हो कर पुस्तक समीक्षा भी लिखी जिसे समय समय पर ब्लॉग पर डालती भी रही हूँ। 

फिर भी कई बार लगता था कुछ और सटीक कुछ और ईमानदार प्रतिक्रिया मिले तो खुद का सटीक आकलन कर पाऊँ। इसी सिलसिले में मेरी पुस्तक बुरहानपुर गई वहाँ डॉक्टर वीरेंद्र निर्झर जी ने समीक्षा लिखी जिनसे आज तक नहीं मिली। बस समीक्षा आने के बाद एक बार फोन पर बात हुई थी। 
दिल्ली एक कथा कार्यशाला में जा रही थी तब ट्रेन में एक सहयात्री से काफी अच्छी बात चीत हुई और उन्हें अपनी एक पुस्तक भेंट की इस अनुग्रह के साथ की कैसी लगी पढ़ कर जरूर बताएं। लगभग ५ /६ महिने बाद एक मेल मिला। जिसे पढ़ कर लगा सच में जमीन से दो फुट ऊपर उड़ने लगी हूँ मैं। वह मेल यहाँ जस का तस कॉपी करके वह ख़ुशी आपके साथ शेयर करना चाहती हूँ। 

प्रिय बहिन कविता जी,
नमस्ते!
नव वर्ष की शुभकमनाओं के साथ आपका सहर्ष अभिवादन। आपको इस पत्र की आशा अब न रही होगी। आपकी कथा सन्ग्रह को पूरा पढ़ने के बाद ही मै आप को पत्र लिख रहा हूं। चिकित्सा व्यवसाय की व्यस्तता से समाय चुरा कर आपकी कहानियोंका आनंद लिया। वैसे तो छोठी सी पुस्तक को एक ही दिन में पढ़ा जा सकता था।परंतु एक कहानी को पढ़ कर हफ़्तों उसका स्वाद लेने के बाद ही दूसरी को देखना उचित समझा।
आपने कहानियों में एकदम अनूठे विषयों का चयन किया है। कहानियों के पात्र अत्यंत सजीव हैं तथा अनायास ही पाठक उनके साथ जीने लगता है। फिर कहानियों के नायक नायिकाएं चाहे आधुनिक नवयुवती हो या गाँव की असहाय बहू, एक साधारण गृहणी हो या घर का झाड़ू पोंछा करने वाली, पात्रों के मनोभाव उनका विचार मंथन अपना सा लगने लगता है। उनसे पूर्णतः एकमत हो पूर्ण सहानुभूति के साथ उनके साथ साथ हो लेता है। पात्रों की छोटी छोटी बातों का भी हृदय को छूने वाला चित्रण मुंशी प्रेम चंद्र की कहानियों जैसा है। किसी भी कहानी मेँ ऐसा नहीं हुआ कि मुझे  मुंशी प्रेम चंद्र की याद न आई हो। सारी कहानियाँ एक सकारात्मक मोड़ पर  कुछ अच्छा करने और हार न मानने की सीख देती हुई समाप्त होती हैँ।
अब कुछ त्रुटियों की जोर इंगित करना भी आवश्यक समझता हूँ। या त्रुटि न कह कर ऐसी दो तीन चीज़े जो मुझे अटपटी सी लगीं। पहली है भूमिका मे 'ठंडियों' शब्द और आगे कहीं 'समझावट' शब्द का प्रयोग असाहित्यिक सा है। पृष्ठ 119, पंक्ति 7 पर शायद 'महिना' के स्थान पर 'महीना' होना चहिये था।
एक और चीज़ जो अनूठी और अच्छी लगी वह थी कथा संग्रह का सासू जी को समर्पित किया जाना।
आप साहित्य के जगत मेँ आगे बढ़ते हुए नई ऊंचाइयों को छुएं ऐसी शुभकामनाओं के साथ, आपका एक सहयात्री!
अरविन्द पाल तोमर


अभी इस ख़ुशी को समाहित कर ही नहीं पाई थी कि एक दिन अचानक एक मेल प्राप्त हुआ। एक पाठक का जिन्हे न जानती थी न पहचानती थी। न ही कभी उनकी कोई टिप्पणी अपनी किसी ब्लॉग पोस्ट पर देखी थी। उनका ये मेल यहाँ जस का तस दे रही हूँ। 

From: Mahmud Alam
Date: Tue, Jan 27, 2015 at 1:55 PM
Subject: abhar prastvna
To: kvtverma27@gmail.com


Adarniya kavita jee, saadar pranam! Vigat ek saptah pahle sahitya ki khoj me apki ek laghu katha padhne ka soubhagya mila, padh to main samay wyatit karne ke liye tha parantu 1 ke baad 2 aur phir teesri kahani padhte hi meri khoj puri ho gaye. Vastutah do dashak pahle adhyan kaal me mujhe munshi premchand Jee ki rachnaon ka adhyan kiya aur phir munshi Jee ki sabhi sahitya sangrah Ko padh dala.taduprant maine unke samkalin anekon sahityakaron ki rachnaon ka adhyan kiya parantu premchand Jee ki rachnaon ka koi jod nahi mila man me yehi vichar ata ki kaash vê kuchh saal we yadi aur jiveet hote to na jane kitni amulya sahityik sampada hame prapt ho sakti thi. Kaalanter me Bhoutik vyastatao ke karan evang aisi kaaljayee, yatharth, shiksha parak evang anandonmukhi lekh ka sandhan na milna v ées kshetra se door rahne ka ek karan raha. Parantu jaise hi maine apki 3 kahaniya padhi, maine usi pal barambar 65 kahaniyan padh dali, apki rachnaon me v badi saralta se gudh tatwon ka yatharth chitran mila jo mere jaisa pathak ke liye badi prasannta ki baat hai. Apke lekh kisi bhi aayuwarg ke pathak Ko aakarshit, prasannachit evang sakaratmak soch Ko aage le jane me saksham hai.aap jaise veedushi mahan wyaktitwa ki swamini ka batour shikshika hona v Un lakhon bachhon ke liye soubhagya ki baat hai jinhe aapne vidya daan se sushobhit kiya.meri aapse ye vinamra aagraha hai ki aap lekhan jaari rakhen aaj samaj Ko sabse jyada sahityakar ki hi jarurat h, sahitya se susajjit wyakti nakaratmak karya se door rahne Ko pratibadhht hain, bahut bahut abhar,

अभी अभी मेरी एक कहानी उज्जैन से निकलने वाली समावर्तन पत्रिका में प्रकाशित हुई। उस कहानी को मेल द्वारा डॉक्टर गरिमा को भेजा जिनसे यूं तो कोई पहचान नहीं है न ही कभी कोई अनौपचारिक बात चीत हुई है ,हम व्हाट्स अप के एक ग्रुप में हैं बस। कहानी पढ़ कर उनका जो कमेंट आया उसे शेयर कर रही हूँ। 


कविता जी की कहानी ने शरणदाता  की याद दिला दी।कविता जी में अच्छा गद्य लिखने की ताक़त है।मन की बात कह पाना अल्ताफ के लिए आसान न था ,लेकिन सबके लिए मुमकिन नहीं,कहानी का अंत प्रेमचंद के आदर्शवादी अंत की याद दिलाता है।हम जिस समय में जी रहे हैं वहां आत्मीयता की जगह स्वार्थ और तटस्थता ले रहे हैं।ऐसी कहानियां इस प्रक्रिया में सकारात्मक हस्तक्षेप करती हैं।सम्मान नीय कविता जी आप इसे अच्छी जगह छपने भेजिए।

सृजन एक मानसिक संतोष देता है। लेकिन परचित और अपरिचित लोगों से मिली टिप्पणियां उत्साह बढ़ा देती हैं। 
कविता वर्मा 

Thursday, March 5, 2015

रंगो का त्यौहार होली

रीमा का मन आज बहुत उदास था। पति और बच्चों के जाने के बाद वह अनमनी सी काम निबटा रही थी। ऊब गई थी वह अपनी रूटीन जिंदगी से। तभी फोन की घंटी बजी। शहर के दूसरे छोर पर रहने वाली उसकी मौसेरी बहन का फोन था। क्या कर रही है सब काम छोड़ और जल्दी से घर आ जा। लेकिन किन्तु परन्तु सुनने के मूड में वह नहीं थी। इतनी दूर जाना। और  हाँ ऑरेंज साडी या सूट पहन कर आना ,कह कर उसने फोन रख दिया। पता नहीं क्या है अब मना भी नहीं किया जा सकता। वहाँ रीमा का स्वागत हंसी ठहाकों से हुआ। सारी मौसेरी ममेरी बहनें और भाभियाँ वहाँ इकठ्ठी थीं। सारा दिन हंसी ठहाकों खाने पीने और फोटो खींचने में निकल गया। सब एक रंग में रंगी थीं ऑरेन्ज और प्यार के रंगों में। शाम को जब रीमा घर लौटी वह रिश्तों के रंग में सराबोर थी उसकी उदासी गायब हो चुकी थी। 
 जब से  नीलू की नानीजी का देहावसान हुआ वह बचपन की उन यादों से ही बाहर नहीं आ पा रही थी। उसके मूड को देखते हुए घर में सब कुछ खामोश सा था। उस दिन उसकी बेटी कॉलेज से आ कर किचन में घुस गई। लाख कहने पर भी नीलू को न कुछ बताया और ना किचन में आने दिया। शाम की चाय के साथ उसने रंग बिरंगी भेल और हरे भरे कबाब बनाये और लॉन में रंगबिरंगे फूलों से सजी टेबल पर सब कुछ सजा कर नीलू को आवाज़ दी। सुन्दर सजीली टेबल और रंगबिरंगे नाश्ते ने नीलू को जैसे उसके अवसाद से बाहर ला दिया। उस दिन उसने अपनी बेटी के साथ अपनी नानी के संग बिताये  बचपन की ढेर सारी बातें शेयर की।  
रंगो का त्यौहार होली ,मन में इसका ख्याल आते ही लाल हरे नीले पीले रंग आँखों के आगे छा जाते हैं वैसे ही जैसे स्त्री का ख्याल आते ही उसके जीवन में मौजूद जिंदगी के विविध रंग। स्त्री और रंग , विविधता और स्त्री जीवन तो मानो एक दूसरे के पूरक हैं। छोटी सी बच्ची का लाल रंग के प्रति आकर्षण ,गुड़ियों के खेल में एक एक बात का ध्यान रखते हुए विवाह रचाना हो या आँगन के कोने को रंगीन दुपट्टों से सजाना जता देता है कि एक लड़की अपने जीवन को पूरे उत्साह और जीवटता से जीने के लिए तैयार है और उसके जीवन में उदासी हताशा जैसे अनमने रंगो का कोई स्थान नहीं है। 
रंग जहाँ अपने में ढेर सारी सुंदरता समेटे होते हैं वहीँ अपने चाहने वालों के मन को अनकहे ही मुखरित कर देते हैं। वैसे ही जैसे एक स्त्री के जीवन की सुंदरता उसके रहन सहन पहरावे से लेकर उसके जीवन की ऊर्जा में छुपी ललक से मुखरित होती है। 
स्त्री जीवन बनाम रंग 
कहने के तो स्त्री और पुरुष दोनों ही ईश्वर की बनाई कृति हैं लेकिन गाहे बगाहे उनके जीवन जीने की शैली की चर्चा तो होती ही है। लड़कपन से ही लड़कियों में रंगों के प्रति आकर्षण देखने को मिलता है और ये रंग सिर्फ चटक खिले हुए रंग ही नहीं होते बल्कि गहरे और उदासी भरे भी होते है बिलकुल वैसे ही जैसे गुड़िया की विदाई के बाद कई दिनों तक उदास रहना या उसकी याद में रोना। हमारी सामाजिक संरचना रीति रिवाज़ भी उन्हें बचपन से ही जीवन के विविध रंगों के प्रति तैयार कर देती है फिर चाहे वो भाई की झिड़की हो या दादी का उसकी चंचलता पर घूरना वह थोड़ी देर उदासी के गहरे रंग में रहने के तुरंत बाद उसे झटक झाड़ पोंछ कर चटक रंग में खिल खिला उठती है। 
कितना कुछ कहते हैं रंग 
हर रंग कुछ कहता है हर रंग अपने में जीवन के, आपके आपके मूड के , आपकी सोच के रंग को प्रकट करता है। लाल रंग सिर्फ प्रेम का ही रंग नहीं है  बल्कि ये आपको उतसाहित और ऊर्जावान भी रखता है। यही कारण है की शादी उत्सव में इस रंग को प्राथमिकता दी जाती है जिससे आप खिली खिली और उत्साहित दिखें। आपके मन में अगर कोई दुःख या उदासी है उसे कुछ देर के लिए इसके नीचे छुपाया जा सके। महिलायें ख़ास तौर पर रंगो के माध्यम से इसे बखूबी अंजाम देती हैं। 
हरा रंग है जिसे समृद्धि से जोड़ा जाता है वह जाने कितने रूप में मौजूद होता है स्त्री जीवन में। हरियाली तीज या सावन जिसमे हरे रंग में सजधज कर जीवन की विषमताओं को परे हटा कर स्त्री मन संतुष्ट महसूस करता है। ये त्यौहार विशेष रूप से स्त्रियाँ इसलिए मनाती हैं क्योंकि उनके मन की पूर्णता और उत्साह ही घर की धूरी  होते हैं। 
अब चाहती हैं अपना अधिकार भी 
जिन रंगों का पहले स्त्री जीवन में प्रवेश भी निषिद्ध था वही आज उनके जीवन में अपना स्थान बनाने लगे हैं। ब्लैक या कला रंग आधिपत्य को दर्शाता है जिसे पहले अशुभ या असगुन कह कर स्त्रियों से परे रखा जाता था। आज महिलाऐं ना सिर्फ अपना स्थान बना रही हैं बल्कि कई क्षेत्रों में उनका अधिपत्य भी है इसीलिए ब्लैक आजकल फैशन सिम्बल बना हुआ है जो आगाह भी करता है की हमें दबाने की कोशिश भी ना करना। 
अब हो गई है और दोस्ताना 
लद  गए वो ज़माने जब घर की चाहर दीवारी ही सब कुछ थी अब महिलाएं न सिर्फ दहलीज लांघ कर बाहर निकली हैं बल्कि अपनी जिंदगी में दोस्ती को भी महत्त्व देने लगी हैं फिर चाहे वह सोशल साइट पर बचपन की सहेली को ढूंढना हो या साथियों के साथ  हैंग आउट करना और इसीलिए पीले रंग ने उनकी जिंदगी में हल्दी कुमकुम से आगे जा कर एक अलहदा स्थान ले लिया है। दोस्ती और खुशमिजाजी का ये रंग ना सिर्फ दिखने में खिला खिला लगता है बल्कि मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम को उद्दीप्त कर जीवन को ऊर्जावान बनाता  है। 
शांति सुकून सहजता 
सफ़ेद रंग जो कल तक वैधव्य का प्रतीक था अब शांति और सुकून के साथ ही सोफेस्टिकेशन का प्रतीक भी बन गया है। महिलायें न सिर्फ सफ़ेद परिधान में खुद की एक खास इमेज बना रही हैं बल्कि  जिंदगी में खुद के लिए सुकून भी खुद ही तलाश कर रही हैं। यह प्राकृतिक रंग उनकी सहज जीवन शैली का परिचायक बन रहा है। 
और भी बहुत रंग है जीवन में 
इसके अलावा भी ढेर सारे रंग हैं एक स्त्री के जीवन में जैसे पिंक रोमांटिक रंग हो या पर्पल जो रॉयल्टी दर्शाता हो सब कुछ  रहन सहन व्यवहार से ही तो प्रकट होती है। और सच देखा जाए तो अपने जीवन से दुःख या उदासी के ग्रे रंगों को छुपा कर महिलायें इन रंगों के साथ बेहतरीन सामजस्य बैठा कर आगे बढ़ रही हैं। साल दर साल रंगों और गुजरते महिला दिवसों के साथ हर महिला अपने जीवन के  विविध रंगों के खूबसूरत तालमेल के साथ आगे बढे हर रंग पूरी शिद्दत से जिए बस यही तो कहता है हर रंग और हर महिला दिवस। 
कविता वर्मा 

Monday, December 1, 2014

अलमस्त

 
घर से निकलते हुए ठिठक कर वह सामने से जाते उस लड़के को ध्यान से देखने लगा। कान में हेड फोन लगाये सीटी बजाता वह लापरवाही से जेब में हाथ डाले टहलता हुआ लगभग रोज़ ही निकलता था और वह रोज़ ही उसे एक नज़र देख ही लेता था। वह खुद भी तो ऐसा ही था चंद सालों पहले अलमस्त सा। अब वह उसे देख कर उन दिनों की याद कर एक उसाँस भर कर रह जाता है। पढाई पूरी होते ही एक बड़ी कंपनी के लाखों के पैकेज की नौकरी के एवज़ में उसने वे दिन कहीं खो जो दिए थे। 
कविता वर्मा 

Thursday, November 27, 2014

गहरे हैं रंग ' कैनवास पर प्रेम ' के


विमलेश त्रिपाठी जी का उपन्यास 'कैनवास पर प्रेम ' के नाम ने ही मुझे आकर्षित किया था। नाम से कहानी का जो कुछ अंदाज़ा हुआ था वो ठीक ठीक होते हुए भी उससे बहुत अलग भी था। 
कहानी अपने आप में ढेर सारी त्रासदियों घटनाओं दुविधाओं और दुश्चिंताओं को समेटे एक सम्मोहक माया जाल सा बुनती है जिसमे आप कभी कहीं खो जाते है तो कभी किसी पल पर ठिठक कर उसे महसूस करते रह जाते हैं। 
कहीं एक बच्चे के दुःख से उपजते कलाकार को धीरे धीरे बड़ा होते देखते हैं तो कभी उस कलाकार को मौत की ओर कदम बढ़ाते देख काँप जाते हैं इस आशंका में कि ये कहानी पूरी होगी भी या नहीं। कई बार कहानी के अधूरा रह जाने की आशंका जल्दी जल्दी पढ़ कर तसल्ली कर लेना चाहती है लेकिन यकीन मानिये कि उस पल की कशिश आपको एक साथ कई पन्ने पलटने से रोक भी लेती है। 
इसमें एक मासूम से प्यार की दास्ताँ है ,तो एक ऐसे दोस्त की कहानी जो बिना कहे सब समझ जाता है तो बिना पूछे सब कर भी जाता है। दोस्ती का ऐसा विश्वास है कि पढ़ते पढ़ते रुक कर आप अपने दोस्तों की फेहरिस्त पर एक नज़र डाल कर उनमे एक ऐसा दोस्त जरूर ढूंढेंगे। 
वैसे जिंदगी में कई लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हे हम अपना दोस्त नहीं कहते हैं लेकिन वे हमारे दोस्त से शुभचिंतक होते हैं। ऐसे लोगों की मौजूदगी ने इस कहानी में मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित किया है। 
प्यार की कशिश तो शायद इसके अधूरे रह जाने में ही है लेकिन अधूरे प्यार के बीते लम्हों के साथ एक पूरी जिंदगी जी जा सकती है। 
कहानी उलझे पारिवारिक ताने बाने के साथ घरेलू क्रूरता असहायता और निस्पृहता के साथ एक आक्रोश , दया और लगाव पैदा करती है। सुदूर गाँव के खेतों में दौड़ते ,गाँव के बाहर किसी बूढ़े पेड़ के तले अचंभित कर देने वाले पलों को पीछे छोड़ अचानक कोलकाता जैसे बड़े शहर में आ जाती है और आप खेतों की मेढ़ पर ठिठके खड़े उसके वापस लौट आने की प्रतीक्षा ही करते रह जाते हैं। 
कहानी में लेखक और उसके कथाकार का द्वंद कहानी की गति धीमी कर देता है जिसमे कभी कभी तो कहानी खो सी जाती है और उसके सिरे  पकड़ने के लिए आपको  संघर्ष करना पड़ता है। लेखक का एक घरेलू व्यक्तित्व होना और अपने लेखन को जिन्दा रखने के लिए उसकी सतत जिजीविषा भी कहीं कहीं कहानी पर हावी हुई है लेकिन उस पर भी लेखक का संवेदनाओ से भरा इंसान होना और इन संवेदनाओ को लेखन से ऊपर रखना दिल छू  जाता है। लेखक  के व्यक्तित्व की दृढ़ता कई जगह कई रूपों में सामने आई है। 
कहीं कहीं हिंदी में भाषायी त्रुटियाँ खटकती हैं लेकिन बीच बीच में भावार्थ सहित सुन्दर बंगाली कविताओं की खनक इसे नगण्य कर देती है। 
कुल मिला कर कैनवास पर प्रेम शब्दों के साथ धीमे धीमे आपके अंदर उतरता है और अपने गहरे रंगों के साथ आपके दिलो दिमाग पर चित्रित हो जाता है।  
कविता वर्मा 

Sunday, November 16, 2014

देहरी


पढाई ख़त्म होते ही सोचा था कही अच्छी सी नौकरी कर के परिवार से रूठी खुशियों को वापस मना लाएगी लेकिन बिना अनुभव बिना सिफारिश कोई नौकरी आसानी से मिलती है क्या ?महीनो ठोकरे खाने के बाद आखिर उसने वह राह पकड़ी। कॉल सेंटर पर काम करने का कह कर शाम ढले घर से निकलती और पैर में घुँघरू बांधे अपने दुःख दरिद्र को पैरों से रौंदते अपने समय के बदलने की राह तकती। पैरों की हर थाप पर मन आशंकित रहता कहीं माँ बाबा को पता ना चल जाये नहीं तो वो जीते जी मर जायेंगे। मन खुद को ही समझाता कि वो जो कर रही है मज़बूरी में और परिवार के लिए ही कर रही है। लेकिन मन ही मानने को तैयार नहीं होता तो माँ बाबा कैसे समझेंगे यह आशंका सदा बनी रहती। मैं उन्हें कभी पता नहीं चलने दूँगी वह खुद से प्रण करती पर उनसे झूठ बोलने की कसक हमेशा बनी रहती। 
ऐसे ही एक शाम खबर आई बाबा को कुछ हो गया है होश ही कहाँ रहा उसे जैसी थी वैसे ही दौड़ पड़ी घर को। यहाँ उसने घुँघरू बंधे पैरो से देहरी लांघी वहाँ बाबा ने आखिरी हिचकी ली। वह वहीं थम गई समझ नहीं पाई उसने अभी देहरी लांघी है या बाबा ने उसी दिन दम तोड़ दिया था जिस दिन उसने घुँघरू बांधे थे। 
कविता वर्मा

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...