Thursday, March 5, 2015

रंगो का त्यौहार होली

रीमा का मन आज बहुत उदास था। पति और बच्चों के जाने के बाद वह अनमनी सी काम निबटा रही थी। ऊब गई थी वह अपनी रूटीन जिंदगी से। तभी फोन की घंटी बजी। शहर के दूसरे छोर पर रहने वाली उसकी मौसेरी बहन का फोन था। क्या कर रही है सब काम छोड़ और जल्दी से घर आ जा। लेकिन किन्तु परन्तु सुनने के मूड में वह नहीं थी। इतनी दूर जाना। और  हाँ ऑरेंज साडी या सूट पहन कर आना ,कह कर उसने फोन रख दिया। पता नहीं क्या है अब मना भी नहीं किया जा सकता। वहाँ रीमा का स्वागत हंसी ठहाकों से हुआ। सारी मौसेरी ममेरी बहनें और भाभियाँ वहाँ इकठ्ठी थीं। सारा दिन हंसी ठहाकों खाने पीने और फोटो खींचने में निकल गया। सब एक रंग में रंगी थीं ऑरेन्ज और प्यार के रंगों में। शाम को जब रीमा घर लौटी वह रिश्तों के रंग में सराबोर थी उसकी उदासी गायब हो चुकी थी। 
 जब से  नीलू की नानीजी का देहावसान हुआ वह बचपन की उन यादों से ही बाहर नहीं आ पा रही थी। उसके मूड को देखते हुए घर में सब कुछ खामोश सा था। उस दिन उसकी बेटी कॉलेज से आ कर किचन में घुस गई। लाख कहने पर भी नीलू को न कुछ बताया और ना किचन में आने दिया। शाम की चाय के साथ उसने रंग बिरंगी भेल और हरे भरे कबाब बनाये और लॉन में रंगबिरंगे फूलों से सजी टेबल पर सब कुछ सजा कर नीलू को आवाज़ दी। सुन्दर सजीली टेबल और रंगबिरंगे नाश्ते ने नीलू को जैसे उसके अवसाद से बाहर ला दिया। उस दिन उसने अपनी बेटी के साथ अपनी नानी के संग बिताये  बचपन की ढेर सारी बातें शेयर की।  
रंगो का त्यौहार होली ,मन में इसका ख्याल आते ही लाल हरे नीले पीले रंग आँखों के आगे छा जाते हैं वैसे ही जैसे स्त्री का ख्याल आते ही उसके जीवन में मौजूद जिंदगी के विविध रंग। स्त्री और रंग , विविधता और स्त्री जीवन तो मानो एक दूसरे के पूरक हैं। छोटी सी बच्ची का लाल रंग के प्रति आकर्षण ,गुड़ियों के खेल में एक एक बात का ध्यान रखते हुए विवाह रचाना हो या आँगन के कोने को रंगीन दुपट्टों से सजाना जता देता है कि एक लड़की अपने जीवन को पूरे उत्साह और जीवटता से जीने के लिए तैयार है और उसके जीवन में उदासी हताशा जैसे अनमने रंगो का कोई स्थान नहीं है। 
रंग जहाँ अपने में ढेर सारी सुंदरता समेटे होते हैं वहीँ अपने चाहने वालों के मन को अनकहे ही मुखरित कर देते हैं। वैसे ही जैसे एक स्त्री के जीवन की सुंदरता उसके रहन सहन पहरावे से लेकर उसके जीवन की ऊर्जा में छुपी ललक से मुखरित होती है। 
स्त्री जीवन बनाम रंग 
कहने के तो स्त्री और पुरुष दोनों ही ईश्वर की बनाई कृति हैं लेकिन गाहे बगाहे उनके जीवन जीने की शैली की चर्चा तो होती ही है। लड़कपन से ही लड़कियों में रंगों के प्रति आकर्षण देखने को मिलता है और ये रंग सिर्फ चटक खिले हुए रंग ही नहीं होते बल्कि गहरे और उदासी भरे भी होते है बिलकुल वैसे ही जैसे गुड़िया की विदाई के बाद कई दिनों तक उदास रहना या उसकी याद में रोना। हमारी सामाजिक संरचना रीति रिवाज़ भी उन्हें बचपन से ही जीवन के विविध रंगों के प्रति तैयार कर देती है फिर चाहे वो भाई की झिड़की हो या दादी का उसकी चंचलता पर घूरना वह थोड़ी देर उदासी के गहरे रंग में रहने के तुरंत बाद उसे झटक झाड़ पोंछ कर चटक रंग में खिल खिला उठती है। 
कितना कुछ कहते हैं रंग 
हर रंग कुछ कहता है हर रंग अपने में जीवन के, आपके आपके मूड के , आपकी सोच के रंग को प्रकट करता है। लाल रंग सिर्फ प्रेम का ही रंग नहीं है  बल्कि ये आपको उतसाहित और ऊर्जावान भी रखता है। यही कारण है की शादी उत्सव में इस रंग को प्राथमिकता दी जाती है जिससे आप खिली खिली और उत्साहित दिखें। आपके मन में अगर कोई दुःख या उदासी है उसे कुछ देर के लिए इसके नीचे छुपाया जा सके। महिलायें ख़ास तौर पर रंगो के माध्यम से इसे बखूबी अंजाम देती हैं। 
हरा रंग है जिसे समृद्धि से जोड़ा जाता है वह जाने कितने रूप में मौजूद होता है स्त्री जीवन में। हरियाली तीज या सावन जिसमे हरे रंग में सजधज कर जीवन की विषमताओं को परे हटा कर स्त्री मन संतुष्ट महसूस करता है। ये त्यौहार विशेष रूप से स्त्रियाँ इसलिए मनाती हैं क्योंकि उनके मन की पूर्णता और उत्साह ही घर की धूरी  होते हैं। 
अब चाहती हैं अपना अधिकार भी 
जिन रंगों का पहले स्त्री जीवन में प्रवेश भी निषिद्ध था वही आज उनके जीवन में अपना स्थान बनाने लगे हैं। ब्लैक या कला रंग आधिपत्य को दर्शाता है जिसे पहले अशुभ या असगुन कह कर स्त्रियों से परे रखा जाता था। आज महिलाऐं ना सिर्फ अपना स्थान बना रही हैं बल्कि कई क्षेत्रों में उनका अधिपत्य भी है इसीलिए ब्लैक आजकल फैशन सिम्बल बना हुआ है जो आगाह भी करता है की हमें दबाने की कोशिश भी ना करना। 
अब हो गई है और दोस्ताना 
लद  गए वो ज़माने जब घर की चाहर दीवारी ही सब कुछ थी अब महिलाएं न सिर्फ दहलीज लांघ कर बाहर निकली हैं बल्कि अपनी जिंदगी में दोस्ती को भी महत्त्व देने लगी हैं फिर चाहे वह सोशल साइट पर बचपन की सहेली को ढूंढना हो या साथियों के साथ  हैंग आउट करना और इसीलिए पीले रंग ने उनकी जिंदगी में हल्दी कुमकुम से आगे जा कर एक अलहदा स्थान ले लिया है। दोस्ती और खुशमिजाजी का ये रंग ना सिर्फ दिखने में खिला खिला लगता है बल्कि मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम को उद्दीप्त कर जीवन को ऊर्जावान बनाता  है। 
शांति सुकून सहजता 
सफ़ेद रंग जो कल तक वैधव्य का प्रतीक था अब शांति और सुकून के साथ ही सोफेस्टिकेशन का प्रतीक भी बन गया है। महिलायें न सिर्फ सफ़ेद परिधान में खुद की एक खास इमेज बना रही हैं बल्कि  जिंदगी में खुद के लिए सुकून भी खुद ही तलाश कर रही हैं। यह प्राकृतिक रंग उनकी सहज जीवन शैली का परिचायक बन रहा है। 
और भी बहुत रंग है जीवन में 
इसके अलावा भी ढेर सारे रंग हैं एक स्त्री के जीवन में जैसे पिंक रोमांटिक रंग हो या पर्पल जो रॉयल्टी दर्शाता हो सब कुछ  रहन सहन व्यवहार से ही तो प्रकट होती है। और सच देखा जाए तो अपने जीवन से दुःख या उदासी के ग्रे रंगों को छुपा कर महिलायें इन रंगों के साथ बेहतरीन सामजस्य बैठा कर आगे बढ़ रही हैं। साल दर साल रंगों और गुजरते महिला दिवसों के साथ हर महिला अपने जीवन के  विविध रंगों के खूबसूरत तालमेल के साथ आगे बढे हर रंग पूरी शिद्दत से जिए बस यही तो कहता है हर रंग और हर महिला दिवस। 
कविता वर्मा 

Monday, December 1, 2014

अलमस्त

 
घर से निकलते हुए ठिठक कर वह सामने से जाते उस लड़के को ध्यान से देखने लगा। कान में हेड फोन लगाये सीटी बजाता वह लापरवाही से जेब में हाथ डाले टहलता हुआ लगभग रोज़ ही निकलता था और वह रोज़ ही उसे एक नज़र देख ही लेता था। वह खुद भी तो ऐसा ही था चंद सालों पहले अलमस्त सा। अब वह उसे देख कर उन दिनों की याद कर एक उसाँस भर कर रह जाता है। पढाई पूरी होते ही एक बड़ी कंपनी के लाखों के पैकेज की नौकरी के एवज़ में उसने वे दिन कहीं खो जो दिए थे। 
कविता वर्मा 

Thursday, November 27, 2014

गहरे हैं रंग ' कैनवास पर प्रेम ' के


विमलेश त्रिपाठी जी का उपन्यास 'कैनवास पर प्रेम ' के नाम ने ही मुझे आकर्षित किया था। नाम से कहानी का जो कुछ अंदाज़ा हुआ था वो ठीक ठीक होते हुए भी उससे बहुत अलग भी था। 
कहानी अपने आप में ढेर सारी त्रासदियों घटनाओं दुविधाओं और दुश्चिंताओं को समेटे एक सम्मोहक माया जाल सा बुनती है जिसमे आप कभी कहीं खो जाते है तो कभी किसी पल पर ठिठक कर उसे महसूस करते रह जाते हैं। 
कहीं एक बच्चे के दुःख से उपजते कलाकार को धीरे धीरे बड़ा होते देखते हैं तो कभी उस कलाकार को मौत की ओर कदम बढ़ाते देख काँप जाते हैं इस आशंका में कि ये कहानी पूरी होगी भी या नहीं। कई बार कहानी के अधूरा रह जाने की आशंका जल्दी जल्दी पढ़ कर तसल्ली कर लेना चाहती है लेकिन यकीन मानिये कि उस पल की कशिश आपको एक साथ कई पन्ने पलटने से रोक भी लेती है। 
इसमें एक मासूम से प्यार की दास्ताँ है ,तो एक ऐसे दोस्त की कहानी जो बिना कहे सब समझ जाता है तो बिना पूछे सब कर भी जाता है। दोस्ती का ऐसा विश्वास है कि पढ़ते पढ़ते रुक कर आप अपने दोस्तों की फेहरिस्त पर एक नज़र डाल कर उनमे एक ऐसा दोस्त जरूर ढूंढेंगे। 
वैसे जिंदगी में कई लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हे हम अपना दोस्त नहीं कहते हैं लेकिन वे हमारे दोस्त से शुभचिंतक होते हैं। ऐसे लोगों की मौजूदगी ने इस कहानी में मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित किया है। 
प्यार की कशिश तो शायद इसके अधूरे रह जाने में ही है लेकिन अधूरे प्यार के बीते लम्हों के साथ एक पूरी जिंदगी जी जा सकती है। 
कहानी उलझे पारिवारिक ताने बाने के साथ घरेलू क्रूरता असहायता और निस्पृहता के साथ एक आक्रोश , दया और लगाव पैदा करती है। सुदूर गाँव के खेतों में दौड़ते ,गाँव के बाहर किसी बूढ़े पेड़ के तले अचंभित कर देने वाले पलों को पीछे छोड़ अचानक कोलकाता जैसे बड़े शहर में आ जाती है और आप खेतों की मेढ़ पर ठिठके खड़े उसके वापस लौट आने की प्रतीक्षा ही करते रह जाते हैं। 
कहानी में लेखक और उसके कथाकार का द्वंद कहानी की गति धीमी कर देता है जिसमे कभी कभी तो कहानी खो सी जाती है और उसके सिरे  पकड़ने के लिए आपको  संघर्ष करना पड़ता है। लेखक का एक घरेलू व्यक्तित्व होना और अपने लेखन को जिन्दा रखने के लिए उसकी सतत जिजीविषा भी कहीं कहीं कहानी पर हावी हुई है लेकिन उस पर भी लेखक का संवेदनाओ से भरा इंसान होना और इन संवेदनाओ को लेखन से ऊपर रखना दिल छू  जाता है। लेखक  के व्यक्तित्व की दृढ़ता कई जगह कई रूपों में सामने आई है। 
कहीं कहीं हिंदी में भाषायी त्रुटियाँ खटकती हैं लेकिन बीच बीच में भावार्थ सहित सुन्दर बंगाली कविताओं की खनक इसे नगण्य कर देती है। 
कुल मिला कर कैनवास पर प्रेम शब्दों के साथ धीमे धीमे आपके अंदर उतरता है और अपने गहरे रंगों के साथ आपके दिलो दिमाग पर चित्रित हो जाता है।  
कविता वर्मा 

Sunday, November 16, 2014

देहरी


पढाई ख़त्म होते ही सोचा था कही अच्छी सी नौकरी कर के परिवार से रूठी खुशियों को वापस मना लाएगी लेकिन बिना अनुभव बिना सिफारिश कोई नौकरी आसानी से मिलती है क्या ?महीनो ठोकरे खाने के बाद आखिर उसने वह राह पकड़ी। कॉल सेंटर पर काम करने का कह कर शाम ढले घर से निकलती और पैर में घुँघरू बांधे अपने दुःख दरिद्र को पैरों से रौंदते अपने समय के बदलने की राह तकती। पैरों की हर थाप पर मन आशंकित रहता कहीं माँ बाबा को पता ना चल जाये नहीं तो वो जीते जी मर जायेंगे। मन खुद को ही समझाता कि वो जो कर रही है मज़बूरी में और परिवार के लिए ही कर रही है। लेकिन मन ही मानने को तैयार नहीं होता तो माँ बाबा कैसे समझेंगे यह आशंका सदा बनी रहती। मैं उन्हें कभी पता नहीं चलने दूँगी वह खुद से प्रण करती पर उनसे झूठ बोलने की कसक हमेशा बनी रहती। 
ऐसे ही एक शाम खबर आई बाबा को कुछ हो गया है होश ही कहाँ रहा उसे जैसी थी वैसे ही दौड़ पड़ी घर को। यहाँ उसने घुँघरू बंधे पैरो से देहरी लांघी वहाँ बाबा ने आखिरी हिचकी ली। वह वहीं थम गई समझ नहीं पाई उसने अभी देहरी लांघी है या बाबा ने उसी दिन दम तोड़ दिया था जिस दिन उसने घुँघरू बांधे थे। 
कविता वर्मा

Sunday, October 26, 2014

इरादा

उसकी सारी कोशिशे सारी जिद अनसुनी कर दी गईं। लाख सिर पटकने पर भी उसकी माँ ने उसे तैरना सीखने की अनुमति नहीं दी। मछुआरे का बेटा तैरना ना जाने , बस्ती के लोग हँसते थे पर वो डरी हुई थीं। ये समुन्द्र उनके जीवनसाथी को निगल चुका था अब वो अपने बेटे को उसके पास भेजने से भी डरती थीं।उसके साथी बच्चे जब लहरों की सवारी करते वह गुमसुम सा उन्हें देखा करता। एक दिन शायद समुन्द्र ही उसकी उदासी से पिघल गया और ऐसा बरसा कि उसके आँगन तक पहुँच गया। उसने भी कहाँ देर की कूद पड़ा उथले पानी में और लगा हाथ पैर चलाने। समुन्द्र और मछुआरे का मिलन हो ही गया। 
कविता वर्मा

Friday, October 10, 2014

जमींदार


मॉल में घूमते हुए चकाचौंध देखते उसके मुँह से एक आह निकल गई। कितना पैसा होता है इन शहर के लोगो के पास। 
वैसे तो गाँव में भी कुछ लोगो के पास बहुत पैसा है। उसे गाँव के जमींदार के ठसके याद आ गए। 
बचपन में एक बार उसने अपने दादाजी से पूछा था, "दादाजी जमींदारो के पास इतना पैसा कहाँ से आता है ?" 
दादाजी ने ठंडी सांस भरकर जवाब दिया था ,"बेटा गरीबो का खून बहुत कीमती होता है अमीर चूसते हैं तो सोना बन जाता है। "खून सोना कैसे बनता है वह समझ न सका था। 
माल से बाहर आते हुए उसकी नज़र सड़क किनारे रेहड़ी लगाये खड़े मैले कुचैले आदमी पर पड़ी। दो अौरतें उससे पाँच रुपये के लिए मोलभाव कर रही थीं। उसने एक नज़र मॉल पर डाली दूसरे ही पल खून का सोना बनना , समझते हुए वह शहरी जमींदारों की संख्या का अनुमान लगाता घर की ओर चल दिया। 
कविता वर्मा

Friday, September 5, 2014

पत्थरों में फूल

 
छोटे से गाँव की छोटी सी सीमा सी ही तो सोच थी उसके माता पिता की जब उन्होंने आठवी के बाद उसे आगे पढ़ाने से मना  कर दिया था। किसी तरह खुद को बाल विवाह की त्रासदी से बचा कर वह शहर भाग गई थी। कितनी जद्दोजहद कितने संघर्ष के बाद वह अपनी पढ़ाई पूरी कर पाई। माँ बाबा का लाड पीछे खींचता ज्ञान की रोशनी आगे। पत्थर ही तो कर लिया था उसने अपने मन को जिसपर प्यार का कोई अंकुर न फूटने पाये सारे नाते तोड़ दिए ताकि उन पहाड़ों से , ताकि अपना सर ऊँचा उठा सके, लेकिन पहाड़ों से ऊँचे पत्थर हो सके है भला ?
आज पत्थरों को भी पहाड़ों की गोद याद आ गई मन दौड़ कर वहाँ पहुँचा लेकिन वक्त के थपेड़ों ने सब छितरा दिया। बचे है तो सिर्फ खंडहर वह अपनी रुलाई ना रोक पाई। समझ नहीं पा रही है ऊपर उठने की चाह गलत थी या आगे बढ़ने की। बेड़ियाँ तोड़ने की या नई मंजिल पाने की ? 
सूनी आँखों से एक बार फिर देखा पत्थरों में भी कोपले फूटी हुई हैं। उसके होंठों पर एक मुस्कान आई एक नए संकल्प के साथ वह उठ खड़ी हुई।  
कविता वर्मा 

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...