Sunday, October 26, 2014

इरादा

उसकी सारी कोशिशे सारी जिद अनसुनी कर दी गईं। लाख सिर पटकने पर भी उसकी माँ ने उसे तैरना सीखने की अनुमति नहीं दी। मछुआरे का बेटा तैरना ना जाने , बस्ती के लोग हँसते थे पर वो डरी हुई थीं। ये समुन्द्र उनके जीवनसाथी को निगल चुका था अब वो अपने बेटे को उसके पास भेजने से भी डरती थीं।उसके साथी बच्चे जब लहरों की सवारी करते वह गुमसुम सा उन्हें देखा करता। एक दिन शायद समुन्द्र ही उसकी उदासी से पिघल गया और ऐसा बरसा कि उसके आँगन तक पहुँच गया। उसने भी कहाँ देर की कूद पड़ा उथले पानी में और लगा हाथ पैर चलाने। समुन्द्र और मछुआरे का मिलन हो ही गया। 
कविता वर्मा

Friday, October 10, 2014

जमींदार


मॉल में घूमते हुए चकाचौंध देखते उसके मुँह से एक आह निकल गई। कितना पैसा होता है इन शहर के लोगो के पास। 
वैसे तो गाँव में भी कुछ लोगो के पास बहुत पैसा है। उसे गाँव के जमींदार के ठसके याद आ गए। 
बचपन में एक बार उसने अपने दादाजी से पूछा था, "दादाजी जमींदारो के पास इतना पैसा कहाँ से आता है ?" 
दादाजी ने ठंडी सांस भरकर जवाब दिया था ,"बेटा गरीबो का खून बहुत कीमती होता है अमीर चूसते हैं तो सोना बन जाता है। "खून सोना कैसे बनता है वह समझ न सका था। 
माल से बाहर आते हुए उसकी नज़र सड़क किनारे रेहड़ी लगाये खड़े मैले कुचैले आदमी पर पड़ी। दो अौरतें उससे पाँच रुपये के लिए मोलभाव कर रही थीं। उसने एक नज़र मॉल पर डाली दूसरे ही पल खून का सोना बनना , समझते हुए वह शहरी जमींदारों की संख्या का अनुमान लगाता घर की ओर चल दिया। 
कविता वर्मा

Friday, September 5, 2014

पत्थरों में फूल

 
छोटे से गाँव की छोटी सी सीमा सी ही तो सोच थी उसके माता पिता की जब उन्होंने आठवी के बाद उसे आगे पढ़ाने से मना  कर दिया था। किसी तरह खुद को बाल विवाह की त्रासदी से बचा कर वह शहर भाग गई थी। कितनी जद्दोजहद कितने संघर्ष के बाद वह अपनी पढ़ाई पूरी कर पाई। माँ बाबा का लाड पीछे खींचता ज्ञान की रोशनी आगे। पत्थर ही तो कर लिया था उसने अपने मन को जिसपर प्यार का कोई अंकुर न फूटने पाये सारे नाते तोड़ दिए ताकि उन पहाड़ों से , ताकि अपना सर ऊँचा उठा सके, लेकिन पहाड़ों से ऊँचे पत्थर हो सके है भला ?
आज पत्थरों को भी पहाड़ों की गोद याद आ गई मन दौड़ कर वहाँ पहुँचा लेकिन वक्त के थपेड़ों ने सब छितरा दिया। बचे है तो सिर्फ खंडहर वह अपनी रुलाई ना रोक पाई। समझ नहीं पा रही है ऊपर उठने की चाह गलत थी या आगे बढ़ने की। बेड़ियाँ तोड़ने की या नई मंजिल पाने की ? 
सूनी आँखों से एक बार फिर देखा पत्थरों में भी कोपले फूटी हुई हैं। उसके होंठों पर एक मुस्कान आई एक नए संकल्प के साथ वह उठ खड़ी हुई।  
कविता वर्मा 

Sunday, July 13, 2014

जिंदगी की ताल

जिंदगी की ताल 
ऐय लड़कियों सही संझा घर से बाहर ना निकरो ,ज्यादा जोर से न हँसों , आग लगे तोहरे गले में जब देखो फूटे बाँस सो बजत रहत है ,पाँव में तो घूमर पड़े हैं सीधे एक जगह बैठो नहीं जात दिन भर नचती रहती हो। गाँव के हर घर में सुबह से शाम तक हर लड़की यही बातें सैकड़ों बार सुन लेती थी। और बातें सुनाई भी क्यों ना जाएँ आये दिन तो खेत खलिहानों की मेढ़ पर बेटियों की आबरू लूटी जाती थी। पता नहीं ये दरिंदे खेत से ही पैदा हो कर खलिहानों में ही कहाँ गायब हो जाते थे। कभी लड़की की जिन्दा लाश मिलती तो कभी किसी पेड़ से लटकी हैवानियत की दास्ताँ मिलती।
लड़कियों का घर से निकलना पढ़ना लिखना सब बंद हो चुका था .हर तीसरे घर में जिंदगी को लाश की तरह ढोती और लाश बनने से डरती जिंदगियाँ सिसक रहीं थीं। तीज त्यौहार शादी ब्याह सभी तो डर के साये में गुजरते थे।
एक दिन कुछ जिन्दा लाशों ने खुद में दबी पड़ी चिंगारी को फूंक मार कर सुलगाया और प्रण किया की अब और नहीं। नन्ही कलियों को खिलने खिलखिलाने से अब नहीं रोका जायेगा। हम इनकी रक्षा करेंगे उस दिन जब इन लाशों में प्राण फुंके इनके हाथों में चूड़ियों की जगह बंदूकें आ गई कई कद्दवारों के हौसले पस्त हो गए। जिस तरह दरिंदे हवा में घुल जाते थे उसी तरह ये रक्षक हवा से प्रकट होने लगे। जिंदगी ने पैर में घुंघरू बाँध लिए जीवन की सुरीली तान से गलियाँ गूँज उठीं।
कविता वर्मा

Monday, July 7, 2014

सपनों के परिंदे


मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ जी चाहता है तुम्हे अपनी पलकों में छुपा कर रखूँ सिर्फ मैं ही तुम्हे देखूँ और कोई ना देख सके। तुम्हारी नीली आँखों में सिर्फ मेरा ही अक्स हो सिर्फ मेरा। तुम भी मुझे इतना ही प्यार करती हो न ?
उसके प्यार के इस इज़हार में उसकी भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। प्यार तो मैं भी करती हूँ लेकिन क्या सच में इतना ? मैं तो ऐसा कुछ नहीं सोचती तो क्या मेरा प्यार कुछ कम है ?जाने क्यों एक अपराध बोध सा भर गया था मुझमे। तुमने फिर मुझे झकझोरा था बोलो ना।  मैं अभिभूत सी तुम्हारी बाँहों में समां गई थी खुद के भाग्य पर इठलाती।  अपने प्यार का विस्तृत आसमान पा कर मेरे सपनों के छोटे छोटे परिंदे पंख फड़फड़ाने लगे।  तुम्हारे प्यार का स्वर्ण महल मुझे खूब भाया और मैं उसमे खो गई। मेरे सपनों के परिंदे मुझे खुश देख कर कुछ समय तक अपनी उड़ान की आकांक्षा को मन के कोने में दबाये बैठे मुझे निहारते रहे  लेकिन कब तक ?
धीरे धीरे एक एक करके उन्होंने पंख फड़फड़ाने शुरू किये उनकी उड़ने की बैचेनी ने मुझे भी बैचेन कर दिया। मैं भी तो उन स्वप्न परिंदों के साथ उड़ना चाहती थी लेकिन तुम्हारे प्यार ने मुझे कैद कर लिया था कुछ इस तरह की उड़ाना तो दूर अपने पंख फैलाना भी मुश्किल था।  अब ये बैचेनी सही नहीं जा रही थी एक तरफ तुम्हारा प्यार था जिसने मुझे बाँध रखा था तो दूसरी तरफ मेरे सपने और दोनों का साथ तुम्हे मंजूर न था। लम्बी कश्मकश के बाद आखिर एक दिन मैंने सपने के हर परिंदे को आसमान देने की ठान ली।
कविता वर्मा  

Monday, June 30, 2014

नेपथ्य

नेपथ्य 
तेल चाल उखड़ी सांसे थकित तन और डूबता मन लिए वह चला जा रहा था कहाँ खुद भी नहीं जानता। उदासी ज्यादा गहरी थी या अन्धकार ये सोचने का ध्यान कहाँ था। आगे रास्ता है या नहीं ये समझने की कोशिश ही कहाँ की बस चलता रहा मानो मन की गति को मात देने भाग रहा हो बिना रुके बिना सोचे। मन छले जाने से व्यथित था या कुछ न कर पाने से ये भी तो नहीं पता। जीवन के झंझावातों से थक चुका था वह और अब तो उसके पैरों के नीचे से जमीन ही छीन ली गई थी। मन की गति ने थका दिया तो पैरों की गति अपने आप थम गई सामने अपार विस्तार सागर लहरा रहा था। लहरें किनारे पर सर पटक पटक ना जाने किस परेशानी को सुलझाने की कोशिश में लगी थीं।
किनारे खड़ा प्रकाश स्तम्भ पूरी ताकत से दूर तक रौशनी बिखेर रहा था वह वहीँ किनारे बैठ गया। लहरों पर पड़ती प्रकाश किरणे झंझावातों के कारण द्विगुणित हो कर ज्यादा चमक बिखेर रही थीं। बादलों की कालिमा के नेपथ्य में रोशनी की चमक कई गुना बढ़ कर ज्यादा दूर तक भटकों को राह दिखा रही थी।
इस विचार ने मानों उसके मन को प्रकाशित कर दिया।

Thursday, June 19, 2014

बलि

 आज ग्यारह तारीख हो गयी तनख्वाह नहीं मिली कर्मचारियों में बैचेनी थी धीमे स्वर में सुगबुगाहट फ़ैल रही थी लेकिन कोई खुल  कर सामने नहीं आ रहा था। विजया के मन में भी भारी उथल पुथल चल रही थी। आज सुबह ही उसने पति से कुछ पैसे मांगे थे जिसके बदले उसे झिड़की सुनने को मिली थी और मिले थे जरूरत से काफी कम रुपये एक एहसान सा जताते हुए। उसका मन विद्रोह कर उठा इच्छा तो हुई पैसे वापस कर दे लेकिन उसके बाद जो तूफ़ान उठ खड़ा होता उसे टालना ही ठीक था इसलिए चुपचाप रख लिए। 
हमेशा के इस अपमान से छुटकारा पाने के लिए ही वह नौकरी करने निकली थी सोचा था जब नौकरी करेगी तो उसके हाथ में खुद के कुछ पैसे होंगे और वह सम्मान से जीने की उम्मीद तो क्या करती लेकिन हाँ उस हद तक तिरस्कार से शायद बच सकेगी। 
 लेकिन इस नौकरी में जहाँ लगभग सभी महिला कर्मचारी है उनको उनकी मेहनत का पैसा देने में भी कोताही। 
छुट्टी से कुछ ही पहले एक एक को बुला कर तनख्वाह दी गयी लेकिन वह तय शुदा से काफी कम थी। विजया  के मन में असमंजस गहरा गया क्या करे इतने इंतज़ार के बाद मिले इन पैसों पर अपने सम्मान को कुर्बान कर के इन्हे रख ले या अपने आत्म सम्मान पर कुछ दिनों के लिए अपनी सहूलियतों की बलि चढ़ा दे ? 
कविता वर्मा 

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...