Tuesday, June 28, 2011
कुछ ....
Tuesday, June 21, 2011
किन्नर
- आज़ादी के इतने साल बाद भी क्या इस तरह की जबरिया वसूली के खिलाफ कोई कानून नहीं बन पाया है?
- जनगणना में जाती के नाम पर इतना बवाल होता है तो निश्चित ही किन्नरों की जनसँख्या भी पता की जाती होगी ,क्या कभी किसी सरकार ने इस विकृति के साथ पैदा होने वाले बच्चों की संख्या और इनकी जनसँख्या के तालमेल को जानने की कोशिश की है? (ऐसी बातें अक्सर सुनाने में आती है की बच्चों को उठा कर ओपरेशन कर उन्हें विकृत बने जाता है.)
- आज जब सबके लिए पढ़ने और रोजगार के लिए सामान अवसर है फिर इनके रोजगार की जानकारी क्यों नहीं ली जाती?
- इनकी संपत्ति का कोई ब्यौरा लिया जाता है और उस कमाई का जरिया जानने की कोशिश की जाती है?
- जब कानून सबके लिए एक सामान है फिर किन्नरों के लिए क्यों नहीं ? इनके अपराध के लिए इन्हें जेल में क्यों नहीं रखा जा सकता?
- आज़ादी के इतने साल बाद भी अभी तक किसी ही पार्टी को इन्हें भी मुख्य धारा में जोड़ने की सुध क्यों नहीं आयी?
- इनके लिए रोजगार के अवसर जुटाने के लिए क्या काम हुए है?
- क्या सरकार ने इनके इस लूट के धंधे को मौन स्वीकृति दे रखी है? क्या ये एक तरह का भ्रष्टाचार नहीं है?
- कब तक आम आदमी इस तरह की लूट का शिकार होता रहेगा?
Thursday, June 16, 2011
.कान्हा
रास्ते के दोनों और बड़े बड़े हरे भरे पेड़ ऐसा मनोरम दृश्य बना रहे थे की हम इंदौर वासी तो सच में अब ऐसे दृश्य को तरस जाते है.इंदौर में विकास के नाम पर पर्यावरण का जो विनाश हुआ है की दिल रो देता है. इंदौर शहर के लगभग ९० % पुराने पेड़ विकास की भेंट चढ़ गए है.शहर अब तो हालत ये है की कही छाँव के लिए ढूंढें से एक पेड़ नहीं मिलता .ऐसा लगता है शहर अनाथ हो गया सब बुजुर्गों का साया उठ गया. सारे रास्ते पेड़ों से आच्छादित सड़क की फोटो लेते रहे.कार रोक कर फोटो खींची. तभी तेज़ आंधी के साथ बारिश शुरू हो गयी ,बस फिर क्या था तड़ा तड कच्चे आम(केरियाँ) पेड़ों से गिरने लगीं.बस गाँव की याद आ गयी जब पत्थर मार कर अमराई से केरियाँ तोड़ते थे.और नमक के साथ खाते थे. ढेर सी केरियाँ बटोर ली.
Saturday, June 11, 2011
यादें
दिमाग जो होता एक डिबिया
निकाल कर देखती उसमे पड़े
विचार,भाव रिश्ते-नाते ,
यादें ,एहसास,घटनाएँ
हौले से छूकर सहलाती
संचेतना भरती उनमे
हंसती, रोती, खिलखिलाती
फिर महसूसती उन्हें
करीने से फिर रखती
छांट बाहर करती
अगड़म -बगड़म विचार
टूटे बेजान रिश्तों के तार
टीसते एहसास
खाली पड़े कोनों को भर देती
किसी सुंदर विचार से
सुनहरी यादों की गोटी किनारी से
सजा लेती डिबिया
लेकिन,
उस एक अनाम से रिश्ते
जाने अनजाने से नाम
कुछ अनबूझे से भाव ,
कुछ कसकती बातें, यादें
झाड़ पोंछ कर फिर सहेज देती
छुपा देती फिर किसी कोने में
चाह कर भी न निकाल पाती
निकाल कर भी न भुला पाती
वो बसी है दिल में कहीं गहरे
बहुत गहरे .
Thursday, June 2, 2011
"बचपन और हमारा पर्यावरण"
Saturday, May 28, 2011
रिश्वत
हर न्यूज़ चैनल पर अन्ना हजारे के अनशन की खबर थी. पूरा देश आंदोलित हो उठा था नेहा ने घडी पर नज़र डाली .११ बज गए विवेक अभी तक नहीं लौटे .बच्चे खाना खा कर सो गए .नेहा ने टी. वी बंद कर दिया और अखबार खोल कर बैठ गयी .अखबार में भी वही खबरें .एक बुजुर्ग का यूं आवाज़ उठाना ..वह अभिभूत हो उठी .सच है आवाज़ तो उठानी ही होगी .
नेहा के मन में कुछ कुलबुला गया .आज विवेक से बात करूंगी .ये रोज़ रोज़ ऑफिस के बाद यार -दोस्तों के साथ बैठना ,खाना -पीना और देर से घर आना,बच्चों से तो मिलना ही नहीं होता.घर के लिए भी तो उनकी जवाबदारियाँ है .
विवेक के आने पर वह चुप ही थी ,पर मन में विचार उबल रहे थे .उसकी चुप्पी को भांपते ,बिस्तर पर बैठते विवेक ने उसके हाथ पर दस हजार रुपये रखे और कहा -तुम बहुत दिनों से शोपिंग पर जाने का कह रही थीं न.ऐसा करो कल सन्डे है तुम बच्चों को लेकर चली जाओ ,में छोड़ दूंगा मॉल में .तुम कहो तो में भी चलूँ ,पर तुम्हे पता है में बोर हो जाता हूँ.२-३ घंटे सो लूँगा में तब तक. और हाँ अपने लिए दो -तीन बढ़िया साड़ियाँ ले लेना .पैसों की चिंता मत करना और लगे तो में दे दूंगा .
और नेहा बिना कुछ कहे भाव-विभोर हो कर विवेक के आगोश में समा गयी.
नईदुनिया( इन्दोर) नायिका में २५ मई २०११ को प्रकाशित .
Thursday, May 26, 2011
रांग नंबर
अभी कुछ दिनों पहले जो हुआ सो आपसे शेयर करती हूँ . एक फ़ोन आया मोबाइल पर नम्बर नया था.फ़ोन उठाया हेल्लो..
आप कौन?कहाँ से बोल रहे है?वहां से आवाज़ आयी.
आपने कहाँ लगाया है?किस्से बात करनी है?
आपसे बात करनी है ?
में कौन?मेरा नाम बताइए यदि मुझसे बात करना है तो.
आप ही बता दीजिये.
अरे जब आपको बात करना है तो आपको मालूम होगा न.
हमें तो आपसे बात करना है.
आप कौन बोल रहे है?
राज .
कौन राज ?आपको ये नम्बर कहाँ से मिला?में आपको नहीं जानती.
आपने ही दिया है ये नंबर तो.
मैंने तो नहीं दिया.
फिर हमारे पास कैसे आया?
अरे मुझे क्या पता कैसे आया? वैसे मेरे पास फ़ोन बहुत कम ही आते है और रोंग नंबर तो बिलकुल ही नहीं. इसलिए थोडा मजा भी आ रहा था बात करने में. (वैसे भी छुट्टियों में थोडा बोर हो रही थी.)
आपने ही दिया है .
नहीं मैंने नहीं दिया. आपको बात किससे करनी है? आपसे. अब बाते दुहराने लगी तो मैंने फोन नीचे रख दिया. सोचा थोड़ी देर में खुद ही रख देगा जो भी है.फ़ोन बंद हो गया. एक मिनिट बाद फिर घंटी बजी वही नंबर. फ़ोन काट दिया मैंने. घंटी बार बार बजती रही तो सोचा क्यों न फ़ोन उठा ही लूं. जब पैसे लगेगे तो खुद ही फ़ोन करना बंद कर देगा.इस बार फ़ोन उठा कर फिर नीचे रख दिया. ४-५ बार ऐसा होने पर फ़ोन आना बंद हो गए. राहत की साँस भी न ले पाई थी की २ घंटे बाद फिर वही नंबर अब जब मैंने फ़ोन उठाया तो वहां से फ़ोन पर कोई आवाज़ नहीं.मतलब फ़ोन लगाओ और बात न करो,हंसी भी आयी कितना बेवकूफ है पैसे तो उसी के लग रहे है. खैर मैंने ध्यान नहीं दिया.मिस काल आते रहे. शाम को पतिदेव के सामने आया तो उन्होंने फ़ोन करने वाले को डांट दिया.
दूसरे दिन कान्हा जाना था. रास्ते में करीब ५० फ़ोन आये.हर बार मैंने फ़ोन उठाया बस एक ही बात आपसे बात करना है.एक बार कह भी दिया हाँ करो क्या बात करना है?तो फिर चुप. थोड़ी देर तो मनोरंजन समझ कर ये खेल चलता रहा फ़ोन इसलिए उठाये ताकि रिकॉर्ड में आ जाये,कितनी ही बार फ़ोन गाड़ी के स्पीकर के सामने रख कर उसे गाने भी सुनवा दिए.अंततः जब बोर हो गए तो फिर पतिदेव की शरण ली (वैसे वो शादी में मेरे सुख दुःख में साथ निभाने की कसम खा कर बुरी तरह फंसे है)उन्होंने फिर जोर से डांट लगाई फिर फ़ोन बंद हो गए.
कान्हा में ३-४ दिन प्रकृति की गोद में बड़े सुकून से बीते .जय हो अम्बानी जी की वहां बाकी सभी मोबाइल कंपनियों के नेटवर्क थे बस रिलायंस का ही नेटवर्क नहीं था. खैर वापसी में फिर ये सिलसिला शुरू हुआ. पर इसबार फ़ोन आता और कहा जाता आप फ़ोन लगाओ मेरे पास बेलेंस नहीं है .एक बार तो उसे कह भी दिया की तुम तो एक ही दिन में फोकटिया हो गए. पर जब यहाँ से फ़ोन नहीं लगाया तो बेचारा मायूस हो गया.और फ़ोन नहीं आये.
एक दिन में ७०० किलो मीटर गाड़ी चला कर जब घर पहुंचे नीद से पलकें मुंदी ही थी की रात दो बजे फ़ोन की घंटी बजी फिर वही नंबर वही बात ,झुंझला कर सेल ऑफ कर दिया. पर ये निश्चित कर लिया की इसकी शिकायत करना ही होगी. दूसरे दिन सुबह उठते ही पुलिस के सेल "वी केयर फॉर यु "के नाम एक शिकायती पत्र बना कर भिजवाया. और फ़ोन आना बंद हो गए. अरे अभी तो कार्यवाही शुरू भी नहीं हुई होगी ,शायद बेचारे के पास बेलेंस ख़त्म हो गया. अफ़सोस भी हुआ उसकी शिकायत नहीं करना थी. ३ -४ शांति से गुजरे एक रात १२ बजे पलकें मुंदी ही थी की फ़ोन की घंटी ने बुरी तरह चौका दिया. कोई नया नंबर था .कौन?किससे बात करना है?
आपसे .
आप कौन?आपको नम्बर किसने दिया ?
आपने ही दिया ......वही सिलसिला फिर शुरू.
एक तो आधी रात फिर कच्ची नींद टूटने से में भिन्ना गयी. कहा -पुलिसे में शिकायत कर दूँगी ठीक हो जाओगे. तो फ़ोन किसी और को पकडाया गया. दूसरे ने जो बोलना शुरू किया कान सनसना गए तुरंत फोन कटा और ऑफ कर दिया.बहुत देर तक नींद नहीं आयी ,और सोच लिया इस नंबर की भी शिकायत करना होगी .ये तो हद हो गयी.
दूसरे दिन नए नंबर से फिर फ़ोन आये ,फ़ोन सायलेंट पर था इसलिए उठा नहीं पाई. लेकिन एक बार सोच लिया की अब आखरी बार कोशिश कर लूं शायद समझ जाये.
खैर फोन उठाया .कौन ?कहाँ से बोल रहे हो?वहां से आवाज़ आयी .
किससे बात करना है?
संगीता से.
यहाँ कोई संगीता नहीं रहती.
आप कहाँ से बोल रहे हो?
इंदौर से.
इंदौर में कहाँ से ?
मालवा मिल से .
ये नम्बर किसने दिया ?
आपने .
मैंने तो नहीं दिया .
फिर मेरे कने (पास) कहाँ से आया ?
मुझे क्या पता?
आपने ही दिया है.
मैंने नहीं दिया.
फिर मेरे पास आया कहाँ से?
हो सकता है किसी ने गलत नंबर दिया हो,या आपने गलत नम्बर लिख लिया हो,या आपने गलत नंबर लगा दिया हो. रोंग नंबर ऐसे ही लगते है .
रात में आप ही पुलिस की धमकी दे रहे थे न.
अब बात गोल करना जरूरी थी मैंने कहा रात में आपके बाद किसने बात की थी.?
वो भैया थे पड़ोस में रहते है.
तो वो आपके फ़ोन से बात कर रहे थे. आपको पता है ये जो भी बात हो रही है फ़ोन पर सब रिकॉर्ड हो जाती है अगर पुलिस में ये नंबर दे दू तो एक घंटे में पुलिस कंपनी से आपका नाम और क्या बात हुई ,और कितनी बार फ़ोन लगे सब निकाल लेगी. फ़ोन आपका है तो फंस आप जाओगे.
लगा बात उसके दिमाग में घुस रही है.पास बैठी बिटिया ने कंधे उचकाए ,क्या मम्मी उसे समझा रही हो.पर मेरे दिमाग में चल रहा था आज मुझे तो कल किसी और को परेशान करेगा इसलिए बात समझाना जरूरी है. और ये तो दोस्ती में पिसने वाला है.
देखो में वो नहीं हूँ जिससे आपको बात करना है और अगर किसी ने ये नंबर आपको दिया है तो गलत दिया है.आपके दोस्त ने ५० फ़ोन किये उसका नम्बर मैंने पुलिसे को दे दिया है अब अगर आप भी परेशान करोगे तो आपका नंबर भी देना पड़ेगा .और पुलिसे सब पता कर लेगी.
अच्छा ,आंटी जी गलती हो गयी अब नहीं करेंगे फ़ोन.माफ़ कर दो.मैंने कहा हां अब ध्यान रखना किसी को भी फोन पर परेशान नहीं करना ठीक है.
ठीक है आंटी जी .
अब स्कूल चाहे छुट्टी देदे में सिखाये बिना नहीं रह सकती तो में क्या करूँ .
प्यार के दो बोल
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समाज सेवा प्रकोष्ठ का तीन दिवसीय बाल व्यक्तित्व विकास शिविर देवास जिले के गंधर्व पुरी में लगा। आज दूसरा दिन था और मुझे बच्चों को कहानिय...
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