Sunday, March 6, 2011

शोर

शोर -शोर- शोर आज की जीवन शैली में ये हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है...बहुत पहले मनोज कुमार की एक फिल्म आयी थी शोर जिसमे नायक को शोर से बहुत नफरत होती है इतनी की वह हमेशा शोर से परेशान रहता है ,उसके कान तरसते है तो अपने बेटे की आवाज़ सुनने को जो बोल नहीं सकता ,उसका ऑपरेशन होता है पर उसी दिन नायक का एक्सीडेंट होता है और वह सुनने की क्षमता खो देता है...

आज हम में से कितने ही इस शोर से परेशान रहते है और न जाने कितने ही इस शोर को सुनकर भी नज़र अंदाज कर देते है. अब तो लगता है शायद हम में से कितनो ने शांति या कहे निशब्दता की आवाज़ ही नहीं सुनी होगी ,उसे महसूस ही नहीं किया होगा . आज से करीब १० साल पहले जब हमने शहर से दूर मकान बनवाना शुरू किया तब यहाँ आ कर शोर से दूर इस निशब्द स्थान को महसूस करने का मौका मिला . लेकिन इसे निशब्द भी कहना उचित नहीं होगा इसे सन्नाटा भी नहीं कहा जा सकता ,क्योंकि आवाज़ तो यहाँ भी थी .हवा के चलने की आवाज़, पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ ......जब भी मोबाइल फ़ोन पर बात करते सामने वाला जरूर पूछता कहाँ से बोल रहे हो बहुत तेज़ हवा चलने की आवाज़ आ रही है. पर वो आवाज़ शोर नहीं थी वह आवाज़ प्रकृति के सानिध्य का एहसास करवाती थी.

जब हम यहाँ रहने आये तब शायद शोर की आदत के कारण जो बहुतों के आसपास होने का एहसास भी करवाता है भले ही उसके बावजूद भी हम अकेले ही क्यों न हो पर ये शोर शायद हमारा संबल बन जाता है . तो जब यहाँ आये इस शांति से घबरा गए थोड़ी ही देर में इतने अकेले होने का भाव मन में घबराहट पैदा करने लगा और सामान में से रेडियो निकाल कर उसे ऑन किया तब थोडा ठीक लगा.

लेकिन धीरे धीरे इस शांति की ऐसी आदत पद गयी की अगर कोई गाड़ी भी घर के सामने से निकाल जाती तो लगता कितना शोर हो रहा है. लेकिन शहर में भरने वाला शोर जब शहर की हद में सामने से ज्यादा हो गया तो धीरे ध्रीरे हमारे शांत इलाके में भी फैलने लगा सामान्यत इसका एहसास नहीं होता था पर एक बार जब किसी कारण से भारत बंद हुआ उसदिन समझ में आया इस शहर का शोर किस कदर अतिक्रमण कर के हमारे शांत इलाके में ही नहीं हमारे जेहन में भी घुस आया है और हमारी जिंदगी का हिस्सा बनने लगा है .

जोधपुर का किला देखने गए किला शहर से दूर काफी ऊंचाई पर बना है .ऊपर से देखने पर सारा शहर खिलौने जैसा लगता है .नीली छत वाले बहुत सारे घर, मकान ,दुकान, बाज़ार और वहां से उठने वाला शोर, जो किसी समुद्र की लहरों से उठने वाले शोर की तरह ऊपर उठ कर शायद अंतरिक्ष तक जा रहा था . अगर हमारे ब्रह्माण्ड में कही और जीवन है तो वो पता नहीं कैसी जीवन शैली में जीते होंगे पर अगर हमारे यहाँ के शोर की तरंगे उन तक पहुँचती होंगी तो वो परेशान जरूर हो जाते होंगे .और क्या पता शायद इसीलिए उन लोगो ने कभी हम तक पहुँचने की कोशिश नहीं की .

वैसे शोर से हमें कितना प्यार है ये समझना बहुत मुश्किल तो नहीं है . हर नया ऑडियो equipment और ज्यादा तेज़ आवाज़ देने का दावा करता है.टीवी में स्पेशल आवाज़ इफेक्ट , होम थिएटर i pod मोबाइल में तेज़ आवाज़, होर्न में नित नए प्रयोग ...हम पता नहीं क्यों इस शोर में अपने को गुम करना चाहते है इस शोर की आवाज़ में हम किस आवाज़ को अनसुना करना चाहते है अपनी ,अपनों की या अपने अंतर्मन की ?

हमने तो अब भगवन को भी इस शोर का आदि बना दिया है किसी भी मंदिर में जाइये भगवन को अपनी बात सुनने के लिए बड़े लाउड स्पीकर पर गाने भजन सुनाये बिना हमें लगता ही नहीं उन तक हमारी आवाज़ पहुंची होगी. और क्या पता इतनी तेज़ आवाज़ से उनके कानों की क्या हालत है और वो किसी भक्त की सामान्य आवाज़ सुन भी पाते है या नहीं ?? पर हम भी कम नहीं है भगवन चाहे जितना ऊँचा सुने हम उतनी ही तेज़ आवाज़ में उन्हें अपनी बात सुनवा कर ही दम लेते है. बस डर इतना ही है कही भगवन इस तेज़ आवाज़ से डर के इस पृथ्वी तो क्या स्वर्गलोक को भी छोड़ कर कहीं और न चल पड़े . और ये मेरी कपोल कल्पना नहीं है हम जहाँ जहाँ तक पहुंचे है हमने अपने शोर प्रेम को कभी नहीं छोड़ा . एक बार टी वी पर मानसरोवर गए यात्रियों के दल को देखा वहां भी लोगो ने जोर जोर से भजन गा कर हर हर महादेव की आवाजें लगा कर ही कैलाशपति तक अपनी बात पहुंचाई. उस पूरे कार्यक्रम में में यही सोचती रही काश ये थोड़ी देर के लिए चुप हो कर ध्यान लगाये तो क्या पता शायद इन्हें भगवान शिव की आवाज़ ही सुनाई दे जाये . आवाज़ बंद कर के देखने की कोशिश की पर उन लोगो का शोर कुछ इस तरह घर में भर गया था की वहां की शांति महसूस ही नहीं कर पाई.

यदि ऐसा ही रहा तो शायद एक दिन हमारे बच्चे या बच्चों के बच्चे हमसे ये पूछेंगे ये शांति होती क्या है?


Sunday, February 27, 2011

विद्या दीदी


विद्या दीदी हाँ यही तो नाम है कही किसी रिश्ते से दीदी लगती है है उम्र में मुझसे बहुत बड़ी शायद मेरी मम्मी की उम्र से कुछेक ही साल छोटी. रौबदार चेहरा माथे पर बड़ी सी बिंदिया गरजदार आवाज़ ,जब भी अपने मायके आती थी भाभियाँ सेवा में लगी रहती थी. हर काम सलीके से होना चाहिए,किसी काम में कोई कोताहि देखी और डपट दिया फिर वो भाई हो या भतीजा फिर भाभियों की तो कौन कहे. दो बेटियों और दो बेटों का भरा पूरा परिवार ,जीजाजी भी उनके आगे पीछे ही घूमते थे . यों तो वो बेटियों पर जान छिड़कती थी ,पर नियम कायदे ,रीति रिवाज़ सबके लिए एक सामान थे.

बेटियां बड़ी हो गयी तो अच्छे घर वर देख कर शादी कर दी,पर हाँ परिवार सबके भरे पूरे थे. उनके यहाँ भी हर तीज त्यौहार समारोह पर रिवाज के अनुसार आना जाना व्यव्हार करना ,कुल मिला कर बहुत परम्परावादी है विद्या दीदी.

बेटियों के बाद बेटों की बारी आयी शादी की बहुत सोच समझ कर सुंदर सुघड़ बहू धुन्धी दीदी ने जब भी मिलती करीने से सर ढके , सारे सुहाग संस्कार सजाये , हमारे जाते ही दीदी की आँख का इशारा होता और वह पैर छूने झुक जाती ,बैठ कर पैर छुओ ये क्या ऊँटों जैसे हो कर छूती हो,सबके सामने ही नसीहत देने से नहीं चूकती थी दीदी . हमारे चाय नाश्ते का इंतजाम कर के अगर बहू अंदर चली जाती तो दीदी बुलाती अरे आरती तुमने चाय पी की नहीं यही आ जाओ,लाओ सब्जी मुझे दे दो में सुधार दूँगी तुम नाश्ता कर लो. काम में उसका पूरा साथ देती ,खाने पीने पहनने ओढ़ने का पूरा ख्याल रखती पर कायदे कानून सबके लिए एक.हम तो कभी कभी बातें भी करते दीदी की बहु कैसे रहती होगी इतनी तेज़ सास के साथ .

एक दिन अचानक खबर आयी दीदी का बड़ा बेटा तीन दिन के बुखार के बाद चल बसा .डाक्टर ने आकर देखा एक इंजेक्शन लगाया अचानक हाथ पैर ऐठने लगे और कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही खेल ख़तम हो गया. मात्र २६ साल की उम्र थी बहु तो २३ की ही थी गोद में २ साल की बच्ची .कैसे अचानक हँसता खेलता संसार उजड़ गया ,रह रह कर भरे भरे हाथ ,करीने से सजी मांग,हर तीज त्यौहार पर मेहन्दी रचाई हथेलियाँ याद आती. होनी को कौन टाल सकता है.

बेटे की मौत के करीब ६ महीने बाद दीदी से फिर मिलना हुआ ,बिलकुल थकी थकी निढाल सी बाल बिखरे हुए गुमसुम सी दीदी ,बेटे से ज्यादा इस लड़की का दुःख खा जाता है मुझे ,जब भी इसे देखती हूँ रुलाई नहीं रुकती देखा ही क्या था अभी इसने ,इतनी बड़ी जिंदगी है,जब तक हम है बेटी बना कर रखूंगी इसे पर हमारे बाद..देवर है पर देवरानी कैसी आये कैसे रखे? इसके माँ-बाप ने तो कहा भी की भेज दो हमारे पास पर पोती में मेरी जान अटकी रहती है एक ही तो निशानी है मेरे बेटे की अब .

दीदी से हुई वह मुलाकात दिल भारी कर गयी . इसके बाद बहुत दिनों तक उनसे मिलना नहीं हुआ,न उनके यहाँ जाना हुआ. करीब डेढ़ साल बाद दीदी के यहाँ अचानक जाना हुआ देखा पुरानी विद्या दीदी सोफे पर बैठी है वही गरजदार आवाज़ माथे पर बड़ी सी बिंदिया सलीके से संवारे बाल. पोती के साथ हंस हंस कर खेल रही है उसकी तोतली बातों पर दोहरी हुई जा रही है. पास ही बहू भी बैठी थी करीने से ढंका सर ,हाथ भर चूड़ियाँ .सलीके से भरी मांग . हमारे जाते ही दीदी की आँख का इशारा हुआ उसने आकर हमारे पैर छुए,और पानी लेने अंदर चली गयी.

बहुत सोचा मैंने अपने बेटे की निशानी के लिए इसकी जिंदगी यों नरक तो नहीं होने देती ना? रिश्ते भी एक दो आ रहे थे पर ये भी तो मेरे बेटे की निशानी है ये भी चली जाती. फिर सोचा शादी करनी ही है तो छोटा बेटा भी तो है ना ,उससे बात की उसका मन टटोला उसे भी खूब सोच समझ लेने का मौका दिया आरती से भी बात की फिर एक अच्छे दिन मंदिर में जा कर फेरे पडवा दिए अब बस बेटा नहीं है पर उसकी सब निशानियाँ मेरे पास है . ठीक किया ना मैंने??

मैंने मौन दीदी के हाथ पर अपना हाथ रखा दिया .आज दीदी ने रीति रिवाज संस्कार सभी का सही अर्थ समझा दिया था.

Wednesday, February 23, 2011

कुकून


इस नयी सड़क पर आज पहली बार आया हूँ। शहर से दूर दोनों और पेड़ों से आच्छादित शांत सी सड़क। बिना ट्राफिक के ....गाड़ी चलने का मजा तो यहाँ है। अब अगले ३-४ दिन रोज़ यहाँ आना है । रास्ते में चार स्कूली बच्चे पीठ पर बैग लटकाए अपनी बातों में मशगूल चले जा रहे थे। अपने स्कूल के दिन याद आ गए। पता नहीं कितनी दूर है इनका स्कूल ?क्या करू इन्हें लिफ्ट दे दूं। नहीं नया रास्ता नए लोग ,फिर पता नहीं कितनी दूर हो? में बगल से आगे बढ़ गया।
अगagale ले दिन फिर वही बच्चे मिले ,पलट कर गाड़ी को देखा भी नहीं में लिफ्ट दूं न दूं की उहापोह में आगे बढ़ गया।
पापा, पता है तितली के बच्चे जब कुकून से निकलते है तो उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती है। पर अगर कोई उनकी मदद कर के कुकून को तोड़ दे और उन्हें बाहर निकाल दे तो वो जी नहीं पाते उनके पंख कमजोर रह जाते है बेटे ने बताया।
आज फिर वही बच्चे मिले अपनी धुन में मशगूल मैंने उन्हें लिफ्ट देने का नहीं सोचा ,में कुकून तोड़ने में मदद कर उन तितलियों के पंख कमजोर नहीं करना चाहता ।

Sunday, February 20, 2011

अरे मैडम.....

कहते है जिंदगी हर कदम पर कुछ न कुछ सिखाती है,और ये पाठ हमें अपनी या दूसरों द्वारा किये गए भूलों ,कामों से तो मिलती ही है जीवन में मिलने वाले लोगो के सानिध्ध्य से भी मिलती है। अपने शैक्षणिक जॉब के दौरान सबसे ज्यादा सानिध्ध्य तो बच्चों का ही रहता है और बच्चे बहुत अच्छे शिक्षक होते है बस जरूरत है उनके काम, व्यवहार, बातों को उस सकारात्मक नज़रिए से देखने की।

कुछ ही दिन पहले की बात है। दोपहर भोजन के दौरान क्लास ५ की कुछ लड़कियों को रोते हुए देखा। कारण पूछने पर पता लगा उनकी क्लास की ही किसी लड़की से लड़ाई हो गयी है ,उसने कुछ कहा है और इस वजह से एक दो नहीं पूरी ५ लड़किया हिलक हिलक कर रो रही है। अब एक लड़की लड़ाई में ५-५ लड़कियों को रुला दे तो पहला ख्याल मन में आता है ,जरूर उसने कुछ किया ही होगा...खैर उन लड़कियों को किसी तरह चुप करवा कर खाना खिलाया और में बात करूंगी इस बात का आश्वासन दिया ।

खाने के बाद उस लड़की को देखा तो अपने पास बुलाया...अभी हम उसे दिव्या कहे? इससे बात करने में आसानी होगी। खैर मैंने पूछा दिव्या क्या हुआ?
मैडम कुछ नहीं ,उसने भोले पन   से जवाब दिया ।
firनीसारी सारी साऱी  लड़कियाँ क्यों रो रही है।
अरे मैडम वो ,अरे मैडम कुछ नहीं एक ने मुझसे कहा की मैंने दूसरी लड़की को चिडचिडी कहा और जब मैंने दूसरी लड़की को बताया तो पहली वाली ने मना कर दिया अब सब मेरे पीछे पड़ गयी है।
मुझे समझ तो कुछ नहीं आया ,फिर भी मैंने कहा ,लेकिन इस बात के लिए इतने सारे लोग क्यों रो रहे है?

अरे मैडम कुछ नहीं,ये सब कहते है की में बहुत चिडचिडी हूँ ,मैंने कहा ठीक है में मान लेती हूँ की चिडचिडी हूँ ,तो क्या बहुत सारे लोग होते है। पर मैडम मैंने कहा की में अपने को बदल लूंगी । अब मैडम एक दिन में तो सब नहीं बदल जायेगा न? मैंने कहा है में अपने को बदल लूंगी...
मैडम सब पता नहीं क्यों मेरे पीछे पड़  जाते है ...में ऐसी हूँ वैसी हूँ ...तो क्या हुआ मैडम ,मैंने कह तो दिया में बदल लूंगी खुद को। अब रोना तो मुझे चाहिए इस बात पर ,और देखिये में तो रो नहीं रही हूँ और ये सब रो -रो कर तमाशा कर रही है।
में अवाक् उस लड़की का आत्म विश्वास देखती रही...किसी भी परिस्थिति को स्वीकार करने का उसका नजरिया किसी अनुभवी प्रोफेशनल से कम  न था।
दिव्या ,ये तो बहुत अच्छी बात है की तुम उनकी बातों को सकारात्मक तरीके से लेती हो और खुद को बदलने के लिए तैयार हो ,तो क्यों नहीं तुम उनसे जाकर बात करती हाथ मिलाओ और फिर से दोस्त बन जाओ।
अरे मैडम आज नहीं अभी जरा उन सबको ठंडा हो जाने दो ,आज में बात करूंगी भी न, तो कोई सुनेगा नहीं। में बाद में उनसे बात कर लूंगी। वैसे भी मैडम अगले हफ्ते मेरा बर्थ डे आने वाला है ,देखना में कार्ड दूँगी न तो सब पार्टी में आ जायेंगे।
में उस लड़की का आत्म विश्वास देखती रह गयी.उस कक्षा ५ की १० साल की लड़की का परिस्थितिओं को देखने का नजरिया ,उन्हें अपने हिसाब से ढाल लेने का विश्वास मुझे जिंदगी को नए तरीके से देखने का सबक सिखा गया।
और हम है की किसी ने कुछ कहा दिल से लगा लिया। उसने बात नहीं की सोच में डूब गए , हमसे क्या गलती हुई या दूसरों की गलती ढूँढने में लग गए ,हर बात में खुद को या दूसरों को ही दोषी मानाने लगे। जो है उसे अभी इसी वक्त सुलझाने की उधेड़बुन बात को और और उलझा जाती है और हम समझ ही नहीं पाते गलती आखिर हुई कहा?
कुछ भी कहिये इसे आप अपने नज़रिए से लीजिये पर मैंने तो भाई बहुत कुछ सीखा..और आपने?????

Wednesday, February 2, 2011

सिलसिला

हम हंस हंस के भुलाते गए उनकी ख़ताओं को
और उन्होंने हमें ही कसूरवार ठहरा दिया.....
ख़ताओं का इल्जाम ही क्या कम न था
जो सरे आम हमें रुसवा किया।
जो तुम को हो सुकून तो हम क्या गिला करे
आओ फिर ख़ताओं का सिलसिला शुरू करे....

सजा

खता जो तुमने की,
सजा क्यूँ हमको दी...
चुप से सह लेते हम सजा भी।
फिर क्यूं तुमने शिकायत की ,
सह लेंगे सभी शिकवे भी
पर जो सजा तुमने खुद को दी
सह न सकेंगे ........

Monday, January 3, 2011

अपने साथ

शीत छुट्टियाँ ...बहुत बेसब्री से इन्तेजार था इन छुट्टियों का....वाही रोज़ का काम स्कूल जाना घर आना ,स्कूल का काम घर का काम,थक गए..न न थक नहीं गए ढर्रे से उब गए...लगा अब कुछ दिन तो कुछ बदलाव मिलेगा ।
सारे कामो की फेहरिस्त मन में बन गयी आज ये कल वो ,फिर वो और फिर वो... । पहले दो दिन तो सबके साथ हँसते मस्ताते निकल गए...सबका एक साथ घर में रहना भी तो नहीं हो पाता ..इसलिए जब भी सब साथ हो सुबह का खाना साथ खाये बड़ा अच्छा लगता है । पर छुट्टियाँ तो सिर्फ मेरी थी,सबके तो स्कूल कॉलेज ऑफिस थे। मैंने सोचा चलो यही सही कही बाहर जाना तो नहीं होगा पर घर में ही रह कर अपनी पुरानी हाउस वाइफ लाइफ एन्जॉय करूंगी ।
उसके लिए सारे काम टाइम से करना भी तो जरूरी था। अब हाउस वाइफ लाइफ का ये मतलब भी तो नहीं की सारा दिन उठाई धरई में ही लगे रहो। सो सोमवार को जब सबके टिफिन तैयार हो गए सब घर से निकल गए ,थोड़ी देर इत्मिनान से बाहर धूप में ही खड़ी रही ,पैरों पर पड़ती धूप बड़ी राहत दे रही थी। देर तक घर के सामने लगाये नीम के पेड़ को निहारा ,कितना बड़ा हो गया है,अरे इसपर तो घोंसला भी बना है शायद गिलहरियों का है। हम्म तो अब ये घर से निकल कर पेड़ पर आ गयी है । कितने समझदार होते है जानवर भी और कितने ईमानदार भी जब हम यहाँ आये थे यहाँ कोई पेड़ नहीं था इसलिए ये किचन की तांड पर घोंसला बना कर रहती थी ,पर अब जब उन्हें कोई और ठिकाना मिल गया बिना कहे उन्होंने अपना ठिकाना बदल लिया। इन्सान ऐसा कर सकता है क्या? नया ठिकाना मिलाने के बावजूद भी पुराने पर अपना कब्ज़ा जमाये रखना ही उसकी फितरत है । फिर निगम शाशन प्रशाशन कोर्ट कचहरी सब कर लेंगे और फिर मजबूर हो कर ही अपना उस जगह को छोड़ेंगे जो जानते है अपनी कभी थी ही नहीं।एक लम्बी साँस लेकर में अंदर आ गयी। में भी पाता नहीं क्या -क्या सोचती हूँ ? भला इंसानों का जानवरों से कोई मुकाबला हो सकता है क्या??
फिर दिखा अपना रेडियो, अरे आज तो पुराने गाने सुनेंगे। झट से अपना विविध भारती लगाया। बच्चे तो ज्यादा देर पुराने गाने सुन ही नहीं सकते ऐसा मुंह बनाते है और में ज्यादा देर उनके पसंद के चेनल नहीं सुन पाती । खैर जल्दी जल्दी सारे काम निबटाये, आज इत्मिनान से पूजा करूंगी रोज़ तो जल्दी में सौरी भगवानजी कह कर ही भागना पड़ता है । देर तक पूजा की जाने कितने पाठ करती थी बचपन से धीरे धीरे सब छूट गये। हाथ पूजा करते है और मन घडी पर लगा रहता है ।
फिर बैठी पेपर लेकर ,हम्म आज सुबह का पेपर सुबह पढ़ना है । थोड़ी देर धूप में पीठ सेंकते हुए पेपर पढ़ा फिर सोचा अब खाना खा लिया जाये। अरे बाबा रे कितनी ठण्ड है ? खाना खा कर तो रजाई में बैठने का मन कर रहा है । सोचना क्या है कविता ? उठा ला रजाई ,और दुबक जा उसमे । थोड़ी देर खुद से नानुकुर करते आखिर रजाई उठा ही ली । अब क्या करू?सोना ....अरे नहीं सोया तो खोया॥ बस बैठे बैठे ही मन बचपन की गलियों से होते हुए सहेलियों के साथ कॉलेज के प्रांगन में पहुँच गया । खुद से ही बाते करती रही खुद ही हंसती और खुद ही अपनी बात पर नाराज़ होती। आज तो घर में कोई नहीं है कविता जो जी चाहे कर ले सबके होते तो ये बाते हो ही नहीं सकती कभी बच्चे मुंह ताकने लगते है तो कभी पतिदेव।
शाम होते सबके आते फिर वाही रूटीन शुरू। दूसरे दिन सोचा आज कुछ काम करूंगी कल तो सारा दिन यूँ ही निकल दिया। पर वाही सबके जाते पेड़ पर फुदकती चिड़ियों को देखती रही ,तो कभी गिलहरियों को । सारे काम निबटा कर आज झूले पर बैठा जाये,ये सोचते हुए बाहर निकली झूले पर बैठ कर पेपर तो हाथ में धरा रह गया और मन पहुँच गया पुरानी यादों में .किस तरह तिनका तिनका जोड़ कर ये घर बनाया है से होते हुए शादी के बाद के दिन नयी नयी नौकरी .अकेले रहने का वो दर ,बिटिया के आगमन पर अपने आप सब समझते हुए उसे बड़ा करने की जद्दोजहद। कभी हंसी आती तो कभी आँखे भर आती, पर आज भी तो घर में कोई नहीं है। पर ये क्या ये गिलहरी क्यों मुझे तक रही है ? अब ये पूछेगी क्या हो गया? पर वो तो बस थोड़ी देर टुकुर टुकुर देख कर चली गयी।

तीसरे दिन सोचा आज तो काम करना ही है छुट्टियाँ ऐसे ही निकल जाएँगी कितने सारे काम पेंडिंग है। जल्दी से काम निबटाया कहा से शुरू करते हुए टी वी ओं कर लिया । अरे ये तो हेमामालिनी की फिल्म खुशबू है .बचपन में दादी के साथ देखि थी ये फिल्म ,उसके बाद जब ११ में थी तब टी वी पर आयी थी। अब फिल्म छोड़ कर कोई काम करना तो ठीक नहीं वो भी आज जब बीच में कोई चेनल बदलने वाला नहीं है । यार ठीक है न एक दिन फिल्म देख ली तो क्या हुआ?

चौथे दिन तो सुबह से हड़बड़ी थी ,आज जरूर काम करूंगी ,फिर अब अगले ३ महीने छुट्टियाँ नही मिलाने वाली है .अब तो पेपर बनाना है फिर चेकिंग । सोचते सोचते सामान जमाते पुरानी डायरी हाथ आ गयी। पिछले साल ठंडों की छुट्टियों में एक कहानी लिखनी शुरू की थी। छुट्टियाँ ख़त्म कहानी भी वाही रुक गयी । पढ़ते पढ़ते मन में फिर कल्पनाये बानाने लगी कहानी के पात्र बोलने लगे परिस्थितियां बनाने -बिगड़ने लगी ,और वाही बैठ कर कहानी पूरी करने लगी । थोडा बहुत लिख कर सोचा उठ जाऊ पर पात्र छोड़ने को ही तैयार नहीं हुए।
इसी तरह साडी छुट्टियाँ निकल गयी । सारे काम अपने उसी स्वरुप में अभी भी है । कल से स्कूल है अरे !सारे काम बाकि है ,कुछ नहीं हुआ ...
आज स्कूल में सबसे मिल कर बहुत ख़ुशी हुई , सब पूछते रहे क्या किया छुट्टियों में ?थोड़ी देर चुप रही क्या किया छुट्टियों में सारे काम बाकी है? पर में तो खुश हूँ । बहुत खुश हूँ फिर सोचा अरे किया न । में इन छुट्टियों में अपने साथ रही यही क्या कम है ?

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...