Thursday, May 6, 2010

समय

शादी के चार ही महीने बाद अपनी गृहस्थी ले कर गाँव में जाना पड़ा नेहा को । पति की पहली पोस्टिंग ,हेड ऑफिस पर रहना जरूरी था । छोटा सा गाँव उस पर साहब का तमगा,गाँव की राजनीती,किसी के घर आना जाना नहीं होता था.घर में पड़े पड़े उकता जाती थी नेहा। तभी गाँव के स्कूल में एक अध्यापक की नियुक्ति हुई,घर के पास ही उनका घर था.उनकी भी नयी नयी शादी हुई थी, नेहा को लगा चलो कोई तो मिला जिससे दो घडी बोल-बतिया लेगी.जल्दी ही जान पहचान हो गयी,और कभी कभी रचना के घर आना जाना भी होने लगा.एक शाम नेहा अपनी सखी से मिलने के लिए उसके घर गयी पर न जाने क्या हुआ नेहा को देखते ही रचना पलटी और घर के अंदर चली गयी। अपने को अपमानित सा महसूस कर नेहा उलटे पाँव घर लौट आयी। कई दिनों तक यही सोचती रही की आखिर हुआ क्या ?रचना ने भी इसके बाद कोई सम्बन्ध नहीं रखा.वह समझ गयी जरूर किसी ने कोई गलतफहमी पैदा कर दी है।

दो साल बीत गए,एक बार पति के ऑफिस के एक कर्मचारी को देखने हॉस्पिटल जाना हुआ ,वहा जाने पर पता चला की मास्साब के ससुरजी भी भर्ती है चलती बस से गिर गए है । इंसानियत के नाते उन्हें भी देखने गए,सभी रिश्तेदार इकठ्ठे थे रचना उन्ही के साथ खड़ी थी ,देखा कर पास आयी पर कुछ बात नहीं हुई। मास्टरजी से हाल -चाल पूँछ कर वापस आ गए.अगली सुबह फिर हॉस्पिटल जाना हुआ,तो पता चला की रचना के पिताजी गुजर गए है,वहा जाने पर मास्टरजी नेहा और उसके पति को तुरंत अलग ले गए और बोले अभी रचना और उसकी माँ को कुछ नहीं बताया है आप भी अभी कोई बात नहीं करें। तब तक रचना भी वहां आ गयी,नेहा की और देख कर बोली क्या हुआ ?और नेहा की आँखों में आंसू देख कर नेहा के गले लग कर फफक कर रो पड़ी।

उसकी पीठ सहलाते हुए नेहा ने जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सीखा ,समय बड़ा बलवान है ,कब किस को किस हाल में किसके सामने खड़ा कर दे नहीं पता.

Wednesday, April 14, 2010

यशी

स्कूल में मेरी छवि एक सख्त टीचर की है,उस पर विषय भी गणित ,तो विषय की मांग है विद्याथियों की एकाग्रता ,जो इस छवि में और भी सितारे जोड़ देती है.वैसे भी इतना कुछ होता है विद्यार्थियों को बताने के लिए की फालतू बातों के लिए समय भी नहीं होता, और यहाँ वहां की बाते करना मुझे सुहाता भी नहीं है। पिछले साल की बात है कक्षा ५ की एक लड़की ज्यादातर समय स्कूल से अनुपस्थित रहती थी ,उसकी कॉपी पूरी करवाना और पिछला सबक समझाना बहुत मुश्किल होता था। वैसे भी जो बात क्लास की पढाई में होती है वो एक विद्यार्थी को बैठा कर पढ़ाने में नहीं आती.इस पर जब भी उससे बात करो वो सर झुका कर चुपचाप खडी हो जाती ,न कुछ बोलना, न जवाब देना .काफी दिनों तक वह स्कूल नहीं आयी ,फिर बच्चों से ही पता चला की वो बीमार है ।

एक दिन स्टाफ रूम में बात करते हुए उसकी बात निकली तो मालूम हुआ कि उसकी माँ उसे छोड़ कर चली गयी है और दूसरी शादी कर ली है ,वह अपने दादा-दादी और पापा के साथ रहती है.वो काफी बीमार भी रहती है.सुन कर बहुत अफ़सोस हुआ.जब वह वापस आयी तो मैंने उसका विशेष ध्यान रखना शुरू किया।

इसी बीच स्कूल में परेंट- टीचर मीटिंग थी,जिसमे में उसके पापा आये,और बड़े ही जोश से भरे कहने लगे कि अपनी बेटी को तो मैं हो पढ़ता हू और वह गणित में काफी अच्छी है ,हाँ इस साल कुछ ज्यादा बीमार रही है इसलिए थोडा पिछड़ गयी है। मैंने भी कहा ठीक है आप भी ध्यान रखिये और जो भी कठिनाई उसे होगी मैं भी ध्यान रखूंगी।

एक बार फिर वह दो दिन नहीं आयी ,मैंने पूछा यशी क्यों नहीं आयी ,किसी को पता नहीं था कि क्या हुआ .जब वह आयी तो बहुत खुश थी और पूछने के पहले ही कहने लगी ,मम मेरे पापा शादी कर रहे है मेरे लिए नयी मम्मी लायेंगे .सुन कर और उसे खुश देख कर बहुत ख़ुशी हुई .मैंने पहली बार उसे इतना खुश देखा था।ये बात उसने हर टीचर को बताई ,फिर एक दिन कहने लगी मम मैं भी अपने पापा के साथ घूमने जाउंगी वो बहुत खुश थी । उसके पापा कि शादी के पहले ही उसने बता दिया कि मैं अब १० दिन नहीं आउंगी पहले शादी में हम जयपुर जायेंगे फिर घूमने जायेंगे .मैंने भी कहा ठीक है खूब मजे करना।

४-५ दिन बाद ही वो स्कूल आयी ,चुपचाप सर झुकाए जैसे ही मैं क्लास में पहुंची बच्चे चिल्लाये मम ,यशी आ गयी,सुनकर मैं भी चौंक गयी ,अरे वो तो १० दिन बाद आने वाली थी ,मैंने पूछा शादी कैसी हुई खूब मजे किये ,उसने आँखों में आंसू भर कर कहा यस मम ,फिर?पापा मम्मी को लेकर घूमने चले गए मुझे नहीं ले गए । अरे तो क्या हुआ बेटा , तुम जाती तो तुम्हारी पढाई का कितना नुकसान होता फिर हम सब भी तो तुम्हे रोज़ याद करते थे ,है न बच्चों ?मैंने पूछा सब ने एक स्वर में कहा यस मम ।

अब यशी पहले से भी अधिक गुमसुम रहने लगी ,न उसका पढ़ाने में मन लगता न किसी से बात करती ,एक दिन मैंने उससे बात की तो बोली ,मम पापा अब सिर्फ मम्मी का ध्यान रखते है,हर समय उनके आगे पीछे रहते है, रोज़ शाम को उन्हें घूमने ले जाते है,पर मुझे कभी भी साथ नहीं ले जाते ,मैं कहती हू तो मुझे दांत देते है,मैंने कहा तुम्हारे दादा-दादी कुछ नहीं कहते ,तो उसकी आँखों में आंसू भर आये कहने लगी वो भी मुझे दांत देते है । अब पापा न मुझ से बात करते है न मुझे पढ़ते है। मैंने कहा बेटा मम्मी अभी यहाँ नई है न इसलिए पापा उन्हें घुमाने ले जाते है,फिर अगर तुम रोज़ -रोज़ उनके साथ जाओगी तो पढाई कब करोगी ? इसलिए नहीं ले जाते ,फिर अब तो तुम भी बड़ी हो गयी हो ,थोड़ी पढाई खुद कर सकती हो,और अगर कोई परेशानी आये तो मुझे बताना मैं तुम्हारी मदद करूंगी । कह कर मैंने उसके सर पर हाँथ फेरा .वह थोड़ी आश्वस्त हो कर चली गयी .फिर भी उसका मन न लगा ।

स्कूल ख़त्म होने को आये,आखरी दिन यशी मेरे पास आईए और बोली ,मम मैं जा रही हू,मेरे पूछने से पहले ही उसके साथ आयी लड़कियाँ बोलने लगी मम यशी स्कूल छोड़ रही है ,क्या?? चौंक पड़ी मैं,कहाँ जा रही हो तुम ?किसी और स्कूल में ? नहीं मम इंदौर में नहीं ,पापा मुझे हॉस्टल में भेज रहे है .अंदेशा तो मुझे भी था पर इतनी जल्दी सब इतना बदल जायेगा मालूम न था। मैंने उसे बांहों में भर लिया और कहा बेटा कोई बात नहीं तुम बहुत समझदार हो वहा तुम्हे ढेर साडी सहेलियें मिलेंगी ,तुम ज्यादा मजे करोगी ,और तुम मन लगा कर पढ़ना ,जब भी इंदौर आओ यहाँ जरूर आना हमसे मिलाने .और वो चली गयी

छुट्टियों के बाद पहले दिन वो मुझे फिर मिली ,मम अरे यशी तुम ?कैसी हो बेटा ?बहुत ख़ुशी हुई उसे देख कर,मम मैं ठीक हू.क्या हुआ?मैंने पूछा,मम दादाजी को मालूम नहीं था कि मैं होस्टल जा रही हू जब उन्हें मालूम पड़ा तो उन्होंने पापा को बहुत दांता और कहा कि अब इसे कही भेजने कि बात कि तो मैं तेरी पिटाई करूंगा । पिटाई कि बात कहते हुए ख़ुशी से उसकी आँखे चमक रही थी । मुझे भी बड़ी ख़ुशी हुई ,वह फिर बोली मम नयी मम्मा प्रेग्नेंट है इसलिए पापा उन्ही का ध्यान रखते है , हाँ बेटा इस समय उन्हें ज्यादा जरूरत है न और अब तो यशी बहुत समझदार हो गयी है.यस मम इस साल मैं खुद ही पढाई करूंगी ,और अच्छे मार्क्स लुंगी ,वैरी गुड बेटा और कभी भी कोई भी परेशानी हो मुझे बताना ,यस मम ,और वो चली गयी ।

कल अच्कांक वो आयी और बोली मम ,यशी कैसी हो बेटा ?वो कुछ नहीं बोली उसने मेरी और देखा उसकी आँखों में अजीब सी उदासी थी वो चुपचाप खडी रही,फिर धीरे से उसके हांथों में हरकत हुई जैसे उन्हें ऊपर उठा रही हो मैंने अपनी बाहे फैला कर उसे समेत लिया ,और बहुत देर तक उसे सीने से लगाये रही,उसके सर और माथे पर बहुत सारा प्यार किया वह चुपचाप खडी रही फिर उसमे कुछ हलचल हुई और मैंने उसे धीरे से छोड़ दिया । उसने मेरी और देखा उसकी आँखे अब चमक रही थी उसने कहा मम मेरा games period है bye,और वह चली गयी

Thursday, April 1, 2010

करें गर्मी का सामना

गर्मी की शुरुआत होते ही कूलर ,पंखे,एसी,उसका सामना करने जुट जाते है,लेकिन गर्मी की मार से बचाना आसान नहीं है. उस पर बिजली और पानी की कमी बचे हुए हौसले भी तोड़ देती है। यहाँ गर्मी से लड़ने के कुछ आसान और आजमाए हुए तरीके है ,इन्हें आप भी आजमाइए।

(१० किलो बिना बुझा चूना, १ kg फेविकोल ,छोटी झाडू.)

*घर की छत को साफ़ कर लीजिये.बिना बुझा चुना रात में भिगो दीजिये ,सुबह उसमे फेविकोल मिलाकर साफ़ छत पर झाडू से पोत दीजिये.छत पर सफेदी होने से सूर्य-प्रकाश परावर्तित हो जायेगा ,जिससे छत गर्म नहीं होगी और घर का तापमान २-३ डिग्री तक कम हो जायेगा।

घर की खिड़कियों की दिशा देखिये,यदि उनपर सीधी धूप आती है ,तो उन पर बाहर से सफ़ेद कागज चिपका दें,कांच गर्म नहीं होंगे तो घर का तापमान कम रहेगा,और रोशनी भी आती रहेगी।

रात में घर के खिड़की दरवाजे खोल दीजिये जिससे हवा का प्रवाह बना रहेगा.यदि सीधी घर के अंदर से हो तो छत का दरवाजा खोल दें, गरम हवा बाहर निकल जाएगी.एक्सास्त फैन चालू कर दे जिससे गर्म हवा बाहर निकल जाये घर जल्दी ठंडा होगा।

इन उपायों से बिना बिजली का बिल बढ़ाये या पानी खर्च किये आप घर को ठंडा रख सकते है.

Tuesday, March 30, 2010

नियमो में कैद बचपन

मार्च आ गया इसी के साथ शुरू हो गया नया सत्र। नए सत्र के साथ ही नयी युनिफर्म्स,नए बैग ,नए शैक्षणिक कार्यक्रम के साथ ,कुछ नए और कुछ पुराने नियम । ये नियम बच्चों को कितना अनुशाषित करते है ये तो नहीं पता,पर कई नियम तो बच्चों पर लादे गए से लगते है । इनमे से कुछ नियम जो मुझे परेशान करते है उनका जिक्र यहाँ करती हूँ । (यहाँ बता दूं की जिक्र पब्लिक स्कूलों का हो रहा है )।
* मोटी-मोटी युनिफर्म्स जिनका कोलर बैटन बंद होना जरूरी है।
*कमर पर बेल्ट होना चाहिए जो ढीला या लटका ना हो.( चाहे बच्चे की कमर पसीने से गीली हो जाये।
* गर्मी में भी पूरे दिन जूते -मोज़े पहनना जरूरी है।
*गले में ताई होना जो उन्हें पब्लिक स्कूल का होने की पहचान देती है।
* क्लास में संन्मैका का फर्नीचर जिस पर उन्हें सारा दिन बैठना है,दो पेरिओद के बीच में उठ कर घूम नहीं सकते,
चाहे उनके बम्स पसीने से भीग जाये या दर्द करने लगे।
*दो पेरिओद के बीच-बीच में पानी पीने या बाथरूम जाने की की मनाही,आखिर उन्हें अपने पर नियंत्रण रखना जो सीखना है।
*एक नियम है हाथों को पीछे बांध कर चलाना,मुझे इसका ओउचित्य आज तक समझ नहीं आया .(मुझे तो लगता था की हाथों का मूवमेंट चल को आसान बनता है) ।
*इसी तरह के और भी कई नियम होंगे जो आपके नौनिहालों को परेशां करते होंगे ,उनका जिक्र करके इन्हें बदने की दिशा में कदम बढ़ाये।

Saturday, February 27, 2010

होली

आज ईद है पर हमारे स्कूल में छुट्टी नहीं थी.सभी को गुस्सा आ रहा था.वैसे भी आज स्कूल का आखरी दिन था.२ मार्च से परीक्षाएं हैं । बच्चे भी पढ़ने के मूड में नहीं रहते। सभी सोच रहे थे की आज छुट्टी होती तो कितना अच्छा होता। कल घर जाते हुए सभी के मुह पर एक ही बात थी ,अरे यार!कल भी आना है। फिर भी हमने निश्चय किया ,की आज सब चटकीले रंगों की साड़ियाँ पहन कर आयेंगे।

आज स्कूल भी आधे दिन का था इसलिए बच्चे भी कम आये थे,और आखरी दिन था इसलिए वे भी पढ़ने के मूड में नहीं थे। सारा दिन टीचेर्स को थेंक्यु देने का सिलसिला चलता रहा । बच्चों ने पूछा भी आज क्या खास है सभी मेम साड़ी पहन कर क्यों आयी है? (हमारे यहाँ टीचेर्स सलवार सूत भी पहनती हैं) तो हमने कहा ,की आप को गुड लक कहने । बच्चे भी बड़े खुश हुए।

बच्चों की छुट्टी के बाद हमारी मीटिंग थी । मीटिंग चाहे कैसी भी हो सभी का मुंह बन जाता है । पर खैर जाना तो था। शुक्र है ज्यादा लम्बी नहीं थी तो हम जल्दी ही फुर्सत हो गए ।

मीटिंग के बाद मैं भागी और पर्स में से गुलाल की पुडिया निकाली और सभी के माथे पर टीका लगाया ,और होली है का धमाल मचाया। गुलाल लगते ही सब होली की मस्ती में आ गए और सबने खूब गाने गए,और डांस किया। फिर तो माहौल ही बदल गया। हंसी- मजाक ,ढेर साड़ी गपशप,और आगे भी चाहे छुट्टी मिले या न मिले ,इसी तरह खुश रहने का वादा भी सभी ने किया ।

तो इस तरह चुटकी भर गुलाल ने सभी के मन से छुट्टी न मिलाने का मलाल मिटा दिया ,वहीँ सब को साथ बैठ कर हंसने -बोलने का मौका दिया ।

तो इस होली आप भी न आलस कीजिये न कंजूसी लगाइए टीका गुलाल का अपनों के माथे पर और हो जाइये सराबोर होली की मस्ती में ।

होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ !!!!!!

Wednesday, February 17, 2010

स्त्री मूल्य


स्कूल से घर आते समय रास्ते पर भीड़ देखी,तो रुक कर लोगो से पूछा ,क्या हुआ?पता चला पास ही रहने वाले आदिवासी परिवार की एक लड़की को किसी लडके ने मोबाइल पर फोन किया और मिलने के लिए बुलाया.उस लडके को लड़की के घरवालों ने पकड़ लिया और अब उसकी धुलाई हो रही है। वह परिवार काफी दिनों से वहा रह रहा था ,और उस लड़की को भी मैं अच्छे से जानती थी ,इसलिए मैं भी उसे देखने वहा चली गयी । वहा जा कर देखा की जिस लडके ने फ़ोन किया था वह तो भाग गया पर उसका दोस्त पकड़ में आ गया,अब उसकी पिटाई हो रही थी.किसी तरह उसकी पिटाई बंद करवाई और उसके घरवालों को फोन करने को कहा। तभी लड़की का मामा आ गया और उसने भी लडके को ४-६ लात घूंसे जमा दिए आखिर लड़की की इज्जत से उनकी इज्जत है। बात करने पर पता चला की लड़की ने फ़ोन नंबर अपनी सहेली को दिया था और उस सहेली से उसके भाई ने ले लिया।
दूसरे दिन से लड़की का स्कूल जाना बंद हो गया,घर से निकलना बंद हो गया,सभी ने उसके माँ-पिताजी को समझाया ,लड़की है पढ़ लिख जायेगी तो बाद में उसका ही भला होगा पर पिता की चिंता थी लड़की के पढ़ने से उसका भला होगा जब होगा , पर अगर लड़की किसी के साथ भाग गयी तो उनका इतने साल उस पर लगाया पैसा डूब जायेगा। (भील-भिलालों में शादी पर लडके को स्त्री मूल्य देना पड़ता है )।

और मैं सोचने लगी उस लड़की के लिए स्त्री मूल्य जब मिलेगा तब मिलेगा पर आज स्त्री (लड़की)होने का जो मूल्य वो चूका रही है वह तो इस जनम में वसूल होने से रहा

Thursday, February 4, 2010

दूध और मलाई


बचपन की जब यादे आती है तो याद आती है वे छोटी मोती शरारतें ,लड़ना झगड़ना,और छोटी मोटी गुस्ताखियाँ,जो उस समय निच्छल मन से की गयी हरकतें थी.बात जब की है जब हम रतलाम में रहते थे.न्यू रोड पर एक बड़ी सी बिल्डिंग जिसमे कई सारे किरायेदार रहते थे.उनका दूध,पेपर,पानीवाला,साझा और हर घर के सुख-दुःख साझे। दिन में सभी ओरतें गेलरी में बैठ जाती थी और घर के तमाम काम मिलबांट कर चुटकियों में हो जाते थे। वही बैठ कर घर गृहस्थी की तमाम समस्याओं का समाधान हो जाता था।
इन्ही दिनों मम्मी बहुत परेशान रहती थी कारण था दूधवाला दूध बहुत पतला ला रहा था.उसमे से मलाई नहीं निकलती थी जिससे घी नहीं बन पाता था.और हर महीने घी खरीदने में घर का बजट बिगड़ जाता था।
रोज़ सुबह जब दूध वाला आता मम्मी उस पर नाराज़ होती और वो कहता भौजी मैं तो बढ़िया दूध लाता हूँ बिल्डिंग में सभी को देता हूँ पूछ लो.अब उसके सामने तो कोई कुछ नहीं बोलता था ,पर दिन की पंचायत में सभी मम्मी को समझाते की दूध तो बढ़िया आ रहा है हर पंद्रह दिन में एक पाव से ज्यादा घी निकल जाता है, और मम्मी थीं की उस दूध वाले को बंद कर दूसरे दूधवाले की बंदी लगाने को तैयार थी .एक दिन सुबह सुबह तो मम्मी का गुस्सा सातवें आसमान पर था भैया कब से कह रहे हैं पर तुम दूध इतना पतला ला रहे हो बिलकुल मलाई नहीं उठती कल से दूध देना बंद कर दो वगैरह वगैरह ...................
मैं वही कड़ी सब सुन रही थी अब मुझे लगा आज तो भैया की खैर नहीं तो मैंने मम्मी की साड़ी धीरे से हिलाए और उनका ध्यान अपनी और देख कर कहा - मम्मी दूध वाले भैया तो अच्छा दूध देते है पर आप जब छोटू को लेने स्कूल जाती हो न तब मैं दूध पर से साड़ी मलाई खा जाती हूँ । अब इतना सुनना था की बिल्डिंग वाले सभी जोर से हंस पड़े,मम्मी चुप और दूध वाले भैया मूछों में मंद-मंद मुस्कुरा कर बोले- भौजी दूध तो हमी देंगे,और उठ कर चल दिए ।

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...