Tuesday, February 3, 2026

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक होटल में था और डिनर भी वहीं था।

शाम कार्यक्रम के बाद सभी से मिलते-जुलते होटल पहुंचे। नीचे रेस्तरां में सभी लोग बैठे थे। बुफे डिनर था इसलिए किसी का इंतज़ार नहीं था सभी अपने हिसाब से खाना शुरू या खत्म कर चुके थे जब तक हम पहुंचे।

छोटे से एक हाॅल मे एक तरफ टेबल पर डिनर लगा था। बाकी हाॅल में छोटी बड़ी टेबल लगी थीं। काउंटर पर एक युवक अतिथियों का हिसाब रख रहा था और एक लड़की फार्मल कपड़ों में बालों की टाॅप नाॅट बांधे मुस्तैदी से काउंटर पर रखे भोजन के रखरखाव खाना परोसने खाली प्लेट को उठाने रखने में अतिथियों की मदद कर रही थी।

खाने के बाद हम लोग गप गोष्ठी में व्यस्त हो गये। देर तक शेरो शायरी बतकही किस्सो और गीतों का दौर चला।

इन सब से बेखबर वह लगातार अपना काम करती रही। अतिथि आते जा रहे थे खाली डोंगो में खाना रखना उसके नीचे बर्नर जलाकर उन्हें गर्म रखना परोसना प्लेट्स उठाना टेबल साफ करना सभी काम तन्मयता से कर रही थी।

लगातार चलती गोष्ठी के बीच भी मेरा ध्यान लगातार उस पर बना रहा। रात के ग्यारह बजने को थे वह वहाँ से हटी नहीं थी पता नहीं खाना भी खाया था या नहीं लेकिन उसके काम में शिथिलता या झुंझलाहट बिलकुल नहीं थी। कुछ भी कहने पर वह बडे़ अदब से यस मैम यस सर कहकर काम करती रही।

रेस्तरां बंद होने का समय हो चला था। उसने काउंटर पर रखे खाने के डोंगो से परोसने वाली चम्मचे निकालीं बर्नर बंद किये और बारी बारी से उन्हें खाली किया।

हमारी गोष्ठी समाप्त होने तक वह काउंटर को काफी कुछ समेट चुकी थी। हम लोग उठे तब उसने सभी को गुड नाइट कहा।

कमरे में आते आते उसके बारे में सब कुछ दिमाग से निकल चुका था।

अगले दिन सुबह कार्यक्रम के लिए तैयार होकर हम रेस्तरां में पहुंचे। हमारा नाश्ता वहीं था और अचरज कि वह लड़की उस समय भी मुस्तैदी से वहाँ खड़ी थी। चेहरे पर थोड़ी थकावट थी शायद देर से सोने और जल्दी उठ जाने के कारण। रात में बनी टाॅप नाॅट कुछ ढीली होकर बिखर रही थी। मैंने कहा गुड मॉर्निंग बेटा। एक मधुर सी मुस्कान खिल उठी उसके चेहरे पर। गुड मॉर्निंग मैम ।

तुम रात में भी यहीं थीं अभी सुबह से भी यहीं हो कितने घंटे की ड्यूटी होती है?

मैम सुबह शाम ड्यूटी रहती है दिन में ब्रेक मिलता है।

ओह अच्छा। तुमने नाश्ता कर लिया?

अभी नहीं मैम।

कब करोगी भूखे पेट काम में लग गईं।

अभी करेंगे मैम। वह कुछ भीग सी गई।

नाश्ते की प्लेट लगाते मैंने पूछा नाम क्या है तुम्हारा।

कलीसिया

कलीसिया इसका अर्थ क्या होता है। नाम सुनते उत्सुकता जाग उठी।

अर्थ तो नहीं पता मैम सकुचा गई वह ।शायद कभी किसी ने नाम का अर्थ न पूछा होगा न इस ओर गौर किया होगा।

खैर जो भी अर्थ हो नाम बड़ा अच्छा है मैंने मुस्कुराते हुए उसके संकोच को दूर किया।

नाश्ते की प्लेट लगाकर मैं टेबल की ओर जाने लगी। कहाँ की रहने वाली हो? शायद नाम सुनकर यह प्रश्न अनायास कौंध गया क्योंकि यह कस्बाई नाम नहीं था।

होशंगाबाद के पास एक गांव है वहाँ के।

अरे वाह होशंगाबाद से इतनी दूर नौकरी करने आई हो?

जी मैम।

अच्छी बात है यह सुनते ही उसके चेहरे पर गर्व मिश्रित मुस्कान दौड़ गई।

होटल मैनेजमेंट में कोर्स किया होगा तुमने? यहाँ अप्लाई किया था या कैंपस सिलेक्शन हुआ था?

जी वह हमारी कंपनी हमें अलग-अलग होटल में प्लेस करती है।

मैं नाश्ता करने बैठ गई वह मुझ सहित अन्य लोगों को परोसती रही। साथ ही काउंटर का भी ख्याल रखती रही।

यहाँ होस्टल में रहती हो या अकेले।

फ्लैट लेकर रहते हैं और भी लडकियाँ रहती हैं। 

और खाना घर पर बनाती हो या यहाँ खाती हो?

जी खाना यहीं होता है लंच डिनर दोनों।

अरे वाह ये तो अच्छा है।

घर की याद आती है? मम्मी की याद आती है या लगता है कि अच्छा है अकेले हैं मम्मी की टोका टोकी डांट से दूर मैने मुस्कुराते हुए पूछा।

वह कुछ असमंजस में पड़ गई शायद सोचने लगी कि इस बात का सही जवाब दे या नहीं।

मैंने फिर कहा मेरी भी दो बेटियाँ हैं वो बाहर रहती हैं इसलिए जानना चाहती हूँ कि घर से दूर कैसा लगता है?

अब एक संतुष्टि की लहर उसके चेहरे पर आई उसे तसल्ली हुई कि प्रश्न का प्रयोजन निरापद है। सुबह जब जल्दी उठना पड़ता है और खुद चाय बनाना पड़ता है तब मम्मी की बहुत याद आती है। मम्मी के साथ रहते हैं तो वो सब कर देती हैं। अकेले तो खुद ही सब करना पड़ता है।

कितने दिनों में जा पाती हो घर?

तीन चार पांच महीने कहते वह सोच में रही जैसे हिसाब लगा रही हो कि घर गये कितना समय हो गया। छह-सात महीने में एक बार चले जाते हैं।

छुट्टी मिल जाती हैं?

उसने हाँ में सिर हिलाया। तब तक उसने मेरी खाली होती प्लेट देखकर एक इडली लाकर मुझे दे दी।

अभी कोरोना काल में यहीं थीं या घर चली गई थीं?

मैं घर पर ही थी मैम। छुट्टी लेकर गई थी तभी लाॅकडाउन लग गया।

ओह बड़ा सुकून मिला यह सुनकर। चलो अच्छा हुआ कम से कम यहाँ अकेले नहीं रहना पड़ा। उसने तसल्ली से सिर हिलाया। नाश्ता खत्म हो चुका था। उसने प्लेट उठा ली। काउंटर पर थर्मस फ्लास्क देखकर मैंने पूछा क्या पिला रही हो चाय या काफी?

वह मुस्कुराई जो आप को पसंद हो मैम चाय भी है काफी भी है।

अच्छा तब एक कप बढ़िया काॅफी पिला दो ।वह काॅफी बनाने लगी। तब तक अन्य लोग चाय दूध काॅफी लेने वहाँ आ गये और मैं भी कुर्सी पर बैठ काॅफी पीने लगी।

काॅफी खत्म कर खड़े होते एक नजर उस पर डाली वह मुझे ही देख रही थी। सौंफ लेते मैंने उससे कहा नाश्ता कर लेना बेटा और अपनी भीगी आँखें उससे छुपाते बाहर आ गई इस उम्मीद के साथ कि सभी बेटियों को ऐसे ही प्यार के दो बोल मिलें चाहे वे कहीं भी हों। 

कविता वर्मा

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...