Posts

Showing posts from May, 2014

यादों का स्वाद

बचपन में झाबुआ जिले में रहते थे वहाँ आदिवासी जंगल से टोकनी भर भर केरियाँ  लाते थे और बहुत सस्ते में टोकरी का सौदा कर जाते थे।  गाँव का बहुत लम्बा चौड़ा मकान था। एक कमरे में पापा घास का पुआल बिछा कर वो कच्ची केरियाँ उस में रख देते थे कमरा बिलकुल बंद रहता था वह कमरा बार बार खोलने की मनाही थी( उसे पाल कहते थे ) .  दो चार दिन में केरियाँ पक कर आम बन जाती थीं। सुबह सुबह पापा उसमे से पके आम निकालते और आँगन में रख देते थे। मैं और दोनों भाई तालाब में तैरना सीखने जाते थे वहाँ से आ कर तेज़ भूख लगती थी तो आम खाने बैठ जाते थे, दादी आम का रस बनाती थीं ,खाने के लिए। उसके बाद जो आम बच जाते थे उसका रस थालियों में रख कर धूप  में सुखा  लिया जाता था आम पापड़ बनाने के लिए। उसमे कुछ आम उतर (ज्यादा पक कर स्वाद ख़राब हो जाना ) जाते थे। 
उस समय एक आदिवासी नौकर पीने का पानी नदी किनारे बने कुँए से लाता था। मम्मी ने उससे कहा , ये आम किसी के यहाँ ढोर डंगर हों तो उनके यहाँ दे दो वो खा लेंगे।   उसने आम देखे और कहने लगा बाई साब ये तो अच्छे आम हैं मैं मामा लोगों (भील भीलाले ) को बेच दूँगा कुछ पैसे आ जाएँगे।  मम्मी हैरान , …

समीक्षा :'परछाइयों के उजाले '

Image
ड़ॉ वीरेंद्र स्वर्णकार निर्झर , सेवा सदन कॉलेज बुरहानपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष ने मेरे कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले ' की समीक्षा भेजी है।



समीक्षा :एक देश और मरे हुए लोग - विमलेश त्रिपाठी

कविता संग्रह - एक देश और मरे हुए लोग - विमलेश त्रिपाठी


एक देश और मरे हुए लोग 
विमलेश त्रिपाठी जी का काव्य संग्रह ' एक देश और मरे हुए लोग'  हाथ में आने से पहले ही उनकी कई रचनाओं से फेस बुक के माध्यम से रूबरू हो चुकी थी।  उनकी कविताओं के विषय और उनका प्रस्तुतीकरण कवि की व्यवस्थाओं से उत्पन्न छटपटाहट का ताना बाना खींच देता है।   पूरा संग्रह पाँच खण्डों मे बंटा है हर खंड में कमोबेश एक मिज़ाज़ की रचनाओं का संकलन है।   पहला खंड 'इस तरह मैं ' में एक आदमी के आदमी होने की मज़बूरी , जिजीविषा और कसक को उकेरा गया है। कोलकाता जैसे बड़े शहर मे रहने के बावज़ूद भी अपनी जमींन से दूर होने और उनकी यादों से जुड़े होने का नॉस्टेलजिया छलक पड्ता है।   पाठशाला का हुआ है विस्तार पास के कुऐं मे भर गई है मिट्टी / जिसके होने के निशान बाक़ी हैं मेरे अन्दर।  'एक गॉँव हूँ ' में गाँव छोड़ कर आने की मज़बूरी एक कसक के साथ उभरी है।  पत्थर बनते रहे धीरे धीरे पत्थरों बीच /सपने में कोई शहर नहीं आया क़भी  / नींद जब खुली तो हर बार गाँव से शहर आया।  लुप्त होती पर्यावरणीय चेतना ,प्रक़ृति ,पंछी का छूटता साथ , उनसे टूटते …