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डर या रोमांच

साहित्य के नव रसों में भय का अपना स्थान है। भय ,डर ,रोमांच जीवन की स्थिरता को गति प्रदान करते हैं।  हमारे यहाँ तो बहुत छोटे बच्चों में भी डर भरा जाता है ,बचपन से हौया है ,साधू बाबा पकड़ ले जायेगा जैसी बातें उनके जेहन में शायद डर से परिचय करवाने के लिए भरी जाती हैं।  बच्चों के ग्रुप में भी एकाध बच्चा तो ऐसे परिवार से होता ही है जहाँ बच्चों के सामने इस तरह की बाते करने से परहेज़ नहीं किया जाता।  
मुझे याद है डर से मेरा पहला परिचय हुआ था जब मैं शायद दूसरी या तीसरी में पढ़ती  थी। उस समय ये अफवाह जोरो से फैली थी कि कुछ लोग आँखों में देख कर सम्मोहित कर लेते है और फिर व्यक्ति उसके अनुसार काम करता है या उसके पीछे पीछे चला जाता है। बहुत डर लगा था इस बात से। 
इसके बाद भूत चुड़ैल जैसी कहानियों से परिचय हुआ ,एक कहानी तो मैंने अपने बचपन के बहुत सालों बाद किसी बच्चे के मुँह से सुनी कि एक बच्चे की माँ मरने के बाद रोज़ रात में घर आ कर उस बच्चे के लिए खाना बना कर रख जाती है। मुझे यकीन है आपमें से कईयों ने ये कहानी सुनी होगी।   इस तरह डर को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढाया जाता है।  
मम्मी बताती थीं कि उन्हें जासू…