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Thursday, June 27, 2013

रजिस्ट्रेशन या लूट ???


बारहवीं की पढाई के साथ  हो जाती है जद्दोजहद आगे की पढ़ाई की .आज के समय में कई प्रोफेशनल कोर्स हैं जिनमे बच्चे अपनी रूचि अनुसार जा सकते हैं इनमे कई जाने माने  कोर्स जैसे इंजिनीअरिंग ,मेडिकल, सी ए ,सी एस ,एम् बी ए, के बारे में जानकारी हर कहीं उपलब्ध है लेकिन फिर भी कई कोर्स ऐसे हैं जिनके बारे में जानकारी तो फिर भी जुटाई  जा सकती है लेकिन उसके लिए अलग अलग राज्यों में कोई तालमेल नहीं है .

आर्किटेक्चर कॉलेज में एडमिशन के लिए आई आई टी की में एग्जाम के साथ ही सेकंड पेपर होता है जिसकी मेरिट लिस्ट बारहवीं के मार्क्स के साथ बनती है .देश में सिर्फ दो आई आई टी हैं जिनमे आर्किटेक्चर के कोर्स हैं रुड़की और खड़गपुर जिनमे अस्सी अस्सी सीट्स हैं .आई आई टी का पहला पेपर पंद्रह अप्रेल को हुआ था और बारहवीं का रिजल्ट चौबीस मई को आ गया इसके बावजूद भी अब तक आई आई टी का रिजल्ट घोषित नहीं हुआ .इसलिए बच्चे राज्य के कॉलेज में रजिस्ट्रेशन करवाने को विवश हैं . 

इसी रिज़ल्ट पर नॅशनल कॉलेज में एडमिशन मिलेंगे .सिर्फ सात नॅशनल कॉलेज में आर्किटेक्चर का कोर्से है हमीरपुर ( हिमाचल प्रदेश ) ,जयपुर ( राजस्थान ), पटना ( बिहार), नागपुर ( महाराष्ट्र) भोपाल ( मध्य प्रदेश) और कोझिकोडा (केरल) .जिन बच्चों को आई आई टी में प्रवेश नहीं मिलेगा उन्हें नॅशनल कॉलेज में प्रवेश मिलेगा .
राज्यों  के कॉलेज में एडमिशन के लिए या तो वहां की कॉमन एंट्रेंस एग्जाम देना होती है या नॅशनल एप्टी  टेस्ट फॉर आर्किटेक्चर (NATA ) .
अलग अलग राज्यों में इस कोर्स के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आपको बताना चाहती हूँ .
मध्य प्रदेश : यहाँ पी एम् टी देने वालों को NATA देना जरूरी होता है .तभी आर्किटेक्चर कॉलेज में एडमिशन मिलता है .इसके लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया 22 जून को ख़त्म हो गयी .इसी के साथ अपने पसंद के कॉलेज को लॉक करने के लिए हर पसंद के लिए 1100 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट देना था .मतलब यदि आपने पांच कॉलेज लॉक किये तो 5500 रुपये . काउंसलिंग की प्रक्रिया अभी शुरू होना है .

महाराष्ट्र :  यहाँ MCET और NATA से एडमिशन मिलता है .NATA से एडमिशन के लिए 1500 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट के साथ फॉर्म जमा करवाने की आखरी तारिख थी पंद्रह जून . इसकी मेरिट लिस्ट आ चुकी है और एक जुलाई से काउंसलिग शुरू होने वाली है . 

गुजरात : यहाँ के लिए 350  रुपये के डिमांड ड्राफ्ट के साथ रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी हो गयी है .लिस्ट का ? है . 

 राजस्थान :- यहाँ का प्रोसिजर बड़ा विचित्र है .राजस्थान PET (RPET) के नाम से 11000 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट बनवाना है .इसके बाद काउंसलिंग शुरू होगी इसमें अगर किसी कॉलेज में आपको एडमिशन मिलता है तो आप के 10000 रुपये फीस में जमा हो जायेंगे सिर्फ एक हज़ार रुपये राजिस्त्रशन के है .लेकिन अगर एडमिशन मिल रहा है और आप नहीं लेना चाहते तो पूरे रुपये मतलब ग्यारह हज़ार डूब जायेंगे . मतलब अगर आपने रजिस्ट्रेशन करवा लिया तो एडमिशन लेना ही है . 

MATA आर्किटेक्चर की ही एग्जाम है इसके बाद ओन लाइन रजिस्ट्रेशन के लिए एक छोटा मोटा अमाउंट तो ठीक है लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया तो हद से ज्यादा व्यावसायिक प्रक्रिया है .मध्य प्रदेश में कुल ४ कॉलेज हैं जिनमे ये कोर्स है .इनके कट ऑफ़ भी किसी वेब साईट पर नहीं मिलते जिसके आधार पर बच्चे या पालक अंदाज़ा लगा सके की उनके स्कोर पर उन्हें कौन सा कॉलेज मिल जायेगा या कितने कॉलेज लॉक करना चाहिए . 

महाराष्ट्र CET से सिर्फ सरकारी कॉलेज ही मिल सकते है जिनकी फीस कम या कहें नहीं के बराबर है . जे जे स्कूल ऑफ़ आर्किटेक्चर जो सबसे विख्यात कॉलेज है की फीस वहां के प्रायवेट कॉलेज से पांच गुना तक कम है .

इसके अलावा एनी राज्यों में भी प्रक्रिया इससे बहुत अलग तो क्या होगी ? 

गुजरात के किसी कॉलेज की फीस उसकी वेब साईट पर नहीं दी है .यही हाल मध्य प्रदेश और राजस्थान का भी है .न ही फोन पर ऐसी जानकारी दी जाती है .
व्यावसायिक शिक्षा के लिए पूरे देश के कॉलेज की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया काउंसलिंग की तारीख में समानता होनी चाहिए जिससे बच्चे जहाँ चाहे एडमिशन ले सकें .रजिस्ट्रेशन की फीस कहीं तो न्याय सांगत होनी चाहिए ताकि हर स्तर के बच्चे उनमे रजिस्ट्रेशन करवा सकें . 
 कविता वर्मा 

Thursday, June 20, 2013

केदारनाथ आपदा ..सूक्ष्म कारण भी है प्रभावी

केदारनाथ आपदा ..सूक्ष्म कारण भी है प्रभावी


केदारनाथ में आयी विपदा ने भारतीय जन मानस को हिला  दिया .अभी सही आंकड़ा प्राप्त नहीं हुआ है लेकिन हज़ारों लोग लापता है और सेंकडों मृत .अलग अलग राज्य सरकारे अपने यात्रियों की सुरक्षा के लिए मदद भेज रही हैं केंद्र ने भी त्वरित मदद दी है सेना के जवान जान पर खेल कर लोगों की मदद कर रहे हैं .जिन लोगों को मदद मिल चुकी है और जो सुरक्षित हैं वे सरकार और व्यवस्था को कोस रहे हैं .मीडिया ने अपनी कमर कस कर जवानों को तैनात कर दिया है जो लोगों के आक्रोश को आम लोगों तक पहुँचाये जिसके कोई सार्थक परिणाम नहीं आने वाले हैं . 
एक बात बार बार कही जा रही है कि मौसम विभाग ने दो दिन पहले ही भारी बारिश की चेतावनी दे दी थी मानसून और पश्चिमी विक्षोभ के कारण बादल फटने की कोई चेतावनी नहीं दी गयी थी ये अचानक आयी विपदा है जो तीन साल पहले लेह में आयी थी और अब उत्तराखंड में . बादल फटने जैसे हालात बने कैसे ?पहले इस तरह की विपदा यदा कदा आती थीं अब इनकी आवृति अचानक कैसे बढ़ गयी ? इसके पीछे कुछ सूक्ष्म कारण हैं जिन पर गौर किया जाना जरूरी है . 
हमारे कई धार्मिक स्थल सुदूर पहाड़ों पर हैं इसे आमजन की आस्था कहें यात्रा का जूनून या सैर सपाटे के साथ पूण्य प्राप्ति की चाह धार्मिक स्थलों पर हर साल श्रद्धालुओं की भीड़ बढती जा रही है .बढ़ी भीड़ के साथ ही इन स्थानों पर सुविधाओं की चाह भी बढ़ गयी है .पहाड़ काट कर होटल बनाये जा रहे हैं होटल के कमरों में टी वी, ए सी जैसी सुविधाओं की मांग भी बढ़ गयी है .लोग इन सुविधाओं के लिए पैसा देने को तैयार हैं और लोग कमाने को राजी  है लेकिन किस कीमत पर ? 
पहाड़ों पर बने होटल्स से गंदे पानी की निकासी के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है ये पानी पहाड़ों से बहता हुआ नीचे घाटी में कहीं किसी नदी नाले में मिल जाता है इस गंदे पानी से उत्पन्न अम्ल पहाड़ियों का क्षरण करता है .ठण्ड से बचने के लिए ए सी लगातार गर्मी उत्पन्न करने वाली गैसे उत्सर्जित करते हैं जिससे पहाड़ों के मौसम पर धीमा लेकिन खतरनाक प्रभाव पड़ रहा है . 
सुविधा के नाम पर पहाड़ों पर रास्ते बन गए हैं जिन पर लगातार गाड़ियाँ दौड़ती रहती हैं जिससे होने वाला कम्पन चट्टानों को भी हिला देता है नतीजतन भूस्खलन तेज़ और अधिक होने लगा है . 
याद करें मैहर के मन्दिर की पहाड़ी को .पहले वहाँ ऊपर तक जाने के लिए सड़क बनाई गयी लेकिन गाड़ियों के कम्पन से उस पहाड़ी को खतरा होने लगा फिर उस सड़क को बंद किया गया अब वहाँ रोप वे बनाया गया जिस पर लोग घूमने मज़े लेने के लिए आते हैं .आखिर को रोप वे भी चलता तो मोटर से ही है उससे भी तो कम्पन पैदा होता ही है जिसके दूरगामी परिणाम अभी आने बाकी हैं . होना तो ये चाहिए की ये सुविधा वृद्ध अशक्त बीमार लोगों के लिए मुहैया करवाई जानी चाहिए बाकी लोग तो श्रद्धा की शक्ति से ऐसे ही चढ़ सकते हैं . 
तीसरा बड़ा कारण है धार्मिक स्थलों पर मोबाइल फोन का उपयोग .सभी जानते हैं मोबाइल फोन के उपयोग से इलेक्ट्रो मेग्नेटिक तरंगें  निकलती हैं जिनसे उत्पन्न गर्मी से मौसम पर असर पड़ता है . मानते हैं अपनों से संपर्क रखना जरूरी है लेकिन क्या पर्यावरण की कीमत पर अपनी जान की कीमत पर ? होना तो ये चाहिए की पहाड़ों पर मोबाइल फोन का उपयोग बिलकुल बंद किया जाए इसके बजाय राज्य सरकार वहां अपनी फोन सुविधा प्रदान करे .स्थानीय लोगों के लिए पेजर या वायरलेस सिस्टम जैसी सुविधा सीमित रूप में दी जा सकती है जो मोबाइल से कम नुकसानदेह है . 
हमारे देश के पर्यावरण मंत्रालय को इस दिशा में कठोर कदम उठा कर एक कठोर गाइड लाइन बनाने की जरूरत है जिसमे नदियों के मुहाने पर निर्माण ,उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसों की मोनिटरिंग कर सड़क पर आवागमन पर कंट्रोल, यात्रियों की संख्या का निर्धारण जैसे कदम उठाने की आवश्यकता है इसके लिए जरूरी है की राजनैतिक पार्टियाँ कोई अड़ंगे न डालें क्योंकि जब विपदा आती है तो वह सबको सामान रूप से प्रभावित करती है। 
कविता वर्मा 

Wednesday, June 19, 2013

उत्तराखंड यात्रा ..एक याद

      (केदारनाथ की ताज़ा तस्वीरें देख कर मन द्रवित हो गया .मंदिर के आस पास बने मकान उन पंडों पुजारियों के है जो पीढ़ियों से कुटुंब विशेष के पुरोहित हैं उनके पास कई पीढ़ियों के यजमानों का लेखा जोखा  है बिना किसी कम्पूटर के चंद  मिनिटों में आपके कुटुंब का पुरोहित आप के पास पहुँच कर अपनी बही में केदारनाथ आये आपके पूर्वजों के नाम,स्थान गोत्र सब बता देते हैं .
इस तबाही में कई ( या सभी ) कुटुम्बों के पीढ़ियों के ये रिकॉर्ड भी नष्ट हो गए होंगे ,लगभग हर भारतीय की विरासत है ये . )

लगभग पच्चीस साल पहले की बात है उत्तराखंड के चारों  धाम यमुनोत्री गंगोत्री केदारनाथ बद्रीनाथ जाने का प्रोग्राम बना . लम्बा सफ़र पंजाब की गर्मी ,आतंकवाद का डर सब पार करके हरिद्वार पहुंचे .मई के महीने में भी गंगा के बर्फ जैसे ठन्डे पानी में स्नान करके मन आध्यात्मिक आस्था से भर गया . शाम के समय घाट पर गंगा जी की आरती धर पर तैरते दीपक जैसे आँखों में स्थायी रूप से बस गये . 
ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला पार करते मन जहाँ रोमांचित था वहीं थोडा डरा हुआ भी . 

मैदानी इलाका पार करके जब यमुनोत्री जाने के लिए सफर शुरू हुआ जानकी चट्टी पहुँचते हम लोग बुरी तरह भीग गए थे वहाँ लगभग हर रोज़ शाम को बारिश हो जाती है .दूसरे दिन सुबह से बारिश हो रही थी भीगते हुए चढ़ाई शुरू की रास्ते बहुत संकरे और खतरनाक थे .मम्मी के लिए एक टट्टू किया था लेकिन उस पर बैठना भी आसान नहीं था .रास्ते भर सड़क के ऊपर निकले चट्टानों के नुकीले सिरों से बचते दम निकल गया . बारिश और ठण्ड से टट्टू पर बैठे वे अकड़ सी गयीं . यमुनोत्री के गर्म पानी के कुंद में डुबकी लगा कर राहत मिली .लौटते हुए फिर बारिश शुरू हो गयी किसी तरह एक बसेरा मिला .
दूसरे दिन सुबह गंगोत्री की यात्रा शुरू की .ये यात्रा खतरनाक रास्तों से होती हुई लेकिन मंदिर तक पहुँची .सुबह से चले हम अँधेरा घिरने पर पहुँचे . उस समय वहाँ बिजली नहीं थी .दूसरे दिन सुबह जब दुबकी लगाई बर्फ से पानी में मानों रक्त जम गया एक के बाद दूसरी दुबकी लगाने की हिम्मत ही नहीं हुई . मंदिर के दर्शन करके वह से चले तो हमारे पास गीले कपड़ों का ढेर था जिन्हें गाड़ी में सुखाते जा रहे थे . रास्ते में एक जगह मोड़ पर एक गाडी सामने  आ गयी . उसका ड्राईवर अड़ गया कि उसकी गाडी चढ़ रही है इसलिए हमें अपनी गाडी पीछे लेना होगी .हमारे पीछे तीखा मोड़ था और सैकड़ों मीटर गहरी खाई इसलिए उससे कहा तुम थोडा सा पीछे ले लो तुम्हारे पीछे सीधी सड़क है लेकिन वह तस से मास नहीं हुआ . ट्राफिक काफी कम था इसलिए दोनों अड़े खड़े रहे .हमने गीले कपडे निकाल लिए और हवा में लहरा कर सुखाने लगे साथ लाया नाश्ता निकाल कर पिकनिक का मज़ा लेने लगे . कुछ देर में एक दो गाड़ियाँ और आ गयीं तब लोगों ने उस ड्रायवर को समझाया तब गाड़ियाँ निकली . 
 रात्रि विश्राम कर दूसरे दिन सुबह केदारनाथ के लिए चढ़ाई शुरू की 
गौरी कुंड से केदारनाथ का रास्ता बहुत खूबसूरत है ( अब था ) हरी भरी पहाड़ियाँ रस्ते के किनारे पर उगे फूल दूर तक फैली चोटियाँ .ऐसे ही किसी चोटी पर धूप देखा कर हम सब ख़ुशी से चिल्लाने लगे तीन दिन लगभग गीले रहने से ये धूप  लग रही थी . केदारनाथ से करीब दो तीन किलोमीटर पहले से कुछ स्थानीय लोगों ने पूछना शुरू कर दिया की आप लोग कहाँ से आये हैं .हमने इसे मजाक में लिया किसी को इंदौर किसी को मद्रास किसी को बम्बई बताया .थोड़ी ही देर में चार पांच पंडों ने हमें घेर लिया तब हमें समझ आया कि ये पण्डे कुटुंब विशेष के हैं तब हमने अपने पैतृक गाँव का नाम और अपना गोत्र बताया चंद मिनिटों में हमारे खानदान का पंडा  हम तक पहुँच गया . ( उस समय मोबाइल नहीं हुआ करते थे ) वह हमें अपने साथ अपने घर ले गया हमारी रहने खाने सोने की व्यवस्था की फिर हमारे परिवार की बही खोल कर बताया कि आज से बारह साल पहले मेरी दादी केदारनाथ आयीं थीं उसके बाद मेरे ताऊ जी अपने बेटे बहू के साथ आये थे .उस बही में सबके नाम और तारीख लिखी थी . उसने बताया की हर कुटुंब गोत्र के अलग अलग पण्डे हैं और कोई किसी दूसरे के यजमान से बात नहीं करते .यहाँ पीढ़ियों का हिसाब दर्ज है .इतना तो शायद परिवार में नहीं रहता होगा . और ये फूलप्रूफ व्यवस्था है .हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था . 
शाम होने में कुछ ही देर थी .दोनों भाई सामने दिख रहे पहाड़ पर चढने की जिद करने लगे उनकी उम्र होगी 15-17 साल .उन्हें पहाड़ों की बर्फ लुभा रही थी .मम्मी ने तो साफ़ मना  कर दिया पापा असमंजस में थे और मैं सोच रही थी की यहाँ बार बार थोड़ी आना है .पापा को थोड़ा सा मनाया और दोनों को जाने की इजाज़त मिल गयी . मैं और पापा मंदिर के दर्शन करने चले गये और मम्मी आराम करने लगीं .जब हम लौटे तो मम्मी ने दोनों भाइयों का पूछा तो हम चौंक गए वे अभी तक वापस नहीं आये अँधेरा घिरने लगा था .घबराहट के कारन मेरी और पापा की हालत खराब हो गयी मम्मी तो रोने लगीं .हमने लोगों से पूछना शुरू किया तो जवाब मिला की आसपास दिखने वाली पहाड़ियाँ बहुत खतरनाक हैं जरा फिसले की   हजारों फीट नीचे खाई में यहाँ तो लाश भी कोई नहीं निकालता क्योंकि पत्थरों से टकराने के बाद वो निकालने लायक ही नहीं रहती . 
मैं लगातार भगवान् से मनाती रही की वे सही सलामत हों .करीब आठ बजे दोनों लौटे .उन्होंने बताया की वे बहुत ऊपर तक चले गए थे वहाँ एक पगडण्डी सी बनी थी उसपर आगे बढ़ते उन्हें एक गुफा मिली .उसपर एक बोर्ड लगा था की ये गुफा अभिमंत्रित है बिना इज़ाज़त प्रवेश न करें .तभी उन्हें वहाँ एक साधू दिखा उससे परमिशन ले कर वे अन्दर गये वहाँ एक साधु ध्यान मग्न थे इतनी ठण्ड में भी वे सिर्फ एक भगवा पहने थे .उन्हें देख कर उन्हें इतनी श्रध्दा उमड़ी की उन लोगों ने अपनी जेब में जो भी था वहीँ चढ़ा दिया . 
ये सुन कर विश्वास हुआ की सच में हिमालय में साधू तपस्या करते हैं . दूसरे दिन सुबह केदारनाथ मंदिर के दर्शन किये सामने दूर आदि शंकराचार्य की समाधी थी वहां तक जाने आने में बहुत समय लग जाता इसलिए दूर से दर्शन करके वापस आ गए . हमारे पण्डे को हमारा वर्तमान पता लिखवाया उसकी बही में हमारा नाम लिखवाया और वापसी की .रास्ते में खिले फूलों को इकठ्ठा किया ताकि अपनी हरबेरिअम की फ़ाइल में लगा सकूँ . 
अगले पूरे दिन का सफर करके बद्रीनाथ पहुँचे .बद्रीनाथ तक बस जाती है .केदारनाथ और बद्रीनाथ में सांस लेने में थोड़ी तकलीफ होती है .सुबह गर्म कुंड में स्नान कर मंदिर में दर्शन  किया फिर वही नदी किनारे दादा दादी का तर्पण किया .बद्रीनाथ आखरी धाम है यहाँ से होकर ही युधिष्ठिर स्वर्ग के लिए गए थे . यहाँ से कुछ दूरी पर इस सीमा का आखरी गाँव है माणा जहाँ सेना की चौकियाँ हैं .वहाँ सैनिकों से बात की वे यात्रियों के आवाजाही से खुश थे की कोई तो दिख रहा है बारिश होते ही सब चले जायेंगे गाँव खली हो जायेंगे फिर वे अकेले अपने टेंट में या ड्यूटी पर .सुन कर उनकी कठिन जिंदगी का अंदाज़ा हुआ . 

इस तरह ये यात्रा पूरी हुई . उन आठ दिनों में हम कम से कम अस्सी किलोमीटर पैदल चले होंगे लेकिन मज़ा बहुत आया .मैदानों में रहने वालों के लिए वो जगह स्वर्ग है ये अलग बात है की वहाँ की दुश्वारियाँ अपनी जगह हैं . 

अभी उत्तराखंड में भारी बारिश और बादल फटने से जो तबाही हुई है उसे देख कर मन काँप गया और सालों पुरानी यादों ने फिर अंतस से झाँका . 

कविता वर्मा 

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