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Showing posts from January, 2013

यादों का अंकुश

मन की गलियों में भटकते कई बातें याद आती है तो कभी ऐसा कुछ घटित होता है की उसके बहाने कोई पुरानी बात याद आ जाती है तो कभी किसी पुरानी बात के बहाने कोई काम करते हाथ या कहें मन ठिठक जाता है। कुछ बाते बहुत बहुत पुरानी होकर भी मानों पुरानी नहीं होती उनकी स्मृति मन पटल पर कल की घटना सी ताज़ा होती है। वह कचोटती भी है और कुछ करने से या तो रोकती है या कहीं अंकुश लगाती है। वह खुद से कुछ नहीं कहती लेकिन उस स्मृति की छाप इतनी मजबूती से मन पर पड़ी होती है की वह अपने मौन से भी बहुत कुछ कह जाती है। ये अलग बात है की कभी कभी उस अदृश्य रोक को नज़रंदाज़ करके वही किया जाता है जो करना होता है लेकिन उसके बाद भी वह जेहन में अपनी उपस्थिति दर्ज तो करवा ही देती है। 

एक समय था जब बाज़ार किसी खास मौके पर ही जाना होता था। नए कपडे सिलवाना या लेने जाना किसी अवसर विशेष पर ही होता था। अब तो बोरियत दूर करने के लिए भी लोग खरीदी करने निकल जाते हैं। एक नया चलन आया है विंडो शोपिंग का जिसमे खरीदना कुछ खास नहीं होता बस मार्केट में घूम कर मन को बहला लिया जाता है और कुछ पसंद आये तो खरीद लो मनाही तो कोई है नहीं। माल संस्कृति ने…

मील का पत्थर

समाज कल्याण विभाग की पत्रिका में मेरा ये लेख पेज़ नो 11 से 14


https://docs.google.com/viewer?a=v&pid=gmail&attid=0.1&thid=13c3ce98b2c1ddc6&mt=application/pdf&url=https://mail.google.com/mail/u/0/?ui%3D2%26ik%3D1127ee4a6f%26view%3Datt%26th%3D13c3ce98b2c1ddc6%26attid%3D0.1%26disp%3Dsafe%26realattid%3Dfile0%26zw&sig=AHIEtbSIQeSrZ3wul21RKalgaXcZsPr-MQhttps://docs.google.com/viewer?a=v&pid=gmail&attid=0.1&thid=13c3ce98b2c1ddc6&mt=application/pdf&url=https://mail.google.com/mail/u/0/?ui%3D2%26ik%3D1127ee4a6f%26view%3Datt%26th%3D13c3ce98b2c1ddc6%26attid%3D0.1%26disp%3Dsafe%26realattid%3Dfile0%26zw&sig=AHIEtbSIQeSrZ3wul21RKalgaXcZsPr-MQ


उठो जागो

जो टूट चुका है समझौता,  तुम उसकी लाश क्यों ढोते हो? धोखा तुम्हारे साथ हुआ है  क्यों शराफत का लबादा ओढ़े रहते हो? बन्दूक,गोली, बम, हथगोले देकर  चलाने की इजाजत नहीं देते हो? क्यों अपनी इक इक जान को  उनकी दस जान से कम लेते हो?  वो घर में घुसकर ललकारते हैं,  तुम नियमों की दुहाई देते हो। प्रतिबंधों, नाराजी के डर से  तुम अपना सम्मान खोते रहते हो।  वक्त आ गया है अब  उन्हें सबक सिखाने का। देखें वो आँख तरेर हमें  आँख ही नोच ले आने का।  वो चार कदम जो घर में घुसे,  उन्हें दूर तक खदेड़ आने का। क्रिकेट, व्यापार और हर द्वार बंद कर, आर पार भिड़ जाने का।  क्या है औकात उनकी ये,  उनकी धरती पर बताने का। उठो अब कुछ तो निर्णय लो,  ये समय नहीं बतियाने का।   बहुत हुई वार्ता, चेतावनी  कुछ जमीनी काम कर जाने का।  अपनी भलमनसाहत पर,  अपनी दृढ़ता दिखलाने का।  उठो,जागो और लक्ष्य धरो  ससम्मान जीने                 या मर जाने का।

अनकही

कहे गए शब्दों की 
अनकही गूँज में  अनकहे शब्दों के  गूँज गए अर्थ। 
समझे गए अर्थों के  न समझे भावों में  न समझे अर्थों के  महसूस किये भाव।  
सोचते तेरी बातों को  खोते तेरी यादों में  खोती तेरी यादों से  बिसरती तेरी बातें। 
पकडे तेरे दामन को  छोड़ते मेरे हाथों से  छूट गए दामन से  थामे तेरी यादें।